प्रथम स्वदेशी इंडोलोजी कांफ्रेंस – राजीव मल्होत्रा जी के भाषण के अंश

करीब २० साल पहले इन्फिनिटी फाउंडेशन ने यह समझना चाहा कि अमेरिकी अकेडेमिया में भारत से सम्बंधित विषयों पर क्या और कैसा शोध होता है? इसलिए हमने उन जगहों को पैसा देना शुरू किया जहाँ भारत से सम्बंधित विषयों पर अध्ययन हो रहा था – हार्वर्ड, कोलंबिया यूनिवर्सिटी आदि।

हमारा मूल विचार था कि वे जगहें जहाँ भारत के बारे में शोध हो रहा है, वहां इन्फिनिटी फाउंडेशन उन्हें प्रोत्साहित करेगी और अगर हमें लगा कि उन्हें किसी और दिशा में शोध करनी चाहिए तो हम उन्हें ऐसा करने को प्रोत्साहित भी करेंगे । १० साल बाद हमें एहसास हुआ कि हमारा मूल विचार अमल में नहीं आ पा रहा है और हमें कुछ काम खुद ही करना होगा । हमने समझा कि आप अपने से सम्बंधित विचारों में बदलाव लाने के लिए काम बाहर  आउटसोर्स (outsource) नहीं कर सकते ।

एक और बात, विदेशी विद्वानों (इंडोलोजिस्ट्स, Indologists), ने अभी तक जो अध्ययन किया था, वे उससे बिल्कुल अलग कुछ करने को तैयार नहीं थे । इसलिए हम समझ गए कि यह काम हमें खुद ही करना होगा ।

तथापि मैंने काफी कुछ सीखा । हार्वर्ड हर साल एक इन्डोलोजी गोलमेज सम्मेलन  कराता था, जिसको इन्फिनिटी फाउंडेशन प्रायोजित करती थी । मैंने देखा कि इस सम्मेलन  में हार्वर्ड ने एक बहुत ही अंतःविषय दृष्टिकोण (इंटर-disciplinary एप्रोच) लिया था । वे संस्कृत विद्वानों के अलावा पुरातत्वविदों, वनस्पति-वैज्ञानिकों, कला-इतिहासकारों, गणितज्ञों, खगोलविदों, जेनेटिक वैज्ञानिकों आदि को भी बुलाते थे ।

वहां मैं भारतीयों में अकेला होता था जो बैठ के नोट्स लिख रहा होता था, और हमारे पक्ष से प्रश्न उठाता था । उस सम्मेलन  में भारतीय भी आमंत्रित थे, मगर वे अपने ही क्षेत्र में कार्य करते रहते थे । कोई एक ही विषय का जानकार था, कोई पुरातत्त्ववेत्ता था जो कलाकृतियों को खुदाई कर के निकाल तो लेता था मगर उनकी सही विवेचना करना नहीं जानता था । कोई कला इतिहासकार था मगर उसे संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं था । इस तरह हमारे लोग अपने छोटे छोटे दड़बों में कार्य कर रहे थे – और यह पृथा ब्रिटिश काल से ही चल रही थी। समग्र रूप से हम भारतीयों ने काम बहुत कम किया है ।

हार्वर्ड वाले हमारा अलग अलग डाटा लेकर उसे एक साथ लेकर आते हैं और फिर अपने हिसाब से उसकी व्याख्या करते हैं और फिर इसी व्याख्या को अन्तराष्ट्रीय स्वीकृति मिल जाती है – सब जगह यही व्याख्या इस्तेमाल होती है ।

अब नयी सरकार के आने के बाद हमें लगा हमारे प्रयासों को कुछ समर्थन मिलेगा और इसलिए हमने स्वदेशी इन्डोलोजी सम्मेलन आयोजित किया है ।

यह पहला सम्मेलन शेल्डन पोलाक पर केन्द्रित है – इसका कारण है कि इस साल की शुरुआत में हमने एक पुस्तक लिखी थी ‘बैटल फॉर संस्कृत’ (The Battle For Sanskrit) । उस पुस्तक का छपना अत्यावश्यक था क्योंकि  श्रृंगेरी मठ और कुछ यूनिवर्सिटियों में एक अनुबंध होने ही वाला था – मैं चाहता था कि शंकराचार्य जी को कम से कम पूरी बात पता तो चले । इसके अलावा भी कुछ और परियोजनाएं थीं । मुझे ख़ुशी है कि जबसे मैंने उपरोक्त किताब लिखी, तो उनमे से कई परियोजनाएं बाधित हो गयी हैं या पूरी तरह रोक दी गयी हैं । मगर ध्यान रहे कि केवल बाधित करने से ही काम नहीं बनने वाला है । हमें इससे आगे भी कुछ करना है ।

अब हम दूसरे मुद्दे पर आते हैं । जो काम इन्फिनिटी फाउंडेशन कर रही है, उसके दो पहलू हैं – विध्वंस और निर्माण (विनाशकारी और रचनात्मक) । दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । आप एक के बिना दूसरा नहीं कर सकते । अगर आप एक बगीचे को बनाना चाहते हैं, और वहां पर बहुत सारे कीड़े मकोड़े हैं, जंगली घास है तो आपको पहले इन सबको हटाना पड़ेगा ।

अगर वहां की मिटटी में काफी समय से कोई विषाक्त तत्व डाले जा रहे हैं, तो आपको वह मिटटी भी हटानी होगी । अगर उस मिटटी ने इतना दुष्प्रयोग झेला है तो आप केवल थोड़ी सी अच्छी मिटटी डालकर बढ़िया नयी पौध नहीं पा सकते – क्योंकि वह पौध बचेगी ही नहीं ।

हमारे मूल संभाषण (discourse) के साथ भी बहुत दुष्प्रयोग हुआ है और हमें नया संभाषण बनाना है – इसलिए पुराने को हटाना और नए का सृजन बहुत आवश्यक है ।

सृजन का एक उदाहरण है कि हमने भारतीय विज्ञान और प्रोद्योगिकी पर १४ पुस्तकें प्रकाशित करी हैं – यह अपने में सबसे बड़ा संग्रह है – इसमें पुरातत्व विज्ञान, गणित, औषधि शास्त्र, धातु विज्ञान आदि शामिल हैं – और भी पुस्तकें निकलनी बाकी हैं ।

आज की गोष्ठी का मूल उद्देश्य है कि जो हमारे प्राचीन ग्रंथों की गलत व्याख्या हुई है उसे ठीक करना । ऐसा इसलिए है कि भाषाशास्त्र, ओरिएण्टलिस्म (Orientalism – पूरब का अध्ययन), नव-ओरिएण्टलिस्म, आदि सभी में यह लोग मूलतः हमारे ग्रन्थ (इतिहास, वेद, या अन्य प्राचीन ग्रंथ ) लेकर उन पर अपने ही हिसाब से व्याख्या करते रहते हैं । हम अब मांग कर रहे हैं कि हम स्वयं अपने ग्रंथों की व्याख्या अपने हिसाब से करेंगे । दूसरा स्तर है कि हम पुस्तक और जमीनी सच्चाई को आपस में जोड़ना चाहते हैं ।

आप देखिये अभी हाल ही में कम्बोडिया में महेंद्र पर्वत की खोज हुई है – जो कुछ ऑस्ट्रेलियाई और यूरोपियन पुरातत्ववेत्ताओं ने की है और उनका यह निष्कर्ष है कि 12 वीं शताब्दी तक यह विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था – वह स्थल इतना विशाल है । इतनी बड़ी खबर यहाँ सुर्ख़ियों में होनी चाहिए थी; हमारे पुरातत्ववेत्ता इस बारे में कुछ कर नहीं रहे है – इसलिए बाहर के पुरातत्ववेत्ता अगुवाई कर रहे हैं ।

इन्डोलोजी अध्ययन में वामपंथी प्रभाव बहुत बड़े रूप में बाद में आया । नेहरु के समाजवाद का भी इस पर प्रभाव पड़ा । फिर पोस्ट मॉडर्निज़्म आया । जब भी पश्चिम में कोई क्रांति हुई, कोई बड़ी घटना हुई और इस पर उन्होंने कोई व्याख्या कोई थ्योरी निकाली – हमारे लोगों ने उस थ्योरी को यहाँ आयात कर लिया और उसे यहाँ इस्तेमाल करने लगे ।

जब पश्चिम में मार्क्सवाद प्रचलित हुआ, तो यहाँ भी लोग उसे पढने लगे; जब पोस्ट मॉडर्निज़्म का प्रचलन हुआ तो हमारे लोगों ने कहा कि हाँ यह नया तरीका है शोध के लिए पैसा लेने का और बाहर घूम के आने का । यही काम पोस्ट कोलोनिअल थ्योरी के साथ हुआ । एक भी सामाजिक विज्ञान की थ्योरी का जन्म भारत में नहीं हुआ है । भारत का उदारवादी वामपंथी वर्ग सिर्फ पश्चिम की थ्योरी को यहाँ लाने का काम करता रहता है – बजाय इसके कि कोई भारतीय व्याख्या की जाये, भारतीय थ्योरी बनाई जाये । मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हम पुरानी व्याख्या में फंसे रहे; हमारे पास भी रचनात्मक और बड़े समझदार लोग मौजूद हैं – लेकिन यह बात सच है कि एक भी आधुनिक सामाजिक थ्योरी नहीं है जो भारत से निकली हो। भारत का इतना विस्तृत और विभिन्नता भरा समाज है – आप सोचते होंगे कि यहाँ से सामाजिक विज्ञान के कई नामी गिरामी नाम निकलेंगे – विश्व के सबसे जाने माने सामाजिक वैज्ञानिक भारत से होंगे – मगर ऐसा नहीं है । हम कुछ भी नया पैदा नहीं कर रहे हैं – हम बस आयात कर रहे हैं ।

इस पृष्ठभूमि में हम बात करते हैं इन्डोलोजी के एक नए क्षेत्र की जिसके मुख्य करता धर्ता हैं – शेल्डन पोलाक ।

अपने से पहले वाले विभिन्न इन्डोलोजी के विद्वानों की तरह शेल्डन पोलाक बहुत सी नयी बातें लेकर आये हैं । खाली पोस्ट कोलोनियल थ्योरी की ऊपर ऊपर से आलोचना करके आप शेल्डन पोलाक को ढंग से समझ नहीं पाएंगे । मैंने अपनी किताब “बैटल फॉर संस्कृत” में यह बार बार बताया है कि क्यों पोलाक नए हैं, काफी विद्वान हैं, नयी सोच लाते हैं, बहुत मेहनती हैं । मूलतः उन्होंने यूरोप की कुछ पुरानी व्याख्याओं को थोड़ा बदल कर भारत पर  आज़माया है – इसके साथ ही उन्हें संस्कृत की व्यापक समझ है ।

अब उनका एजेंडा यह है कि बहुत बड़ी संख्या में संस्कृत विद्वानों को ट्रेनिंग दी जाये – कितने ही संस्कृत के छात्र कोलंबिया और शिकागो यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं  – भारतीय छात्र भी पढ़ रहे है – वहां इन छात्रों को मार्क्सवादी, वामपंथी, पोस्ट मॉडर्न थ्योरी, जिसमे पोलाक की नयी थ्योरी भी है, पढाई जाती है – फिर उन्हें वापस भारत भेज दिया जाता है – आपको भारत में अमेरिका से वापस लौटे संस्कृत विद्वानों की बाढ़ मिलेगी ।

मेरे घर के पास एक ईसाई धार्मिक विद्यालय है – प्रिन्सटन theological सेमिनरी – यह एक बहुत बड़ा विद्यालय है – उनका पुस्तकालय भी बहुत बड़ा है ।

क्या आपको पता है कि उस धार्मिक विद्यालय में इन्डोलोजी का एक बहुत बड़ा विभाग है – कहने को वह एक ईसाई विद्यालय है – उनके शिष्य मंत्र पढ़ सकते हैं – वे भजन गा सकते हैं – वे आपको भरतनाट्यम कर के दिखा सकते हैं – लेकिन उनका ध्यय क्या है – हमें समझना, हमारे बारे में पढना ।

मज़े की बात यह है कि यह सब देख कर हमारे हिन्दू लोग बड़े प्रभावित हो जाते हैं । वे कहने लगते हैं – वाह, साड़ी कितनी अच्छी पहनी है – अरे भाइयों!! यही सब उनको सिखाया जाता है!!

जहाँ एक तरफ हमें दूसरों द्वारा पैदा की गयी समस्याओं की आलोचना करनी है, हमें अपनी खुद की समस्याओं पर भी निगाहें डालनी हैं । मैं हमारी मीडिया की समस्या की बात नहीं कर रहा बल्कि हमारे प्रबुद्ध विद्वानों की बात कर रहा हूँ ।

इस कांफ्रेंस में प्रो. कन्नन ने जो पेपर मंगवाए हैं उनका स्तर बहुत ऊंचा रखा है – उन्होंने व्यर्थ के वादविवाद के बजाय असल विद्वत्ता पर जोर दिया है – उन्होंने ऊपर ऊपर की आलोचना से हटकर बड़ी विशिष्ट आलोचना करने पर बल दिया (encouraged authors to do specific criticism and not generic criticism of west) । इन्होने लेखकों को पढ़ने की सामग्री भी दी थी।

बड़े आश्चर्य की बात है कि भारत में किसी भी संस्कृत विश्वविद्यालय में शेल्डन पोलाक द्वारा लिखित पूरी सामग्री नहीं है – चाहे वे तमिलनाडु के हों, कर्णाटक के हों, या उत्तर भारत के हों । यही नहीं उनके पास और भी किसी पश्चिमी इंडोलोजिस्ट् (indologist) के द्वारा लिखित पूरे ग्रन्थ नहीं हैं ।

एक और चीज़ है – ऐसे कई लोग हैं जो इधर उधर से पढ़ कर, कुछ भी जोड़जाड़ कर के एक लेख बना लेते हैं – इनमे आवश्यकता से अधिक उत्साह तो है मगर ऐसे लोगों में कोई मौलिक कार्य करने के लिए जो तपस्या चाहिए, उसका अभाव है ।

अंत में मैं यह कहूं कि ऐसे भी लोग हैं जो बहुत बढ़िया हैं – मगर उनमे साहस का अभाव है – वे आगे बढ़कर विरोध नहीं करना चाहते । हमारी आपस की बातचीत में तो वे खूब बोलेंगे मगर बाद में कहेंगे – राजीव, ऐसा नहीं कहना कि मैंने यह सब कहा था!!

मैं कहना चाहता हूँ कि मैं अमेरिका में १९७० से रह रहा हूँ । मुझे ४६ वर्ष हो गए हैं । मेरे विचार से अमेरिकन लोग बड़े स्वाभिमानी लोग हैं और बड़े खुले दिल वाले भी हैं, बड़े निष्पक्ष भी हैं; मगर एक भारतीय के रूप में आपको अपनी बात स्वयं रखनी है । मैंने कभी नहीं देखा है कि अमेरिका में किसी को अपनी बात रखने से रोका जाये । आप किसी भी विषय पर बात कर सकते हैं – व्यक्ति की पहचान, उसकी जातीयता, उसके प्रजाति  – सब पर बात हो सकती है । लोग अपनी बात, अपना दृष्टिकोण खुल कर रख सकते हैं । हम अपनी बात रखना ही नहीं चाहते हैं । ऐसा करना पूरी तरह हम पर निर्भर है । अपनी बात रखने से कोई बुरा नहीं मानता है; कोई हमे नहीं रोक रहा है; यह तो एक तरह की सेल्फ सेंसरशिप (self-censorship) है; हमने खुद ही बेड़ियाँ डाली हुई हैं । शायद पुरानी दासता की आदत से हम उबरे नहीं हैं । मेरी बात मानिये अमेरिकियों को इस बात से बुरा नहीं लगता कि कोई अपनी बात खुलकर कहे ।

मैं तो देखता हूँ कि दूसरी सभ्यताएं बड़ी साहसी (अक्खड़) हैं, अपनी बात जोर देकर रखती हैं – और इस रवैये को अमेरिका में सही समझा जाता है । हम किस तरह से भिन्न हैं – या योग पर दोबारा से अपना स्वामित्व स्थापित करना – योग को “हिन्दू” साबित करना – अपने कई ध्यान पद्दतियों पर दोबारा से अपना स्वामित्व जताना – इसमें आप अमेरिकियों का कुछ भी अपमान नहीं कर रहे हैं ।

यह कहना कि इतिहास के बारे में हमारी अपनी विचार पद्दति है – परमेश्वर के बारे में हमारी अपनी विचार पद्दति है – हमारी दृष्टि अलग है – इस बात को कहने में कोई भी समस्या नहीं है । यह हमारे ही लोगों को कुछ डर लगा रहता है कि अपनी बात उठा कर शायद हम कुछ गलत कर रहे हैं ।

जब मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था तो मैंने जापानी और चीनियों को देखा था। जापानी अपने स्वाभिमान के बारे में बड़े स्पष्ट थे और आप उनकी कुछ प्रथाओं को हल्के में नहीं ले सकते थे । हमारी अमेरिकी कंपनी हमें ट्रेनिंग देती थी कुछ जापानी प्रतीक हैं, कुछ प्रथाएं हैं, जिनका हमें बराबर सम्मान करना था । जापानियों ने अपनी सभ्यता को बहुत ऊंचा करके दिखाया हुआ है और अब ऐसा चीन कर रहा है, क्योंकि चीन अब बहुत ताकतवर है ।

इसलिए अगर आप शक्तिशाली हैं तो अमेरिकी आपसे नाराज़ नहीं होंगे बल्कि वे आपकी सम्मान ही करेंगे । यह समझना बहुत आवश्यक है ।

मैं कुछ सुझावों के साथ अपनी बात को विराम दूंगा कि हमें इस कांफ्रेंस श्रृंखला में कहाँ जाना चाहिए और किन विषयों पर शोध करना चाहिये । यह सुझाव किसी विशेष क्रम में नहीं हैं और मैं चाहूँगा कि कोई संचालक समिति इन सुझावों का निरीक्षण करे और फिर उन्हें अपनाये ।

पहला सुझाव है कि हिन्दू-बौद्ध सम्बन्धों पर चर्चा होनी चाहिए – इसमें लडाई और तनाव आदि पर बहुत कुछ लिखा गया है जो कि सच नहीं है । हमें बौद्धों को साथ लाकर एक कांफ्रेंस करनी चाहिए ।

यह पूरा caste, जाति, वर्ण – इन शब्दों का अलग अलग समय पर क्या अर्थ रहा, अभी इनका क्या अर्थ है, कौन से अर्थ हैं जो दूषित कर दिए गए, कौन से अर्थ हैं जो दूषित नहीं हुए – इस पर चर्चा होनी चाहिए । हम वास्तविक सामाजिक समस्याओं को छुपाना नहीं चाहते, न ही अनदेखा करना चाहते हैं, मगर हम उन समस्याओं को बढ़ा चढ़ा कर भी नहीं बताना चाहते और इसके लिए पूरी हिन्दू परम्परा को कटघरे में नहीं खड़ा करना चाहते । हम इस विषय पर एक ज़िम्मेदार, खुले मन से एक चर्चा चाहते हैं जिसमे हमारे विरोधी भी शामिल हों ।

एक विचार यह है कि पवित्र तत्वों को हटाकर पंथनिरपेक्ष तत्व लाये जायें, जैसे भरतनाट्यम नृत्य को पंथनिरपेक्ष बनाना । यही पवित्रता के तत्व को हटाने की बात कुम्भ मेले में भी हो रही है । इसलिए यह तो एक मेला है इसलिए वहां पेप्सी का टेंट लगाओ और एयरटेल का टेंट लगाओ, जो चाहे बेचो ।

यह पंथनिरपेक्षता लाने का तत्व बहुत बड़ी समस्या है और यह बात शेल्डन पोलाक के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है क्योंकि पोलाक बार बार पवित्रता को हटाने की बात करते हैं और इसे वे “मुक्ति भाषाशास्त्र” (Liberation Philology) का नाम देते हैं । पोलाक के अनुसार यह “मुक्ति भाषाशास्त्र” पवित्रता को हटाने में मदद करेगा क्योंकि पवित्रता का ही दुरूपयोग किया जाता है – उसके द्वारा ही शोषण होता है ।

फिर यह विचार है – संस्कृत के इतिहास का, इसके प्रसार का । आखिर संस्कृत का प्रचार प्रसार क्यों हुआ? हमारा विरोधी पक्ष भी स्वीकार करता है कि संस्कृत के प्रसार में कोई हिंसा नहीं थी । मगर आखिर वे साधन क्या थे जिनसे संस्कृत का प्रचार हुआ? इस पर हमारे विरोधियों की दलील है – “Aestheticization of Power” के द्वारा यह प्रचार प्रसार हुआ – जिसका मैं पुरजोर विरोध करता हूँ । अब हमें उन साधनों पर शोध कर एक वैकल्पिक थ्योरी निकालनी होगी जो संस्कृत के प्रचार प्रसार के कारणों को समझा पाए । संस्कृत को अलग अलग जगह कौन ले गया –  किन कारणों से लेकर गया – मैं तो नहीं मानता कि इसमें शासकों की कोई साजिश थी कि लोगों के विचारों पर नियंत्रण किया जाये या ऐसा कुछ ।

फिर हमें अपने धर्मशास्त्रों को, अर्थशास्त्र को आधुनिक काल के सन्दर्भ में रखकर व्याख्या करनी चाहिए । हमें देखना चाहिए कि क्या उनमे कोई बदलाव की आवश्यकता है?

“राष्ट्र क्या है?” इस विचार पर भी एक कांफ्रेंस हो सकती है । पश्चिम के सिद्धांत “नेशन स्टेट” से राष्ट्र की कैसे तुलना की जाये । कहीं ऐसा तो नहीं हम पश्चिम की नक़ल कर के अपने राष्ट्र को उनके परिभाषा के अनुरूप ढालना चाह रहे हों? ऐसा करने में हमें किन तत्वों का त्याग करना होगा । और अगर हम राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं तो यह “नेशन स्टेट” से कैसे भिन्न होगा? इसलिए अगर आप लम्बे समय तक भारत की अखंडता चाहते हैं तो हमें इस सभ्यता के अध्ययन को प्रधानता देनी होगी, हमे यह अध्ययन गंभीरता से करना होगा, हमें इसे बाहर आउटसोर्स करना बंद कराना होगा, जिम्मेदारियों का परित्याग करना बंद करना होगा, बाहर पैसा देना बंद करना होगा, हममें से हर एक को इसे अपना स्वधर्म समझना होगा।

हमें यह भी देखना होगा कि इस तरह के अध्ययन के बाद लोगों की अच्छी नौकरी लगे – तभी आप अच्छे लोगों को आकर्षित कर पाएंगे – आपको न सिर्फ पढाई के क्षेत्र में बल्कि मीडिया के क्षेत्र में भी ऐसे लोग चाहिए – बड़े कंपनियों को भी ऐसे लोग रखने चाहिए जो हमारी सभ्यता, संस्कार, मूल्य आदि के बारे में लोगों को जागृत कर सके और इन विचारों को एक कंपनी की विचारधारा का भाग बना सके ।

इसी के साथ मैं आप सब का धन्यवाद करता हूँ ।

(इस भाषण का वीडियो यहा पर उपलब्ध है – https://www.youtube.com/watch?v=lJLoAHZxMWE

स्वदेशी इंडोलोजी कांफ्रेंस की साइट है : http://swadeshiindology.com/)



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