रीसा लीला: वेंडी का बाल-परिलक्षण – 2

भारत विखंडन विशिष्ट

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मैं आशा करता हूँ कि ये निबंध आरम्भ करेगा एक प्रतिपुष्टि कुंडली का भारतीय समाज को शिक्षित करने में, जो की रिसा के कार्य का विषय है, किन्तु जिसको अभी तक अँधेरे में रखा है , इस सन्दर्भ में, कि, क्या लिखा और कहा जा रहा है पीठ पीछे।

लक्ष्य : श्री रामकृष्ण

वेंडी के एक बच्चे का परिचय:

वेंडी डोनिगर के एक छात्र, जेफरी कृपाल, महाविद्यालय शिकागो में, ने शोध किया श्री रामकृष्ण पर अपने वाचस्पति उपाधि हेतु I वे रामकृष्ण शिष्ट मंडल, और सूचना एवं चर्चा के लिए गए, और उन लोगों ने उनकी स्पष्टरूप एवं उत्साहपूर्वक सहायता की I उस शिष्ट मंडल की एक बहन बताती हैं कि, वे इतने अच्छे एवं प्रीतिकर नवयुवक थे कि कोई भी उनकी मंशा पर विश्वास कर लेगा I” परन्तु, उचित रूप से मान्यता प्राप्त विद्द्वत्परिषद की नीति शास्त्र एवं सामान्य शिष्टाचार के विपरीत उन्होंने शिष्ट मंडली के विशेष्यज्ञों को, कोई भी अवसर नहीं दिया अपने लेख का समालोचन हेतु, ये जान ने के लिए की उसमें कोई असत्य या अशुद्धता ना हो I

रामकृष्ण शिष्ट मंडली को कृपाल के अपवादजनक निष्कर्ष का ज्ञांत अभी कुछ वर्षों पूर्व ही हुआ, जब उनकी पुस्तक आयी और आते ही अतयंत प्रशंसा का पात्र बानी वेंडी डोनिगर के संघ से. उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक, कालिस चाइल्ड [९]( “काली के बच्चे [९]”) के नाम से है, जिसने ए.ए.आर दुवारा प्रथम पुस्तक पारितोषिक जीता, हारवर्ड में नियुक्ति एवं राइस महाविद्यालय में गौरवपूर्ण विद्द्वत्परिषद – पद। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका ने उनकी पुस्तक को रामकृष्ण के विषय में अध्ययन के लिए उच्च चयन घोषित किया हैI जब की पूरा प्रसंग आधारित है कथित अपनिर्वचन बंगाली लेखों पर रामकृष्ण के जीवन के विषय में (विस्तृत विवरण के लिए नीचे देखें ), कोई भी व्यक्ति जिसने अंत में उनके वाचस्पति-उपाधि पर हताक्षर किया है, या जो ए.ए.आर पारितोषिक मंडल के थे, या उन लोगों ने जिन्होंने उनकी पुस्तक को गौरान्वित एवं समर्थन दिया, मेरे परिपक्व ज्ञान के अनुसार, बंगाली जो की परिचित हैं सांस्कृतिक सूक्षम-भेदों से अब धर्म युद्ध के मरण पर हैंI मुझे मिली सूचना के अनुसार, एवं तथ्य को परखने एवं शुद्ध करने के पश्चात्, पूरे बंगाली विशेषज्ञों ने बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचे ही वहां से प्रस्थान कर लिया. किन्तु मेरा मुख्या बिंदु और भी सार्वलौकिक है: यदि यही वाचस्तपति-लेख (या पुस्तक) किसी हिब्रू या ग्रीक के सूत्रों पर आधारित होता — सारांश में, यदि यही बाइबल या पूर्वी ईसाई क्षेत्र के आधार पर होता — तो क्या ये सफल हो पता? इसके मापदंड जो व्याप्त हैं उन क्षेत्रों में वे निश्चित ही दृण हैं I इसको स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन की आवश्यकता है किसी के द्वारा जो बाइबल के क्षेत्र में/पूर्वी गिरिजाघर से हों I निश्चित ही, सीमान्त पर कई वस्तुएं प्रमाणित की जा सकती हैं I किन्तु क्या इसी के समान ही, मुख्य रूप से फ्रेयडीअन मनोविश्लेषण के लेख पर आधारित, सहयोग मिलता उसी विस्तार से विद्वत्परिषद मुख्य धारा में, यदि वो बाइबल के विषय में होता ?

उसे एक निर्देश चिन्ह मानना चाहिए, एवं उसको इस प्रकार होना चाहिए कि कैसे इतना दृण नूतन व्याख्यान होना चाइये विद्द्वत्परिषद – परखा हुआ प्रलोभक पूर्व किसी दूर नए-उपनिवेशी सभ्यता का जिसके प्रत्यक्षतः प्रतिनिधि उस रीति के अंश भी नहीं थे. सारांश में, क्या ये नविन आधुनिक व्याख्यान है एयरोसेंट्रिस्म (यूरोपी – मध्यवाद) आध्यात्मिकता का, जो “अन्य लोगों” पर प्रस्तावित किया जा रहा है?

मैंने अभियोग आरम्भ किया कि, रिसा ने किस प्रकार असमय एवं असत्य विस्तृत रूप से राय बनायी रामकृष्ण पर, बिना किसी उचित विरूद्ध मंडली के प्रतिनिधि के दृष्टिकोण के (उन लोगों की राय जो कि रामकृष्ण को भली-भांति जानते हैं). ये तो घोर उल्लंघन है यथोचित कार्यविधि का एवं नैतिक आदर्शों का I वैसे भी, मुझे कई बातें ज्ञांत हुईं हैं विद्द्वत्परिषद के गढ़ के चौकीदार एवं सिपाहियों द्वारा, जो ढकोसला एवं भय की सीमा पर हैं I

पहली बार, मुझे बताया गया कि कृपाल निराशा से ग्रहस्त हैं, क्यूंकि उन्हें आलोचकों से “धमकियाँ” मिल रही हैं, और वे अब पछता रहे हैं कि उन्होंने ऐसी पुस्तक लिखी, और आशा कर रहे हैं कि वे पूर्णतः इसको भुला दें I मैंने सत्य को इसके विपरीत पाया: कृपाल अत्यंत ही वादानुवाद का आनंद ले रहे हैं, वे इसे अपने विद्द्वत्परिषद में कार्य-विरद्धि में सहायक मानते हैं, और जब भी उनसे उनको मिली “धमकियों” के प्रमाण माँगे गए तो वे बड़ी सरलता से खिसक लेते हैं I

दूसरी बार, मुझे स्वयं परामर्श दिया, ईमेल से भी समझाया एवं अन्य सहभागियों द्वारा भी उपदेश दिया, कि यदि मैं ने वेंडी की निंदा की, तो मुझ पर आक्रमण हो सकता है, मुझको बहिष्कृत कर दिया जायेगा, एवं मेरी योजनाएं भी बहिष्कृत कर दी जाएँगी। अनुमान लगाइये? इसी भय ने मुझे विधि पूर्वक प्रेरणा दी, और भी उत्साहपूर्ण , शोध करने की इच्छा जागरूक हुई मेरे इस अगम्यगामी सम्प्रदाय में I मैं अपने आप को एक जाँच पड़ताल करनेवाल सूचक, जो की एक बृहत विषय को उजागर करनेवाला हो अनुभव कर रहा था I मैं विस्मित था : क्यों उन लोगों ने मेरी सूक्ष्म जाँच की छलाँग को अस्वीकार किया, जब की वे तो अत्यंत ही उन्मुक्त विचारों के माने जाते हैं?

पहले जब कि रामकृष्ण शिष्ट मंडल असंतुष्ट थे इन स्थापित विद्द्वत्परिषद के विरुद्ध संग्राम के लिए, इन प्रबल अनुचित चित्रण के लिए, बाद में उनके एक संत, स्वामी त्यागानंद, ने इस विषय को गंभीरता से लेना आरम्भ किया I किन्तु ये सब कृपाल के लेख से रामकृष्ण की मुख्यधारा में प्रतिष्ठा नष्ट होने के पश्चात् हुई, अमरीकी स्कूल सहित I परिणामस्वरूप स्वामी त्यागनन्द ने इसके प्रत्याख्यान में १३०-पृष्ट लिखे, जिनमें क्रम से कई गंभीर दोष जो कृपाल के लेख [१०] में थे, उनको दर्शाए थे I कृपाल ने मेरे इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया जिसमें मैंने उन्हें स्वामी त्यागनन्द की संक्षिप्त प्रत्याख्यान को उनकी नयी प्रकाशित पुस्तक के अंत में सम्मिलित करने का आग्रह किया था, और उदाहरण के लिए हर प्रकार के लाक्षणिक एवं विद्द्वत्तापूर्ण कारण दर्शाए थे जो की न्यायविरुद्ध थे[११].

कृपाल की क्षात्रवृद्धि की भड़कीली भूलों के सार के पश्चात, जो निम्नलिखित हैं, मैं समझाऊंगा कि क्यों इस प्रकार की बनावटी क्षात्रवृद्धि, विशेषकर जब वे न्यायसंगत एवं प्रचलित की जाती हैं पूर्णतया जैसे राजनीती, अपराधी-संगठनों द्वारा, ये अत्यधिक भयंकर हो जाती है कई स्तरों पे I

किस प्रकार सर्वोच्च विक्रेता के झूठे-जाल बुने:

इस अंश में कुछ भूलों का संक्षिप्त में कालिस चाइल्ड(काली के शिशु) से उल्लेख है I पाठक को अच्छा अनुमान हो जायेगा कि किस प्रकार की क्षात्रवृद्धि का कार्य हो रहा है I

१) आवश्यक भाषा कौशल का अभाव:

स्वामी त्यागनन्द और कई अन्य बंगाली ज्ञानियों ने विस्तीर्ण वादविवाद किया कृपाल से, और उन्हें अल्प संदेह है कि उनको बंगाली भाषा का ज्ञान ही नहीं है, जिसमें वो घोषणा करते हैं कि उन्होंने पूर्ण प्रलेख का अध्ययन किया है जो श्री रामकृष्ण के जीवन पर आधारित है, और इन् प्रलेखों का कृपाल उदाहरण देते हैं I जब उनसे बंगाली में वार्तालाप करो तो वे समझते ही नहीं हैं, और यदि बंगाली के सन्दर्भ में सीधे कोई प्रश्न करो, तो वे उत्तर भी नहीं दे पाते हैं I स्वामी त्यागनन्द स्पष्ट करते हैं :[१२]

 “”कृपाल का निष्कर्ष किसी अशुद्ध अनुवाद द्वारा होता है, एक उद्दंड कुरूपता एवं सूत्रों की तिकड़म, जो की मिश्रित होता है अनूठे अनभिज्ञता बंगाली भाषा के संस्कृति से I व्यंगात्मक, अध्ययनशीलता के आभाव की ध्वनि जिससे उनहोंने रामकृष्ण पर चर्चा की, उस से भी कोई सहायता नहीं मिली … कृपाल की बंगाली संस्कृति की अनभिज्ञता, सीमा पार है I कई साहित्यकारों की मिथ्या प्रस्तुति मात्र बंगाली दृष्टिकोण एवं रीति के सामान्य आभाव के कारण ही है …. इसके अतिरिक्त कष्टपूर्वक ये भी स्पष्ट है की इन लोगों को संस्कृत का भी अल्प ज्ञान ही है I”

महाध्यापक नरसिंघ सिल, एक इतिहासकार हैं, जो बंगाली भाषा के विषेशज्ञ हैं I वे रामकृष्ण शिष्ट मंडल से भी अछूते हैं, और अपने आपको धार्मिक भी नहीं मानते हैं I यहाँ उनका स्वतंत्र आंकलन प्रस्तुत है: [१३]

जेफरी अत्यंत ही दक्ष पुरुष हैं, बंगाली-अंग्रेजी शब्दकोष का उपयोग करने हेतु, और सर्वोच्च उपयुक्त पर्यायवाची शब्दों के चयन के लिए (बिना चिंता किये किसी भी प्रारंभिक, माध्यमिक, तृतीय श्रेणी के अर्थ की ) समझते हैं की संभवतः उनकी बात स्पष्ट होगी… [वे] बंगाली में सम्भाषण में असमर्थ हैं (किन्तु शब्दकोष का प्रयोग करने में अत्यंत ही त्तपर रहते हैं). तंत्रिक रामकृष्ण को समलिंगकामुक परमहंस से मिश्रित करने का प्रयत्न, सूत्रों के अर्थ को अशुद्ध करके, कृपला प्रमाणों का निर्माण करते हैं I “

२) तंत्र की अशुद्ध व्याख्या:

कृपाल के प्रसंग का केंद्र उन्हीं के शब्दों में संक्षिप्त में इस प्रकार है: “रामकृष्ण एक प्रतिद्वन्द, अनुत्सुक, सम – कामोत्तेजक तांत्रिक थे [१४]…….. तंत्र के इतरलिंगी अनुमान गंभीर रूप से, उलंघन करते हैं, स्वयं के समलैंगिक ढांचे के मांग की I उनकी नारी-तंत्र गुरु और मंदिर के स्वामी ने संभवतः स्वयं को…….. साधु पर बलात किया होगा …… किन्तु रामकृष्ण एक प्रेमी ही रहे ……. यौन सम्बन्धी आक्रामक स्त्रियों या वृद्ध पुरुषों के नहीं बल्कि नव युवकों के[१५]” I

इस आरोप का उत्तर देते हुए, स्वामी त्यागनन्द कहते हैं: “कृपाल की प्रज्ञा “तांत्रिक” शब्द में क्या है?” वे कहते हैं कि ये परिभाषा जुडी है ” मायिक शक्ति, विलक्षणता, चिथड़े एवं यौन – क्रिया से “I वे अस्वीकार करते हैं तंत्र के “दार्शनिक प्रदर्शन” एक प्रमाणहींनता का क्यूंकि वे “अभिकल्पित हैं तंत्र से हर प्रकार से, जो तप्पड़ है अन्धविश्वास का, टोना का या कलंक का “[१६].

किन्तु इस पूर्वानुमान प्रवृत्ति के चलते। कृपाल आग्रह करते हैं: “रामकृष्ण के गुप्त अनुभव का गठन रहस्यवादी – कामुक शक्तियों के थे जो की उन्होंने पूर्णतः ना ही कभी सुविकारा और ना ही कभी समझा।”[१७] I

चलिए अब देखते हैं कि कृपाल किस प्रकार अपना दृण कथन निर्मित करते हैं I

३) रामकृष्ण के ऊपर थोपा गया मनोमिति रोग-निदान, बिना किसी आधार के:

कृपाल उच्चतम, दृण विश्वास स्थिति के साथ, किन्तु बिना किसी प्रमाण के चाहे जो हो, कुछ तुलनात्मक अंधाधुंध अभिकथन रामकृष्ण के विषय में, मात्र किसी मानसशास्त्र पुस्तक की प्रवेशिक की व्यापकीकरण उनपर थोपना। वे प्रकाशित करते हैं:

यौन अभिघात सम्बन्धी साहित्य सुझाव देते हैं कि जिन व्यक्तियों ने दुर्व्यवहार का सामना प्रायः किया हो वे निपूर्ण हो जाते हैं अपनी चेतना परिवर्तन के लिए। … अपने शारीरिक अंकुश को त्याग देते हैं, और विशेषकर अपनी जठरांत्रिय क्रियाओं को, दृश्य एवं आधिपत्य की अवस्था का अनुभव करते हैं, अतिसंवेदनशील होते हैं विशेष प्रकृति की (जैसे शौचालय), प्रतीकात्मकरूप से अभिघातज घटना का पुनःअभिनय करते हैं, अति-उत्तेजना की अवस्था में रहते हैं……… अति कामुक हो जाते हैं अपनी भाषा एवं व्योहार से, माँ की आकृतियों से प्रतिरोधी का भाव उत्प्पन कर लेते हैं, व्यसक कामुकता से भय एवं प्रायः आत्महत्या का प्रयत्न करते हैं I ये सूची रामकृष्ण के जीवन के संक्षिप्त धार्मिक जीवन की व्याख्या करती है” I

तथापि, जैसा कि स्वामी त्यागानन्द प्रत्त्युत्तर देते हैं:

कोई भी लक्षण जो क्रमांकित किये गए हैं “यौन-अभिघात के साहित्य” में, रामकृष्ण के जीवन से नहीं हैं I परन्तु, चूँकि, कृपाल पूर्वनिर्धारित निर्णय में प्रवेश कर चुके हैं, वे आश्रय लेते हैं ऊपरी आकर्षण के विवेक का, अपने मत को तर्क सिद्ध करने हेतु जो की उनके मस्तिष्क में है I रामकृष्ण ने “सुस्पष्ट किया था समलैंगिक झुकाव का”, अतएव उन्होंने निश्चित ही स्वयं, बाल्यवस्था में, यौन-अभिघात का अनुभव किया होगा, अतएव उनको निश्चित ही अब उस अभिघातज घटना का पुनः अभिनय करना होगा I ये अभ्यास एक दुर्बल-कड़ी के समान है जो एक स्मरणशील कंगारू – न्यायलय की भाँति है जहाँ पर बंदी को अपराधी पहले घोषित कर दिया जाता है, और तत्पश्चात “प्रमाण” निर्माण अत्यधिक सुविधाजनक समय लेकर किया जाता है I” [१८]

४) अशुद्ध अनुवाद, “गोद” को “गुप्तांग”, एवं तत्पश्चात उसको “ संकीर्ण कामुक अंतराल “ बताना :

कृपाल के प्रथम प्रकाशन में, बंगाली शब्द “गोद” को अनुवाद किया गया “गुप्तांग पर”. दुसरे प्रकाशन में कृपाल, परिवर्तन करके कुछ इस प्रकार दर्शाते हैं: “ये स्पष्ट है कि रामकृष्ण “इस गोद” को सामान्य रूप से संकीर्ण यौन अंतराल समझते थे I”[१९]

त्यागानन्द उत्तर देते हैं:

क्यों लेखक गोद (कोल) को “सामान्य संकीर्ण” समझते हैं? भारतीय सभ्यता में – एवं बंगाली सभ्यता में, विशेषकर – गोद अत्यंत ही सकारात्मक एवं स्नेही मातृक संपर्क माना जाता है I उदाहरण के लिए जो राष्ट्रिय गीत है बांग्लादेश का, जो कि टैगोर द्वारा लिखा गया था, निम्मनलिखित पंक्तियाँ हैं उसमें: “ताखों खेला धुला सकल, ओ माँ तोमर, कोले छूते अशी “I अनुवाद : “दिनभर की क्रीड़ाओं के समाप्त होने पर, हे माँ, मैं दौड़ कर तुम्हारी गोद में आ जाता हूँ”I

५) “मस्तक” को “लिंग प्रतिमान” अनुवाद करना:

कृपाल इस अनुवाद को न्यायसंगत बताते हुए कहते हैं कि “मस्तक = लिंग प्रतिमान” है, हिन्दू मूलग्रन्थ में क्यूंकि, उनके अनुसार, ” योग एवं तंत्र [हैं] के रहस्य्मय शरीरविज्ञान में मस्तक, अंतिम लक्ष्य है स्वयं के वीर्य का अतएव “लिंग प्रतिमान” उचित चिन्ह है। “[२०]

६) “मृदुलता से छूना” का “पुरुष मैथुन” अनुवाद करना:

अपने अशुद्ध अनुवाद के अनुसार “मृदुलता से छूना” को सामान माना है “पुरुष मैथुन” की भांति, कृपाल घोषणा करते हैं कि रामकृष्ण “अवज्ञा मलाई करते थे चन्दन – लेप का नवयुवकों के गुप्तांगों पर I”[२१]

त्यागनन्द समझाते करते हैं:

“मैं निश्चित रूप से स्वीकार करता हूँ कि जब मैंने कृपाल के “मुरदुल छूने” का अनुवाद पढ़ा (असते असते अपर्षा कोरछें) एक “पुरुष मैथुनता” की प्रयत्न भांति, तो मैं मात्र हँस पड़ा”I भारतीय सभ्यता में, बच्चों को प्यार से, प्रौढ़, स्नेहपूर्वक थपकी देते हैं एवं दुलारते हैं। उसमें कोई भी मैथुनिक भावना नहीं होती है I संभवतः, ये ज्ञानी अपनी संस्कृति की, बच्चों की ओर की, भावना-रहित भाव हम पर थोप रहे हैं I

७) “त्रिभंग” को “उठा हुआ कूल्हा” अनुवाद करना:

कृपाल, जो बंगाली मूलग्रंथ का प्रयोग करते हैं, उसमें परिभाषित एक शब्द है “त्रिभंग”, विशिष्ट लक्षण वाला घुमावदार मुद्रा जो कि भारतीय मूर्ती एवं भारतीय पारम्परिक नृत्य (त्रिभंग = संस्कृत ‘ तीन मोड़’) I ये भी कृष्ण की सामान्य मुद्रा है अपने शरीर को तीन भागों–घुटने से, कमर से एवं कुहनी से — हांथों में मुरली लिए हुए। एक सामान्य भाव प्रयोग किया जाता है श्री कृष्ण भगवन को व्यक्त करने के लिए भक्ति गीत में “त्रिभंगी-लाल”I

तथापि। कृपाल अनुवाद करते हैं इस मुद्रा को “उठा हुआ कूल्हा” दर्शाते हुए एवं इसको प्रयोग करके निष्कर्ष निकलते हैं कि “इस उठे हुए कूल्हे को देखकर रामकृष्ण भौचक्के हो जाते हैं एवं समाधी में लीं हो जाते हैं I”[२२] ये कृपाल की “विद्द्वता का प्रमाण है” कि रामकृष्ण की रहस्य्मयी अवस्था सम-कामुक थीं!

चूँकि कृष्ण अधिकतर शरीर के तीन स्थानों से मुड़े हुए दर्शाये जाते हैं, हाँथों में मुरली लिए, कृपाल के मनोविश्लेषण के अनुसरण से वो किसी भी कृष्ण भक्त का प्रेम इस मुद्रा के लिए, उस भक्त की समलैंगिक उत्तेजना उत्पन्न होगी, कृष्ण द्वारा, उनके इस “उठे हुए कूल्हे ” की मुद्रा से I

८) कृपाल की कल्पनाओं का अनियंत्रित दौड़ना:

रामकृष्ण की भेंट, नागा संघ के एक सन्यासिन के विपलक्ष्य में, कृपाल मात्र ये मान लेते हैं कि, ऐसा बृहत कुछ हो रहा था जिसके विषय में कोई अभिलेख नहीं है चाहे जो कुछ भी हो:

“[क्या] हुआ होगा रामकृष्ण जैसे, एक समलैंगिक अभिविन्यस्त मानव, कई दिनों तक एक छोटी सी झोपड़ी में दूर, बंद रहकर, एक अन्य नितांत – नग्न पुरुष के साथ I वेदांत के अनुदेश या नहीं? ये इस परुष की नग्नता थी, और विशेषकर, उसका गुप्तअंग, जिसने सामान्यतः रामकृष्ण का ध्यान आकर्षित किया। कैसे नहीं करता?”[२३]

९) “व्याकुलता” को “मैथुनिक घुमाव” अनुवाद करना:

बंगाली शब्द “व्याकुलता” के सन्दर्भ में, त्यागनन्द प्रमाणित करते हैं कि “ऐसा कुछ भी नहीं है शब्द में जो संकेत करे “काम वासना” की ओर, जो विशिष्ट रूप से कृपाल के लिए, सुविकृत दे कामुक संकेतार्थ का … बंगाली शब्दों पर अत्यधिक कामुक इंगित भार लाद देना, पूर्ण मूलग्रंथ के अर्थ को अपभ्रंश कर देना है”I तथापि, कृपाल अशुद्ध अनुवाद करते हैं इस शब्द का, इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए : “रामकृष्ण की व्याकुल कामुक इच्छाएं प्रायः अपने नवयुवक भक्तों की ओर संचालित थीं। “[२४]

१०) “उद्दीपन” को “कामोद्दीपक” अनुवाद करना:

अन्य एक बंगाली शब्द जो कृपाल द्वारा अशुद्ध किया गया है, वो है: “उद्दीपन”I त्यागनन्द के अनुसार, शब्द का अर्थ है “प्रज्वलित” करना या “उत्साहित” करना। किन्तु कृपाल मनमाने ढंग से उसे नए अर्थ प्रदान करते हैं, सम-कामुक उत्तेजना का, अपने अनुवाद में: “रामकृष्ण नवयुवकों की ओर आकर्षित होते हैं और कहते हैं: कृपया आज ना जाओ I जब भी मैं तुम्हारी ओर देखता हूँ, तब मैं पूर्णतः उत्तेजित हो जाता हूँ.”[२५]

११) विशेष प्रभाव का अंदरूनी क्षेपण:

अपने शोध को कामुक के विशेष चटपटे मसालेदार प्रभाव देने के लिए, जैसा की किसी हिंदी चलचित्र की कथाओं के लिए लिखा जाता हो, कृपाल कहावत का सन्निवेश करते हैं “उसका लगभग नग्न शरीर”, लीलाप्रसंग की ओर संकेत करते हुए I तथापि, स्वामी त्यागनन्द लिखते हैं कि, ध्यानपूर्वक पूरी लीलाप्रसंग ग्रन्थ के, निरिक्षण के पश्चात, वे कहते हैं कि, “कहीं भी लीलाप्रसंग में किसी भी बालक के नग्न होने का वर्णन नहीं है”. इसी प्रकार, चूँकि कृपाल घोषणा करना चाहते हैं कि मंदिर के परिचालक ने “लैंगिक होने के कारण अपने आपको रामकृष्ण पर बलपूर्वक स्थापित किया”, वे नाटकीय रूपांतर से अनुवाद करते हैं मंदिर के “परिचालक” का “नियंत्रण करता” के रूप में I

अन्य और भी कई रहस्य्मयी एवं विचित्र टिप्पणियां हैं जो कृपाल, बीच में टोंकते हैं, बिना किसी कठोर उपयुक्त लगन के, अपने विषय को वास्तविक रूप से समझने की शैली के आधार पर I उदहारण के लिए, त्यांगनन्द समझते हैं की: “कृपाल संभवतः अपने सर्वोच्च उपहासपूर्ण अवस्था में होंगे जब वे हमें कहते हैं कि रामकृष्ण की वेदांत कार्यप्रणाली, दक्षिणेश्वर मंदिर में मात्र वैरागी – परण एवं ड्योढ़ी में भात कहने तक ही युक्त है” I

१२) सच्चाई का दमन:

रामकृष्ण के जीवन की महाकाय ऐतिहासिक अभिलेख में पर्याप्त से भी अधिक सामग्रियाँ हैं, यथार्थ गणना है, प्रदान करने के लिए, उनके जीवन के सिद्धांतों एवं उनके शिक्षण और प्रथा के सन्दर्भ में । तथापि, चूँकि वो कृपाल के कार्यों की सीमा के निष्कर्ष के विरुद्ध है, वे पूर्णतः नकार देते हैं उन प्रमाणों को जो उनके लेख के विरुद्ध हैं I त्यागनन्द आरोप लगाते हैं:

कृपाल ने ग्रन्थ से कई भागों को हटा दिया है, जिसको वे प्रस्तुत करते हैं, कारण, उनके लेख के विरुद्ध जो ज्ञान है उसका वे दमन कर देते हैं…… क्या ये सरल रूप नहीं है नियंत्रक-व्यवस्था का?”

कृपाल की, सौम्य मौखिक एवं प्रीतिकर आचरण ने धोका दिया कई भोले-भाले भारतियों को, जो प्रायः इस पर विश्वास करने से मना करते हैं कि वे सच्चाई को झूठलाने का ऐसा घोर प्रयत्न करेंगे। किन्तु त्यागनन्द उनको कई बार रंगे-हाँथों पकड़ लेते हैं। उदाहरण के लिए:

“कृपाल कहते हैं कि उन्होंने कुछ भी कदापि एकपक्षीय चर्चा नहीं की है, कि रामकृष्ण एक समलैंगिक पुरुष थे [नव युवकों के कामुक प्रेमी] ….. यद्दपि उनहोंने संभवतः वे शब्द अपनी पुस्तक में उपयोग नहीं किये होंगे, वह निश्चित ही उनकी धारणा रही होगी जिसने उनके निष्कर्षों का मार्गदर्शन किया। कैसे इसके अतिरिक्त कोई उनका ये पत्र समझा सकता है (१४ अगस्त १९९६) जो लिखा गया था रामकृष्ण वेदांत संस्था के सचिव को, बोस्टन में, जिसमें उन्होंने लिखा था कि वो तो नितांत ही “प्रतक्ष्य” है कि “रामकृष्ण की रहस्य्मयी अवस्थाएं सहगत थीं, एवं संभावनाएं उत्त्पन करती थी, नैतिक समस्यात्मक, बल-यौन शोषणों के कृतियों के बीच I”[२६]

 १३) कंगारू – न्यायालय की भाँति श्री रामकृष्ण की सुनवाई:

त्यागनन्द, कृपाल के क्षात्रवृद्धि के नाम पर, प्रयोग की गयी विधियों का संक्षिप्त में वर्णन करते हैं:

चूँकि कृपाल इच्छुक हैं रामकृष्ण का सम्बन्ध बालकों के साथ स्थापित करने हेतु, चाहे जो भी हो, हमें अचरज नहीं करना चाहिए कि वे पहले संदेह करते हैं और तत्पश्चात मान लेते हैं, इसके उपराँत वे उसे सत्य मानकर ये प्रस्तुत करते हैं कि रामकृष्ण को बाल्यावस्था में प्रताड़ित किया गया था —–और इसका कोई प्रमाण नहीं है, इस से भी डॉ. कृपाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; हमारे पास प्रभाव है — रामकृष्ण की “सम-कामोत्तेजक लालसा की “—- तो अब निश्चित ही इसका कारण पता करेंगे I आहा! निश्चित ही वे बाल्यावस्था में यौन-शोषण का शिकार हुए होंगे I रामकृष्ण को आध्यात्मिक प्रहर्ष का बचपन में जो अनुभव हुआ था, वही अब पुनः भाषांतर हुआ है “चिंताजनक भाव-समाधी” में I [२७] उनमें से सर्वाधिक “चिंतित” जो पाए गए वे थे कृपाल जो की विवश हैं यौन-प्रताड़ना को कहीं ना कहीं उनमें ढूंढने के लिए।”

प्रफुल्ल्तापूर्वक अपने हंथेलियों को मलते हुए, जेफ्री कृपाल घोषणा करते हैं: “रामकृष्ण के समलैंगिक आवरण …… बंद होता हुआ प्रतीत होता है …. काली के बच्चे, उचित होने के लिए …… विद्द्वानों द्वारा सराहे गए हैं I”[२८]

तथापि, त्यागनन्द उत्तर देते हैं: “विस्मयपूर्ण बात है कि, क्या किसी ने भी, जो उनकी पुस्तक के प्रशंसक हैं उनमें से, कभी भी उसके अवतरणों का अध्ययन किया होगा. क्या उनमें से कोई भी विद्द्वान जिन्होंने पुस्तक की अत्यंत जयजयकार की है, क्या कभी भी वास्तव में उन बंगाली सूत्रों को पढ़ा है, जो वे प्रस्तुत करते हैं? यदि हैं भी, तो कितने हैं, जिन्होंने ने वास्तव में बंगाली पढ़ी है“?

हूस्टन स्मिथ, संभवतः अत्यंत ही दूर-दूर तक प्रचलित, धार्मिक विषयों के अध्ययनशील पश्चिमी विद्द्वान अभी तक के माने जाते हैं, उन्होंने गंभीर रूप से आलोचना की है कालिस चाइल्ड (काली के बच्चे) की, हार्वर्ड डिविनिटी बुलेटिन में, इस प्रकार की क्षात्रवृद्धि को, “उपनिवेशवाद का नवीनीकरण” बतलाते हुए I”[२९] स्वीकृति दी है कि, वेंडी की मंडली को, आरम्भिक वृद्धि मिलने का कारण कपट से क्षात्रवृद्धि का मिलना है, किंतू मैं इसको मानने के लिए स्वीकृति नहीं देता हूँ कि उनका कथन ही अंतिम कथन है I

१४) आलोचकों के मनोविश्लेषण द्वारा, आलोचनाओं को कुटिलता पूर्वक नकार देना:

त्यागनन्द अस्वीकार करते हैं कृपाल के, हिंदुयों की कथित संकीर्ण-मानसिकता पर प्रकाश डालने के प्रयत्नों का, इसको वे छिछिलेपन की चाल मानते हैं, कृपाल अपने व्यर्थ क्षात्रवृद्धि की ओर से ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा करते हैं:

इस कारण, ये कहना कि, जो लोग कृपाल के लेख को त्याग चुके हैं वे समलैंगिकों से भयभीत हैं, पूर्णतः असत्य है, ये मात्र, केंद्र बिंदु से भटकाने वाली बात है ……. संक्षेप में: जिस समस्या का विवरण मैं अपनी आलोचना में कर रहा हूँ वो वास्तव में कामुकता अध्ययन नहीं है. समस्या का कोई लेना देना नहीं है समलैंगिकता से I समस्या है, प्रमाणों से, विशेषकर बृहत अशुद्धीकरण एवं अनुचित उपयोग का, महाध्यापक कृपाल द्वारा उनकी पुस्तक में I जहाँ पर पर्याप्त प्रमाण हैं, तो वहां रहने दो सम – कामोत्तेजक , विविध- कामोत्तेजक या कामोत्तेजक अध्ययन, साधुओं के जीवन एवं अभिप्रेरणा की — और विद्द्वानों की ! परन्तु प्रमाणों को निर्मित ना किया जाये!”[३०]

और पुनः

अनुकूल कथन के लिए, कि, आलोचनाएं जो कालिस चाइल्ड के विरुद्ध हुईं, उसका कारण [आलोचक] सम-लैंगिकता का भय था, ये तुच्छ एवं कुटिल क्षात्रवृद्धि के मुख्य विषय से भ्रमित करने के लिए था……भारत में एवं रामकृष्ण भक्तों में,अपनी पुस्तक के सन्दर्भ में क्रोध प्रतिक्रिया के विषय में चर्चा करते हुए कृपाल मानते हैं कि उनका उपद्रव, उनके समलैंगिकता के भय के भाव को दर्शाता है…. अब पवित्र चेतावनी के उभरते हुए, गिरिजाघर के संगीत-मंडली के पूर्ण उभार के समान , कृपाल निवेदन करते हैं: “मैं मात्र उनको प्रोत्साहन दे सकता हूँ कि वे इस राह पर ना जाएं, क्यूंकि हमारी मानवता (एवं देवत्त्व ) विभिन्न दिशाओं में निर्धारित है I”

(Will Continue…)

Translator: Vandana Mishra.
Original Article:
RISA Lila – 1: Wendy’s Child Syndrome
URL: https://rajivmalhotra.com/library/articles/risa-lila-1-wendys-child-syndrome/
Featured Image Credit – Swarajyamag.com

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