धर्म ‘इतिहास–केंद्रीयता’ की उपेक्षा करता है

अब्राहमी मतों (ईसाई, यहूदी, इस्लाम)से संबंधित अधिकांश संघर्ष और युद्ध इस मतभेद से उत्पन्न हुए हैं कि ईश्वर ने वास्तव में क्या कहा और उसने ऐसा कैसे कहा और उसका मतलब वास्तव में क्या था।व्यवस्था बनाए रखने के लिए “प्रामाणिक” ग्रंथों के मानदंड बनाए गए और क्रीड, अथवा महत्वपूर्ण अभिकथनों और विश्वासों के संगठित रूप, पर चर्चाएँ चलाई गईं, उन्हें लिपिबद्ध किया गया और धर्म में सहभागिता की कसौटी के रूप में उन्हें सुनिश्चित किया गया।

ईसाइयत में, ईश्वर के हस्तक्षेप के इतिहास के प्रति यह जूनून नायसीन क्रीडके माध्यम से सर्वोत्तम ढंग से समझा जा सकता है, जो जीसस के जीवन के बारे में अनेक ऐतिहासिक दावे करती है। प्रत्येक ईसाई चर्च में, ईसाइयों के मूलभूत अभिकथन या मिशन वक्तव्य के रूप में उसका पठन किया जाता है, जिसके प्रति उन्हें निरंतर निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। जिन्हें ईसाइयत के इस प्रकार इतिहास के प्रति केंद्रित होने पर संदेह है उनके लिए इस क्रीड को पढ़ना बोधप्रद होगा। पहली बार इसकी रचना 325 ईस्वीं में की गई थी जिस समय ईसाइयत रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म बन रहा था।यह कैथोलिक, पूर्वी ओर्थोडोक्स, अधिकांश प्रोटेस्टेंट चर्चों और साथ-साथ एंग्लिकन समुदाय का अधिकारिक सिद्धांत है।

इस क्रीड का आधारभूत संदेशयह है कि पैगंबरों और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से ईश्वर की इच्छा को समझे बगैर साल्वेशन (उद्धार)की प्राप्ति नहीं हो सकती।ईडन के उपवन में किए गए मूल पापके लिए मिले हुए चिरकालीन अभिशाप से मनुष्य को बचाने के लिए साल्वेशन अनिवार्य है। पाप की इस ईसाई समस्या का समाधान यह है कि ईश्वर एक निश्चित समय पर मानवीय इतिहास में प्रवेश करे। अतएव, इस अन्तःक्षेप का सावधानी से ऐतिहासिक अभिलेखन करना आवश्यक हैऔर इस सत्य पर दृढ़ता से जोर देना होगाऔर इसे आगे बढ़ाना होगा।यह एक ऐसा सत्य है, जो इतिहास से जन्मा है और भूतकाल और भविष्यकाल दोनों पर लागू होता है: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समस्त मानवजाति सामूहिक रूप से एक विशिष्ट“कानून” का पालन करते हैं। यदि इस इतिहास को वैध बनाना है, तो इसे सार्वभौमिक मानना होगा, चाहे इसके मूलतत्व (वैयक्तिक और सामूहिक) कितने ही असाधारण और अविश्वसनीय क्यों न हों।इतिहास में प्रकाशित ईश्वरीय सत्य के बारे में इस विशिष्ट और प्रायः असंगत दावे के प्रति इस दुराग्रह के लिए मैंने ‘इतिहास-केंद्रीयता’शब्द रचा है।

अब्राहमी विश्वासों की इतिहास-केंद्रीयताऔरधर्मों(जिसमें हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म सम्मिलित हैं) के उद्देश्यमेंएकगंभीरअंतरयहहैकि धर्मों केसाधकव्यक्तिगतरूपसेइसीशरीरमेंअभी-और-यहीं अपनी चेतना को उन्नत करता है।धर्म, चूँकिअवज्ञाकीकिसीऐतिहासिकघटनाको मान्यतानहींदेता, अतःवह ‘पाप’कीसमस्यासेऔरसाथहीइतिहासकेबोझसेमुक्तहै।यहविषयजर्नलऑफ़इंटररिलिजियस डायलाग (अंतर-मजहबी संवाद का जर्नल)केसह-मुख्यसंपादक जोशुआ स्टेनटन और मेरे बीच हुई एक उत्तम चर्चा के विषयों में से एक था।

धार्मिक दृष्टिकोण से, किसी ऐतिहासिक बोध की या कम से कम सख्ती से निर्मित एक ऐतिहासिक बोध की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाए, साधक इतिहास के बंधन से मुक्त होकर परम सत्य की खोज करने के लिए नए सिरे से आरंभ करने और अपनी क्षमताओं का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। सभी धार्मिक परंपराएँ परम सत्य के ज्ञान के लिए इस गैर-ऐतिहासिक और सीधे मार्ग को मान्यता प्रदान करती हैं।इससे भी बढ़कर, अनुशासित अभ्यास के माध्यम से सीधे ही परम सत्य को जानने की यह क्षमता सभी मनुष्यों में है,उनमें भी जो इसमें विश्वास नहीं रखते।

इसके विपरीत, प्रचलित अब्राहमी दृष्टिकोण यह है कि मनुष्यों में ईश्वर के साथ एकाकार होने की क्षमता नहीं है, और साथ ही यह भी कि, उसका एकमात्र अध्यात्मिक ध्येय साल्वेशन (उद्धार) है न कि “ईश्वर के साथ एकात्मकता”।उद्धार केवल ऐतिहासिक घटनाओं और पैगंबरों के माध्यम से समझी गई ईश्वरीय इच्छा के आज्ञापालन से हो सकता है।

इतिहास की यह परम स्थिती व्यक्तिगत अध्यात्मिक अन्वेषण के अधिकार को कमजोर करती है (इसीलिए,अब्राहमी परंपराओं में रहस्यवादियों को प्रत्यक्ष तौर पर घोरसंदेह की निगाह से देखा जाता रहा है) और यह स्थिति सत्य के  विरोधी दावों का आधार बनती है जिनमें समझौते की कोई संभावना नहीं है।साथ ही, अब्राहमी दृष्टिकोण यह है कि जिन्हें इस ऐतिहासिक  रहस्योद्घाटन तक पहुँच नहीं है, वे ईश्वर के साथ संपर्क स्थापित करने के इस मूलभूत साधन से वंचित होने के कारण, निश्चित रूप से सदैव के लिए अँधेरे में रहेंगे। मैं इस ऐतिहासिक दुराग्रह को अब्राहमी (ईसाई, यहूदी, इस्लाम) और धार्मिक मार्गों (विशेष रूप से हिंदू और बौद्ध) के बीच प्रमुख अंतर मानता हूँ।

धर्म पथ का पालन करने वाले किसी व्यक्ति के लिए, चेतना के उच्च स्तर की अनुभव-जन्य अवस्था प्राप्त करने हेतु इतिहास के किसी विशिष्ट वृत्तांतको स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है। और न ही इस प्रकार का कोई ऐतिहासिक वृत्तांतअथवा उसमें विश्वास इस वांछित अवस्था की प्राप्ति के लिए पर्याप्त है।अतएव, धार्मिक परंपराएँ इतिहास की अनावश्यक चिंता न करते हुए, आत्मबोध की अवस्था से शिक्षा देने वाले अध्यात्मिक गुरुओं की अनगिनत संप्रदायों पर निर्भर होकर फली-फूली हैं। ध्यान की पद्धतियाँ, इतिहास पर निर्भर हुए बिना, सत्य स्वरूप के प्रकाश को आवृत्त करने वाली संस्कारगत परतों को हटाकर उच्चतम सत्य का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करती हैं।यहाँ तक कि यदि समस्त ऐतिहासिक दस्तावेज खो जाएँ, ऐतिहासिक स्मृति मिट जाए, और सभी पवित्र स्थल दूषित हो जाएँ तो भी सत्य को अध्यात्मिक साधना से पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

Source: http://rajivmalhotra।com/library/articles/dharma-bypasses-history-centrism/

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