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रीसा लीला-२: लंगड़ी छात्रवृति एवं पैशाचिकी

Translation Credit: Vandana Mishra.

राजीव मल्होत्रा के पदधारी पृष्ट का फेसबुक पर अनुसरण कीजिये I

पृष्टभूमि

बढ़ता हुआ भारतीय प्रचार क्रमश: सीख रहा है कि, कैसे उसकी धरोहर अमरीकी शैक्षिक व्यवस्था में, उचित एवं अनुचित रूप से चित्रित की गयी है और उसकी तीव्र इच्छा इस व्यवस्था में लीन हो जाने की, उसी की भाँति, जैसा की पहले से ही किया गया है अन्य अमरीकी अल्पसंख्यकों के द्वारा, जैसे, यहूदी, मुसलमान, चीनी, जापानी, कोरियाई, अफ्रीकी-अमरीकी, हिस्पैनी एवं मूल अमरीकी निवासी I

 इस अनुबंध को आवश्यकता है प्रचार करनेवाले सदस्यों को समान सहभागी बनाने की, उस चर्चा-कोष्ठक पर जहाँ पर भारतीय परम्पराओं का विषय हो——जिसमें विद्यालय, महाविद्याला, संग्रहालय, संचार माध्यम, राजनैतिक विचार मंच एवं संयुक्त नीति सभाएं सम्मिलित हों।

तथापि, इस प्रकर की गद्दी प्राप्त करने में कई जटिल संधिक्रम की कार्यविधि सम्मिलित है, क्यूंकि जो आश्रयी हैं, वे आरोपित हैं इन संस्थाओं में और वे प्रायः किसी भी सत्ता-सहभाजन को अपने प्रभुत्व के तनुकरण होने के रूप में देखते हैं I

अंग्रेज़ों के द्वारा भारतियों की शीघ्रातिशीघ्र उपजीविका, जिसका काल-निर्धारन उन लोगों ने किया है, शैक्षिक छात्रवृति में, उसमें प्रायः भारत और उसके धर्म, उसकी सभ्यता और परम्पराओं के अध्यन एवं चित्रण में सर्वदा असाधारण सभ्यता किसी दूरस्थ एवं अनगढ़ लोगों के विषय में दर्शायी जाती है I कई पीढ़ियों तक, ये दृष्‍टिकोण बिना किसी के चुनौती दिए व्याप्त रही I यद्यपि, नूतनकाल में, कई बहुसंख्य भारतीय शिक्षितों ने, और साथ ही साथ कई आधुनिक अमरीकी विद्द्वानों ने, ढूंढ लिया है इस दृष्टिकोण को पुनः उकसाने और विद्वत्तापूर्ण  पुनः  संभाषण करने योग्य, जिससे ज्ञान का विस्तार होगा और परम्पराओं की  जागरूकता बढ़ेगी I एक महत्वपूर्व मात्र में विद्वत्तापूर्ण समूह, इससे जुड़ कर एक कमबीन एवं कालविरुद्ध दृष्टिकोण प्रचलित किये हुए है I

इसके अतिरिक्त, इस प्रकार की छात्रवृति दुर्भाग्यवश असफल है, आभार प्रकट करने में, इन परम्पराओं के अनुयायी का, जो अनगढ़ विदेशी नहीं हैं, बल्कि वे तो बढ़ते हुए भारतीय-अमरीकी पड़ोसी, वैद्य, सहपाठी एवं मित्र हैं I  इसके अतिरिक्त, ये असफल हैं, ये मान्यता देने में कि, ये परम्पराएं अपनी अनुयायी बृहत मात्रा में अमरीकी एवं अन्य पश्चिमी लोगों में अपना स्थान बना रही है जिनके अनुसार ये अत्यंत ही अप्रतिरोध्य एवं महत्वपूर्ण है I ये बढ़ते हुए अमरीकी समाज में, भारतीय समुदाय एवं भारतीय सभ्यता की उपस्थिति एवं सहभागिता, ना मात्र नूतन बहुमूल्य संसाधन प्रदान करती है अध्ययनशील अनुसंधान की ज्ञप्ति के लिए बल्कि, ये माँग करती है कि विद्द्वान और भी अधिक जागरूक और संवेदनशील बने परम्पराओं और उनके अनुयायी के।

नीचे दी गयी घटनाएं सचित्र व्याख्या करती हैं कि, किस प्रकार, प्रचार सुविधाहीन है, संधिक्रम प्रक्रिया से प्रवेश करने के प्रयत्न में इस पश्चिमी शैक्षिक ढांचे में I कई प्रचारक नेताओं ने चयन किया है सुस्पष्टी ना करने का, अपने देशावरी दृष्टिकोण के उजागर होने के विषय में (कई, कोई संदेह ना होना, कदापि किसी मूल भारतीय दृष्टिकोण का ना होना, यूरोकेन्द्रिक शैक्षिक व्यवस्था में उत्थित होना)I कई आध्यात्मिक अधिनायक कुसवारी में ही स्थित रहे, अपने सुरक्षा अंतर्मुखीय आध्यात्मिक समूह में, और आवश्यक कौशल के आभाव के कारण वे विश्व के सन्दर्भ में, सफल संधिक्रम करने में, असफल रहे अपनी सभ्यता की एकात्मता स्थापित करने की ओर से I अतएव, इन ज्ञानी व्यक्तियों को ढूंढना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, जो की समर्पित हों संतुलित एवं निष्पक्ष परंपरा की चर्चा पर , और इच्छुक हों शत्रुतापूर्ण परिवेश के मध्य में साहसी बने रहने के, जब कि ये अत्यंत ही सरल है, वर्तमान में किसी शैक्षिक केंद्र में, किसी नास्तिक, मार्क्सवादी भारतीय को पाना, जो अत्यंत प्रसन्न हैं भारतीय परम्परों को कूड़ा-करकट को सौंपने के I

इस नेतृत्व के शून्यता ने वंश-वृद्धि किया, अतिबाहुल्य स्वयं-नियुक्त कर्मण्यतावादीयों का, जिनमें प्रायः अभाव रहता है विशेषज्ञता का, किसी वयवस्था में प्रभावशाली रूप से व्यस्त रहने हेतु I इसके उपरांत भी, ये संभवतः अंश हो सकता है विभिन्न सांस्कृतिक विचारों के आदान प्रदान के शिक्षा प्रणाली का I

भारतीय परम्परों के विषय में, इस सभ्यता प्रवचन के भंवरजाल जो शैक्षिक परिषद् में सम्भवतः चित्रित किये गए हैं शीघ्र – गतिमान घटनाओं के क्रम से जो नूतनकाल में घटित हुए हैं I ये निबंध नीचे सूची रूप में संरचित है:

१. गणेश के “शिथिल शिश्‍न” के चित्रण के विरुद्ध आवेदन।

२.  पॉल कोर्टराइट से संभाषण।

३. आवेदन का प्रत्यालोचन।

४. उनको रोकने का आतंक और प्रयास।

५. अन्य रीसा लीला का आरम्भ।

६. भारत में: मोतीलाल बनारसीदास द्वारा पुस्तक हटा लेना।

७. “मंगल का बहिष्कार” एवं “अमंगल का बहिष्कार”I

८. “अमंगल के विरुद्ध मंगल” पिशाची आखेटका आरम्भ। 

९. वास्तविकता का अस्त होना।

१०. रीसा की कल्पित कथा I

११. विश्व में पुनः अपने स्थान के लिए मोल – भाव करना।

१२. १४ वर्षीय भारतीय-अमरीकी छात्रा द्वारा एक पत्र।

१. गणेश के “शिथिल शिश्न” के चित्रण के विरुद्ध आवेदन

६ अक्टूबर २००३ में, मुझे एक ईमेल प्राप्त हुआ जो कि बृहत मात्रा में वितरित किया गया था, जिसमें लोगों से ऑन-लाइन याचिका पर हस्ताक्षर करने का निवेदन किया गया था I वो पहली बार था जब मैं ने याचिका पढ़ी, और इसके पूर्व लेखक से मेरा कोई संपर्क नहीं था I वेब याचिका प्रष्ट में लिखा था:

आरम्भिक उद्धरण:

ईश्वर गणेश एवं हिन्दू धर्म के अपमान की पुस्तक का विरुद्ध

एमोरी महाविद्यालय के सभापति जेम्स डब्लू वैगनर, जॉर्जिया की राज्याधिकारी सनी परदुइ, यू.एस.ए के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश, भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, भारतीय संसद के सदस्यों, यू.एस-भारत के कंग्रेस संबंधी दल के सदस्यों एवं यू.एस के अधिकृत महान्यायवादी, ऐश्क्रॉफ्ट।

महाध्यापक पॉल कोर्टराइट द्वारा लिखी एक पुस्तक है जिसका शीर्षक: “गणेश — अड़चनों के ईश्वर, आदि के ईश्वर” है, एमोरी महाविद्यालय, एटलांटा जॉर्जिया, यू.एस.ए के धार्मिक विभाग में I यू.एस.ए में प्रथम प्रकाशन, १९८५ में प्रकाशित हुआ, ऑक्सफ़ोर्ड महाविद्यालय प्रेस संयुक्त संगठन द्वारा। प्रथम भारतीय प्रकाशन, २००१ में प्रकाशित हुआ, मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन निजी संगठन द्वारा., जिसमें मुख पृष्ठ पर एक नग्न चित्र दर्शाया गया था, जो अपमानजनक अर्थ प्रकाशन, सीधे उसी पुस्तक से निकला गया था I

२००१ की पुस्तक के प्रकाशन के मुख्य प्रष्ट पर बने, नग्न चित्र को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।

यहाँ पर लेखक की कुछ अश्लील व्याख्याएं प्रस्तुत हैं:

—-“इनकी (गणेश की) सूँड एक विस्थापित शिश्‍न है, शिव के लिंग का एक हास्य चित्र I इस से कोई भय नहीं है क्यूंकि ये अत्यंत बृहत, शिथिल, और अनुचित स्थान पर स्थित होने के कारण सम्भोग के लिए भी उपर्युक्त नहीं है।” (पृष्ट १२१)

—-“वे [गणेश] अविवाहित हैं क्यूंकि, वे अपने पिता से कामोत्तेजक प्रतिस्पर्धा करने में इच्छुक नहीं हैं, वे एक कुख्यात व्यभिचारी हैं, या तो अगम्यागमनात्मक रूप से अपनी माता के लिए या उसी कारण किसी अन्य स्त्री के लिए I”(पृष्ट ११०)

—-“अतएव गणेश अपने पिता के गुणों को धारण लेते हैं एक औंधे रूप में, और इसी करण उनकी लंगड़ी शिश्न-आत्मसंयमी अत्युक्ति के रूप में और भद्र रूप में है — जबकि शिव की “कठोर”(उर्ध्वलिंग), कामुक एवं विध्वंसक है I”(पृष्ट १२१)    

—-“अपने व्यवहार और अपनी प्रतिमान-विद्द्या रूप, दोनों में ही गणेश समानरूप से किंचित आचरणों में, एक नपुंसक आकार की भाँति हैं …… गणेश एक हिजड़े के समान हैं, जो स्त्रीगृह के संत्री के रूप में नियुक्त हैं I”(पृष्ट १११)

—-“यद्यपि ऐसा किसी भी पौराणिक कथा या लोक कथा से प्रतीत नहीं होता है जिसमें कि, गणेश स्पष्टतया मुख मैथुन कर रहे हों; तब भी उनकी अतृप्य मिष्ठान की भूख को संभवतः ऐसा माना जा सकता है, जैसे उनके द्वारा किया गया इस भूख को संतुष्ट करने का प्रयास, जो अनुचित है अन्यथा तपस्वी प्रकृति, के पश्च्यात, एक भूख का जिसका स्पष्ट संकेत है, कामुक औंधापन।”(पृष्ट १११)

—-“गणेश का टुटा हुआ गजदंत, उनके संरक्षकों एवं उनका विस्थापित शीर्ष को पुंसत्व-हरण के चिन्ह के रूप में भाषांतरित किया जा सकता है I”(पृष्ट १११)

—-“गणेश को प्रचुरतापूर्वक मात्रा में मोदकों से भरण, उनके मौखिक/कामुक इच्छाओं की पूर्ती, ये सभी उनको मैथुनिक रूप से अपने पिता की अपेक्षा कामुक होने से दूरस्थ करते हैं I” (पृष्ट ११३)

“अविरत पुत्र इच्छुक रहता है अपनी माता के निकट रहने के और मिष्ठान के लिए अतृप्य भूख उत्पन्न करती है उसकी मौखिक कामोत्तेजक मेल भावनाओं का I अपने पिता के सर्वशक्तिमान प्रचण्ड रूप से व्याप्त होने के कारण, वे पूर्ण रूप से पौरुष यौन के स्तर को प्राप्त नहीं कर सकते, इस कारण, पुत्र इच्छुक है, किसी अनुकूल मार्ग से, तृप्ति प्राप्त करने के लिए I” (पृष्ट ११३)

कई अन्य अत्यंत कपटी अवतरण इस पुस्तक में हैं, जिसका लक्ष्य मात्र गणेश की महिमा को कलंकित करना नहीं है, बल्कि शिव एवं पार्वती की भी महिमा को कलंकित करना है:

“शिव के द्वारा पार्वती को कलुवी [काली] सम्बोधित करने के कारण, उन्होंने शिव को त्यागने का प्रण लिया और अपने पिता के घर पुनः आ गयीं, तत्पश्चात उन्होंने अपने अन्य पुत्र को वहाँ नियुक्त किया, वीरका —- जिसको शिव ने निर्मित किया था — द्वारमार्ग पर एक भेदिया के रूप में, अपने पति के विवाहेतर प्रेमप्रवण शोषण पर ध्यान देने के लिए I” (पृष्ट १०५ -१०६)

हमें विश्वास है कि ये स्पष्ट उदाहरण है, द्वेष पूर्ण-अपराध का जो थोपा गया है, निष्छल हिन्दू समाज पर जो गणेश, शिव एवं पार्वती के उपासक हैं I

हम सभी अधोहस्ताक्षरी, दृढ़तापूर्वक आप से अनुरोध करते हैं कि, अनिवार्य कार्यप्रणली चलायी जाए निम्नलिखित अभियोग की उपलब्धियों के लिए:

१) लेखक एवं संपादक (संपादकों) को हिन्दुओं से असंदिग्ध क्षमायाचना करना होगा I

२) लेखक को कई उपरोक्त आक्रामक अवतरणों को काटना होगा और संशोधन करके पुस्तक के विषय में स्पष्टीकरण एवं विशुद्धीकरण प्रस्तुत करना होगा I

३) संपादक (संपादकों) को शीघ्र अति शीघ्र इस पुस्तक को प्रसारण माध्यम में से, हटाना होगा और लेखक को इस पुस्तक का शैक्षिक परिषद में प्रयोग बहिष्कृत करना होगा I

निष्ठावान,

विरोध उस पुस्तक का जो भगवन गणेश और हिन्दू धर्म का अपमान करती है I निम्नलिखित को याचिका:

एमोरी महाविद्यालय के सभापति जेम्स डब्लू वैगनर, जॉर्जिया की राज्याधिकारी सनी परदुइ, यू.एस.ए के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश, भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, भारतीय संसद के सदस्यों, यू.एस-भारत के कंग्रेस संबंधी दल के सदस्यों एवं यू.एस के अधिकृत महान्यायवादी, ऐश्क्रॉफ्ट।

बनायी गयी थी हिन्दू परिषद के छात्रों द्वारा– लेफयेत्ते, लोसियाना के महाविद्यालय में, और हच.एस.सी–उ.एल.एल के सभाध्यक्ष देवेंद्र पुटनिस, द्वारा लिखी गयी थी I

अंत उद्धरण


(Will Continue…)

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