भारत के प्राचीन पुरातात्विक स्थान

14 जून २०१६ – राजीव मल्होत्रा जी का फेसबुक लाइव इवेंट

नमस्ते भारतवासियों,

मुझे वापस आकर बड़ी ख़ुशी हो रही है, और आज का विषय भी बड़ा रोचक है।

इसका सम्बन्ध भारत की विरासत से जुड़ा हुआ है। आज हम चर्चा करेंगे भारत के उन प्राचीन शहरों, मंदिरों व अन्य मुख्य पुरातात्विक (archaeological) स्थानों की, जिन्हें हाल के वर्षों में खोजा गया है। इन स्थानों के बारे में बहुत ज्यादा जागरूकता नहीं है और न इनका उपयुक्त प्रचार हुआ है। सरकार ने भी इस तरह के प्रचार में कोई खर्चा नहीं किया है; सिर्फ कुछ बुद्धिजीवी ही इन स्थानों के बारे में जानते हैं। आम जनता को इन स्थानों के बारे में ज्यादा पता नहीं है। अभी तक ये नई खोजें स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनी हैं। मीडिया को भी इस बारे में कुछ नहीं पता है। भारत के साहित्यिक उत्सव (Literary Festivals) इन खोजों पर कोई अलग समारोह नहीं करते और न उन्हें खोजने वाले बुद्धिजीवियों का कोई सम्मान करते हैं। केवल कुछ ही वैज्ञानिकों को इस बारे में पता है।

इसलिए मेरा यह ध्यय है कि मैं आप सभी को इस प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक विरासत, वैदिक संस्कृति का प्रवक्ता बनाऊं; जिससे आप सभी इस अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण जानकारी को और लोगों तक पहुँचा सकें। मेरा यह निवेदन है कि आप सभी इस कार्य को अपना स्वधर्म समझकर, अपनी सेवा समझकर करें।

आज जिन स्थानों की में चर्चा करूंगा, उनमे से कुछ के बारें में आपने सुना होगा, और कुछ आपके लिए नए होंगे।

पहला ऐसा स्थान है – महेंद्र पर्वत। मैं शर्त लगाने को तैयार हूँ कि आज के श्रोताओं में से १ प्रतिशत से भी कम लोगों ने इस स्थान के बारे में सुना होगा। यह स्थान कम्बोडिया में हैं। इस स्थान को वहां की स्थानीय भाषा में “इंद्र का पर्वत” भी कहते हैं। इस स्थान के बारे में जिन अनुसन्धान पत्रों को मैं पढ़ रहा हूँ, वे बड़े रोचक हैं। यहाँ एक पर्वत के नीचे एक तालाब है जहाँ १००८ शिवलिंग हैं। मैं इस स्थान पर गया हुआ हूँ। कुछ वर्षों पूर्व हिन्दू बौद्ध शिखर सम्मलेन में, (स्वामी परमात्मानंद जी के साथ, जो हिन्दू धर्माचार्य सभा से जुड़े थे) मैं कम्बोडिया गया था, तब इस स्थान का दौरा किया था और उस तालाब के भीतर मैं चला भी था। इस शिखर सम्मलेन का आयोजन स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने किया था।

उस समय किसी को यह नहीं पता था कि इसी स्थान पर जो बड़ा जंगल है उसमे एक बहुत बड़ा शहर छुपा हुआ है। उस शहर में बाद में मंदिरों का एक बहुत बड़ा समूह पाया गया।

अब इस जगह को एक हज़ार साल पहले के सबसे बड़े साम्राज्य का केंद्र माना जा रहा है। यह तथ्य कोई लोक भाषा (folk lore) या गैर सत्यापित बात नहीं है वरन यह विश्व के विभिन्न प्रामाणिक पुरातत्वविदों (ऑस्ट्रेलिया, भारत, यूरोप के अलग अलग पुरातत्वविद) का मत है। इन पुरातत्वविदों का कहना है कि एक हज़ार साल पहले पूरे विश्व में इतना बड़ा और इतना परिष्कृत (sophisticated), समकालीन भवन समूह कहीं भी नहीं था।

कहने का अर्थ है कि महेंद्र पर्वत कोई छोटा मोटा स्थान नहीं हैं, यह कोई ऐसी जगह नहीं है जिसे आप नकार दें। इस भवन समूह में उच्च कोटि की निर्माण प्रोद्योगिकी (technology) का उपयोग हुआ है। वहां खेतीबाड़ी के लिए अत्यंत उच्च कोटि का जल संसाधन प्रबंधन था। एक महामार्ग (Highway) भी मिला है, जो महेंद्र पर्वत स्थल को अंकोर वाट मंदिर (जो कई किलोमीटर दूर है) से जोड़ता है। यह पूरा भवन समूह करीब १० वर्गमील (२५०० एकड़) स्थान में फैला हुआ है।

इस स्थल के बारे में और भी नवीन खोजें सामने आ रही हैं, और मैं तो इन खोजों के बारे में पढ़ कर आश्चर्यचकित हो जाता हूँ। आश्चर्य और दुःख कि बात यह है कि हमारे कई लोग जो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं और जिनको इस स्थल के बारे में पता होना चाहिए, उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं है या उनकी इन विषयों में कोई रूचि ही नहीं है।

तो महेंद्र पर्वत पहला ऐसा विषय था जिस पर मैं आज आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता था।

अब ज़रा वापस स्वदेश आते हैं, कम्बोडिया से हजारों मील दूर, हरियाणा में। हरियाणा में दो सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल हैं। और मैं अभी तक जितने भी हरियाणा वासियों से मिला हूँ उनमे से कई लोगों को इन स्थलों के बारे में पता नहीं है।

इन स्थलों में एक है – राखीघड़ी; राखीघड़ी हड़प्पा काल का अभी तक खोजे गए शहरों में सबसे बड़ा है।राखीघड़ी सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का बड़ा शहर था और एक प्रमुख केंद्र था। लोगों को यह बहुत बड़ी गलतफहमी है कि हड़प्पा और मोहनजोदारो सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के सबसे प्राचीन और बड़े शहर हैं। एक समय शायद यह बात सही थी, पर जैसे जैसे नए स्थल खोजे जा रहे हैं, हमारे सामने नए तथ्य आ रहे हैं। राखीघड़ी में वे सारी विशेषताएं हैं जो सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के अन्य शहरों में पाई जाती हैं। उसी प्रकार की उच्च कोटि की निर्माण प्रोद्योगिकी, वास्तुकला, जीवन शैली, प्रतीक चिह्न, खपरैल (टाइल्स,tiles), भाषा विज्ञान सबंधी चिह्न (उनमे से कुछ अभी डीकोड (decode) नहीं हो पाए हैं) राखीघड़ी में भी पाए जाते हैं, जो अन्य सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के स्थलों पर मिले हैं।

राखीघड़ी के इतिहास को देखते हुए इस स्थल को बहुत महत्व मिलना चाहिए। हरियाणा सरकार खाली कहने भर को सहयोग दे रही है मगर मुझे नहीं लगता कि उतना पर्याप्त है।

मैं ऐसे ही एक दो स्थल और बताकर अपना मूल बिंदु कहना चाहूँगा।

राखीघड़ी का तो फिर भी नाम है और कई बुद्धिजीविओं ने इसके बारे में सुना हुआ है।

अब मैं आपको बताता हूँ एक ऐसे स्थल के बारे में जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है और – इसका नाम है भिरराणा (भिर-राणा)।

यह स्थल भी हरियाणा में है और राखीघड़ी से कई किलोमीटर दूर है। इस स्थान का महत्व यह है कि यह सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का सबसे प्राचीन शहर है।

यह शहर ७५०० ईसा पूर्व का है अर्थात आज से १०००० साल पुराना। यह विश्व का सबसे प्राचीन शहर है – इससे पूर्व पाकिस्तान का मेहरगढ़ विश्व का सबसे प्राचीन शहर माना जाता था।

भिर-राणा के बारे में एक और मुख्य बात यह है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का यह ऐसा शहर है जो इस सभ्यता के अंत तक विद्यमान था। इसका अर्थ यह है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के पूरे ५ हज़ार साल का इतिहास इसी एक स्थल पर मिल जाता है।

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है क्योंकि यह स्थापित करता है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता में एक निरंतरता थी। कई लोगों ने ऐसा लिखा है कि शायद सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के अलग अलग शहर अलग कालों में बने थे, शायद इन अलग अलग शहरों में रहने वाले लोग अलग सभ्यताओं से थे और विभिन्न जगहों से आए थे। मगर भिर-राणा से निकले प्रमाण (जो ५ हज़ार साल के अंतराल में मिले हैं) यह स्थापित करते हैं कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के सभी शहर आपस में जुड़े हुए थे और एक ही सभ्यता के हिस्से थे।

अब आते हैं एक और स्थान जिसके बारे में ठीक से अध्ययन नहीं किया गया, जिसे ठीक से समझा नहीं गया है – द्वारिका, जो कि गुजरात तट के पास है। हमारी परंपरा कहती है कि यह भगवान् कृष्ण की राजधानी थी। हमारे ग्रंथों में लिखा हुआ है कि यह स्थल समुद्र में समा गया था।

अब पुरातत्वविद भी कह रहे हैं कि लगभग 1700 ईसा पूर्व उस स्थान पर भूमि समुद्र के भीतर धंस गयी थी। इसका मतलब है कि आज से करीब ४ हज़ार साल पहले यह शहर समुद्र के नीचे चला गया होगा और इस प्रकार इस शहर का अंत हो गया होगा। यह शहर बहुत वृहद था और अगर हमें इसके बारे में पूरी जानकारी लेनी है तो पनडुब्बियों के द्वारा पानी के नीचे जाकर पता लगाना पड़ेगा।

इस स्थान पर भी अनेक प्रतीक हैं एवं वास्तुशिल्प के बेहतरीन डिजाइन मिले हैं – ऐसी शिल्पकला मिली है जिसका विवरण महाभारत में लिखा है। इस प्रकार यह खोज हमारे इतिहास को भी प्रामाणिकता देती है क्योंकि यह खोज बड़े वैज्ञानिक तरीके से हुई है।

एक और बड़ी रोचक खोज तमिलनाडु में हुई है। कई लोग कहते हैं कि यह सारी संस्कृति उत्तर भारत की है और वहीँ से यह संस्कृति कम्बोडिया गयी। वास्तविकता यह है कि कम्बोडिया में भारतीय संस्कृति और सभ्यता ले जाने वाले लोग तमिलनाडु से ही गए थे।

लोग यह भी कहते हैं कि उत्तर में सभ्यता के अवशेष मिले और सुदूर दक्षिण में राम सेतु है मगर दोनों के बीच में क्या है? सभ्यता का कोई अवशेष क्यों नहीं है? इस बात का सहारा लेकर कुछ लोगों ने यह दिखाने कि कोशिश की है कि उत्तर और दक्षिण में भिन्न सभ्यताएं थी।

लेकिन यह सच नहीं है क्योंकि हाल ही में तमिलनाडु में कुछ प्रमुख स्थल खोजे गए हैं जो सिन्धु-सरस्वती सभ्यता से जुड़े हुए हैं। दोनों स्थलों पर वास्तु कला की तकनीक, डिजाइन, प्रतीक चिह्नों  का इस्तेमाल एक ही जैसा है। इसका अलावा तमिलनाडु में 3000 से अधिक कलाकृतियों की खोज हुई है।

मैं आज के वक्तव्य को किसी पुरातत्व शास्त्र के लेक्चर का रूप नहीं देना चाहता। मैं तो मोटे तौर पर निम्नलिखित बिंदु पर जोर देना चाहूँगा:

1.हमारे अतीत के बारे में जो भी अध्ययन किया जा रहा है, वो बिखरा हुआ है, अलग अलग जगह यह अध्ययन किया जा रहा है। यह सारा अध्ययन हमें एक जगह लाना है और भारत के इतिहास का सही चित्रण करते हुए समग्र भारत के ग्रैंड नैरेटिव (Grand Narrative) को पुनर्स्थापित करना है।

2. एक और बात। अपने ही इतिहास के सही चित्रण के लिए आज भी हम काफी हद तक पश्चिम पर निर्भर हैं। पश्चिमी विद्वान इन खोजों से कोई एक बात लेकर प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित कराते हैं। वे इन खोजों को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं, (न कि हमारी वैदिक दृष्टि से)। इन पश्चिमी विद्वानों की प्रवृत्ति है कि किसी भी वैदिक या हिन्दू कड़ी (संपर्क, लिंक) को ज्यादा बताया न जाये (downplay किया जाये)।

वे कभी कंही गलती से कह सकते हैं कि यह कलाकृति इंद्र की है, मगर वे कभी यह नहीं कहेंगे कि यह संस्कृति वैदिक या हिन्दू संस्कृति थी। किसी और जगह में वे किसी मूर्ति / कलाकृति को कहेंगे कि यह शिव की कलाकृति है, मगर वे इन दोनों तथ्यों को (इंद्र और शिव की कलाकृति को) आपस में नहीं जोड़ेंगे।

यह “विद्वान” कहेंगे कि यह लोग विभिन्न देवताओं की पूजा करते थे (polytheistic), वे बड़े chaotic थे, उनके कई देवता थे, यह लोग बड़े आदिम (primitive) थे, इनके रीति रिवाज़ बड़े भिन्न थे, इस तरह यह दिखाया जायेगा कि सब बड़े अलग थे। इस तरह का भाव केवल जर्नल या पुस्तकों में ही नहीं मिलता बल्कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के उन स्थलों की जो गाइड बुक्स (यूनेस्को द्वारा प्रकाशित) हैं, वहां भी इसी तरह का भाव व्यक्त होता है। इसी तरह का भाव यूनेस्को की वेब साईट पर मिलता है। इन सभी जगह इन स्थलों को हिन्दू संस्कृति के साथ नहीं जोड़ा जाता ।

आप लोगों का एक कार्य है कि आप भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि के तौर पर कार्य करें ।  अलग अलग लोगों से, चाहे वो बीबीसी रिपोर्टर हो या भारतीय प्रेस का कोई रिपोर्टर हो या यूनेस्को का कोई अधिकारी हो या कोई टूर गाइड हो। आप जाकर इन लोगों को समझाएं और उन्हें इस बात का यकीन दिलाएं (और उनका साथ भी लें) कि यह सभी एक वृहद हिन्दू सभ्यता का हिस्सा था। उन्हें यह भी कहे कि इस हिन्दू संस्कृतिक विरासत को स्वीकार करने की आवश्यकता है।

3. एक और बात। हमें एक अंतःविषय दृष्टिकोण (inter disciplinary approach) की जरूरत है। हमें कला इतिहासकारों, शास्त्र ज्ञाताओं, पुरातत्वविदों की आवश्यकता है। हमें प्रौद्योगिकीविद् (technologists), धातु शास्त्र विशेषज्ञ, भाषाविद चाहिए, हमें ऐसे विशेषज्ञ चाहिए जो आनुवंशिक अनुसंधान (genetic रिसर्च) कर सकें।

इन सब लोगों को हमें साथ में लाना है और हमें खुद यह कार्य करना है बजाय इसके कि हम दूसरों से (पश्चिमी विद्वानों से ) यह अपेक्षा रखें कि वे हमारे लिए इस तरह की पूरी संरचना बनाये (वे अगर बनायेंगे भी तो अपनी विचारधारा के हिसाब से ऐसा तंत्र बनायेंगे)।

हमें इसके लिए बड़े अनुदान की भी आवश्यकता होगी। साथ ही साथ हमें प्रतिष्ठित व् विश्वस्तरीय जर्नल निकालने होंगे। इस तरह की महत्वपूर्ण खोजें साहित्यिक समारोहों में कोई स्थान नहीं पाती। इन खोजों या लेखों के लिए कोई पुस्तकीय पुरस्कार भी नहीं है, और न ही इन तथ्यों का समावेश हमारी पाठ्यपुस्तकों में है।

4. आपको एक क्षेत्र के बारे में बताता हूँ – बाइबिल सम्बन्धी पुरातत्व विज्ञान। यह अमेरिकन अकादमी और यूरोपीय अकादमी में अध्ययन और शोध का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। इस क्षेत्र के विद्वान विभिन्न पुराने बाइबिल के स्थलों पर जाते हैं और वहां नई खोजों पर अध्ययन करते रहते हैं। इस प्रकार वे बाइबिल में वर्णित लेख और वास्तविक खोजों का आपस का संबंध स्थापित करते रहते हैं।

मगर अगर आप कहे कि वैदिक पुरातत्व विज्ञान कि बात करो तो आप पर कई तरह के आरोप लगाये जायेंगे !!

लेकिन हमें बड़ा स्पष्ट रहना है कि हम एक वैदिक पुरातत्व विज्ञान स्थापित करेंगे। इन सभी प्राचीन पुरातत्व खोजों को हमें इसी वैदिक पुरातत्व विज्ञान के अंतर्गत लाना है – यही हमारा स्पष्ट मार्ग होना चाहिए

एक बात समझ लीजिये कि जिस तरह कि तथ्य आज मैंने आपको बताये (चार स्थल), अगर इसी तरह की खोज बाइबिल पुरातत्व या प्राचीन पश्चिमी सभ्यता के क्षेत्र में होती तो अभी तक सब जगह उसका हल्ला मच जाता। यह विषय सीएनएन चैनल का मुख्य विषय होता, कई सम्मान दिए जाते, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होते।

यह सब हम नहीं कर रहे , यह हमारी कमी है। हमारी सरकार को यह सब करना चाहिए।

5. हमें विद्वानों के लिए नियमित सम्मेलन व् कांफ्रेंस आयोजित करने चाहिए, विविध विषयों के विशेषज्ञों को साथ लाना चाहिए। मीडिया व बॉलीवुड के प्रतिनिधि और वृत्तचित्र निर्माताओं (डाक्यूमेंट्री बनाने वाले) को इन विषयों पर चर्चा करने चाहिए। डिस्कवरी चैनल के समकक्ष हमें अपना एक चैनल बनाना चाहिए, जहाँ इन विषयों पर चर्चा हो, छोटी फिल्में दिखाई जायें। हमें इन प्राचीन स्थलों पर पर्यटन बढ़ाना चाहिए – हेरिटेज टूरिज्म के तौर पर इस श्रेणी को विकसित किया जाना चाहिए।

इन स्थलों से सम्बंधित तीन आयामी (3 D) फिल्म बनायीं जायें – उदहारण के तौर पर कृष्ण की  द्वारका पर आइमैक्स की (3 D) फिल्म बन सकती है।

आजकल हैरी पॉटर और “लार्ड ऑफ़ दी रिंग्स” फिल्मों का बड़ा माहौल बना हुआ है। इनमे प्राचीन संस्कृति और परम्पराओं को दिखाया गया है – वे परम्पराएं जो काल्पनिक हैं। भारत वर्ष में तो इस प्रकार की अनेको गाथाएं उपलब्ध हैं – और यह गाथाएं काल्पनिक नहीं हैं बल्कि इतिहास और पुरातत्व के द्वारा समर्थित है। हमें भी इस प्रकार की फिल्में बनानी चाहिए – शायद हमें अपने फिल्म निर्माताओं की कल्पनाशक्ति को झकझोरना होगा कि वे भी ऐसी फिल्में बनाएं।

6. एक और बात – आप सबसे निवेदन है कि उन सब लोगों का पुरजोर विरोध करें जो हमारे इतिहास को कल्पित कथा (myth, मिथ) बताते हैं। ऐसा इसलिए क्योकि हमारे इतिहास के अब वैज्ञानिक सबूत मिलने लगे हैं – ये वास्तविक सबूत उन तथ्यों से मेल खाते हैं, जिनका हमारे ग्रंथों में उल्लेख किया गया है।

मगर ध्यान रहे, पहले आपको खुद इन तथ्यों की जानकारी लेनी होगी। अपने आप को तैयार करना होगा, अगर आप खुद अच्छी तरह से सूचित नहीं हैं तो आप बेहतर बहस नहीं कर पाएंगे और न अपने दृष्टिकोण का सही प्रतिनिधित्व कर पाएंगे। आप भावनात्मक और परेशान हो जायेंगे और यह सही बहस करने का तरीका नहीं है।

मैंने तो यहाँ तक देखा है कि हमारे आई.ए.एस और आई.एफ.एस अफसरों को भी पुनः शिक्षित करने की आवश्यकता है क्योंकि वे पुराने औपनिवेशिक व्यवस्था (old colonial system) में शिक्षित हुए हैं और उन्हें खुद ही हमारे अतीत के बारे में कुछ पता नहीं है।

7. हमारे उद्योगपतियों को इन सब कार्यों में सहयोग करना चाहिए और इन्हें प्रायोजित करना चाहिए। उन्हें इन चार स्थानों में से किसी एक पुनर्विकास प्रायोजित करना चाहिए और इस कार्य को बड़े गर्व के साथ करना चाहिए। किसी उद्योगपति को इस इस पनडुब्बी को खरीदना चाहिए, जो कि द्वारिका में जाकर इन्फ्रा-रेड कैमरे के साथ अलग अलग स्थल कि फोटोग्राफी करें और सटीक नक्शें बनाएं। इस प्रकार के अनुसंधान में धन की आवश्यकता होती है और यह सारा खर्च सिर्फ सरकार ही नहीं उठा सकती।

अब इस तरह के काम में संस्कृति मंत्रालय को भी आगे बढ़ कर काम करने कि आवश्यकता है। संस्कृति मंत्रालय का कार्य केवल भांगड़ा करवाना या बॉलीवुड के आयोजन करवाना नहीं है बल्कि असल में उन्हें इन मसलों के प्रचार प्रसार पर गहनता से ध्यान देना चाहिए। उन्हें इन खोजों को लॉबी करके दुनिया के नक्शे पर पहुँचाना है। बाकी मंत्रालयों को भी इसमें पूरा सहयोग देना होगा -सूचना एवं प्रसारण, पर्यटन, मानव संसाधन विकास, विदेश मंत्रालय, इन सभी को इस व्रहद यज्ञ में शामिल होना होगा।

आज की इस चर्चा में मैंने आपको एक सिंहावलोकन दे दिया है।

अब मैं कुछ सवालों के जवाब देता हूँ। यह सवाल लाइव आ रहे हैं।

वंदना का प्रश्न है – इस यज्ञ में हमारे मंदिर क्या भूमिका निभा सकते हैं?  

बहुत उत्कृष्ट सवाल है।

भारत का हर मंदिर इन सभी साइटों के लिए एक संग्रहालय के रूप में कार्य कर सकता है। वहां इस तरह की फिल्में व् वृत्तचित्र दिखाए जा सकते हैं। मंदिर, भ्रमण के कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं। आपको बताता हूँ, स्थानीय चर्च बाइबिल पुरातत्व के कई भ्रमण कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

रागिनी शर्मा पूछ रही हैं कि क्या भारत सरकार को वैदिक स्थल कि जगह हिन्दू स्थल प्रयोग करना चाहिए?

मेरे अनुसार हम वैदिक या हिन्दू कोई भी संबोधन प्रयोग कर सकते हैं, मगर हमें इस “सेक्युलर” बनाने की प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए।

प्रश्न – हम देवदत्त पट्टनायक का पर्त्युत्तर कैसे दें?

देवदत्त पट्टनायक केवल एक उदाहरण है ऐसे लोगों का जो वेंडी डोनिगर के बताये मार्ग पर चल रहे हैं और हमारे इतिहास को कपोल कल्पित myth बताते हैं। बजाय इन लोगों को नीचा दिखने के हमें बेहतर प्रयत्न करने होंगे – अपने इतिहास और वास्तविक खोजों के बारे सही से बताना होगा। हमें विज्ञान और पुरातत्व के बीच की जो कड़ियाँ खोजी जा रही हैं उन्हें सामने लाना होगा। हमें बताना होगा कि कैसे कुंभ मेला आठ से दस हजार साल पुराना एक उत्सव है। जैसे जैसे हम वास्तविक प्रमाणों को हमारे ग्रंथों में लिखित वर्णन के साथ जोड़ते जायेंगे – और साथ ही साथ अपने लोगों को शिक्षित करते जायेंगे – तो यह myth की आवाजें अपने आप दबती जाएँगी।

प्रश्न – क्या इन स्थलों पर भ्रमण के लिए जाया जा सकता है?

हाँ इन स्थानों की यात्रा संभव है। कई जगह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा नियंत्रित हैं और इन लोगों को हिन्दू शब्द से बड़ी एलर्जी है। वे धर्मनिरपेक्षता की बड़ी कोशिशें करते रहते हैं और हिन्दू इतिहास को downplay करते हैं।

आप उनकी अनुमति से इन जगहों की यात्रा कर सकते हैं। इनमे से कुछ स्थानों में बेरोकटोक आया जा सकता है, लेकिन स्वाभाविक रूप से वे स्थल जहाँ सक्रिय रूप से खोज अभी भी जारी है – वहां भ्रमण करना प्रतिबंधित है।

प्रश्न – क्या हाल की खोजों में भारत सरकार (या उसके प्रतिनिधि) शामिल है?

मुझे नहीं पता। मुझे यह पता है कि महेंद्र पर्वत स्थल पर ऑस्ट्रेलियाई, यूरोपीय और अमेरिकी पुरातत्वविदों का पूरा समूह हावी है और इस समूह ने कंबोडिया की सरकार से शायद कोई समझौता भी किया है। कंबोडिया की सरकार ने भारत सरकार को जानकारी दे है या नहीं दी है – मुझे इस बारे में नहीं पता। अब लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या आप इन विषयों पर किताब लिखेंगे? अब बात यह है कि मैं ही अकेला व्यक्ति नहीं हो सकता जो इस बारे में किताब लिखे। मेरी उम्र बढ़ रही है, कई ऐसी चीज़ें हैं जो मैं लिख नहीं पाऊँगा, और जिनका दायित्व दूसरों को लेना पड़ेगा।

प्रश्न – क्या भारत सरकार को मंदिरों पर से नियंत्रण हटाना चाहिए?

बिलकुल। जब कोई प्राचीन मंदिर खोजा जाये, जहाँ एक देवता स्थापित हो और जहाँ अग्नि जलने का प्रबंध हो, ऐसे स्थल को हिंदू संगठन को संचालित करने के लिए दे देना चाहिए। जब हम ऐसे स्थलों को धर्मनिरपेक्ष पुरातात्विक स्थल के रूप में रखते हैं तो इसका मतलब यह है कि हमने पवित्रता का आयाम हटा दिया।

प्रश्न – हम द्वारिका के बारे में जानते हैं। कृपया विस्तार से बताएं कि उस जगह के बारे और ज्यादा खोज कैसे की जाये?

तथ्य यह है कि समुद्र के अन्दर खोज करने के लिए पनडुब्बियां होती हैं जिनमे एक या दो पुरातत्वविद जा सकते हैं और खोज कर सकते हैं। यह लोग अंधेरे में भी वीडियो कैमरे से शूटिंग और मापन कर सकते हैं। किसी उद्योगपति को चाहिए कि ऐसी एक पनडुब्बी इस अच्छे कार्य के लिए भेंट करे।

एक और अनूठा क्षेत्र है – समुद्री पुरातत्व शास्त्र। इसमें समुद्र के नीचे पुरातत्व सम्बंधित खोजें की जाती हैं। भारत में भी यह तकनीक है और इसे एस.आर. राव जी ने शुरू किया था। एस. आर. राव एक महान पुरातत्त्ववेत्ता थे जिनका २०१३ में निधन हो गया था।

ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए, उन्हें पद्म पुरस्कार मिलने चाहिए, उन्हें साहित्यिक उत्सवों में बुलाना चाहिए और सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक का पुरस्कार मिलना चाहिए। उन्होने इन खोजों में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया है और ऐसे कई महानुभाव हैं। ऐसे लोगों को उनके सहयोगी सम्मान देते हैं मगर इससे ज्यादा हमने उन्हें कोई सम्मान  नहीं दिया है।



Categories: Hindi Articles

Tags:

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: