‘होली स्पिरिट’, ‘शक्ति’ अथवा ‘कुण्डलिनी’ के सामान नहीं है

सभी धर्मों में समानता की तलाश करने के दौरान, अक्सर ईसाई धर्म की ‘होली स्पिरिट’ की तुलना हिन्दू धर्म की शक्ति अथवा कुण्डलिनी के साथ की जाती है | यद्यपि, ये दोनों पद भिन्न भिन्न और प्रायः विसंगत तत्वमिमांसाओं का निरूपण करते है |

प्रारंभिक वैदिक साहित्य एक परमसत्ता (शक्ति) का वर्णन करता है, जिसकी सृजनात्मक उर्जा के माध्यम से विश्व का प्रकटीकरण हुआ है | शक्ति को बाद में परिष्कृत धर्मशास्त्र और पूजनपद्धति के साथ सर्वव्यापी देवी के रूप में सुस्थापित किया गया | वह ब्रह्मांड का मौलिक भौतिक तत्त्व और आधारभूत ढांचा है, वह चैतन्य और उर्जा है, और समस्त रूपों के प्रकटीकरण का माध्यम है | यद्यपि ईसाई धर्म में भी होली स्पिरिट मनुष्य के भीतर मौजूद है, लेकिन उसमें उसके बाहरी अथवा उपरी अवतरण को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है, और साथ ही शक्ति के विपरीत, होली स्पिरिट को मानव के आत्मरूप के सार (आत्मा) के रूप में अथवा ब्रह्माण्ड के मूलतत्व के रूप में भी नहीं देखा जाता|

ईसाई धर्म में ईश्वर और उसकी सृष्टि के मध्य एक अन्तर्निहित द्वैतभाव माना गया है | जिसके कारण पैगम्बरों, धर्माचार्यों और संस्थाओं के साथ एक ऐतिहासिक ईश्वरोक्ति अवश्यम्भावी हो जाती है. लेकिन शक्ति, सर्वव्यापी होने के कारण, इन पर निर्भर नहीं है; उसका अस्तित्व योग के माध्यम से अंतर्मन में प्रवेश करके जाना जा सकता है | चूंकि विश्व, शक्ति के विस्तार के अतिरिक्त कुछ और नहीं है, लगभग हर हिंदू गांव देवी की अपने-अपने विशिष्ट रूप में पूजा करता है| पारिस्थिकीय-नारीवाद इस ज्ञान में ही अन्तर्निहित है |

शक्ति का विद्युत श्रृंखला के रूप में, चक्र नामक सात केंद्र बिन्दुओ के माध्यम से हमारे भौतिक शरीर में कभी भी अनुभव किया जा सकता है |  शक्ति का एक प्रबल एकीकृत रूप, जिसे कुंडलिनी कहा जाता है, हर किसी की रीढ़ के मूलआधार पर निष्क्रिय रूप में रहता है | अनेकों आध्यात्मिक प्रक्रियायें कुंडलिनी को जगाकर और उसे उपरी चक्रों की ओर प्रवाहित करके, चैतन्य के साथ एकात्मकता की जागृति करवाने में सक्षम है|

ईसाई धर्म में मानव शरीर की अलग तरह से कल्पना की गयी है : एक ओर तो उसे भगवान की छवि के रूप में बनाया गया है, पर साथ ही यह मूल पाप (original sin) के संचरण का साधन है और व्यक्ति को “बुरी आत्माओं” (evil spirits) के लिए खोल देता है |

हिन्दू धर्म में गुरु, अपने शिष्य की कुण्डलिनी को जागृत करने में सहायता करता है और सामान्य जीवन में इस अनुभव को अंगीकृत करता है | इस अनुभव की व्याख्या ईसाई धर्म के समान एक विशिष्ट इतिहास के माध्यम से नहीं की जाती | ईसाइयों के बीच भी समय समय पर कुण्डलिनी के समान अनुभव हुए है, लेकिन मुख्यधारा के चर्चों ने उसे पथभ्रष्टता और यहाँ तक की शैतान के कार्य के रूप में माना | वे लोग जिन्हें इस तरह के अनुभव हुए है, स्वयं अपने मानसिक संतुलन पर शक करने की अवस्था में थे और वे अक्सर मनोरोगी माने गए और यहां तक उन्हें मानसिक रुग्णालयों में भर्ती भी किया गया |

हिन्दू धर्म में किसी प्रकार की कोई बुरी आत्मा अथवा दुष्ट शक्ति नहीं है | बल्कि, शक्ति में एक साथ सभी आयाम सम्मिलित है, वह एक भी है और अनेक भी, प्रकाशित भी है और अंधकारमय भी, सहायक भी है और प्रलयंकारी भी है |  इन युग्मों के दोनों पक्षों को अध्यात्म में एकीकृत किया जाना चाहिए। हिन्दू धर्म बड़ी सुगमता से पालनकर्ता पार्वती के साथ-साथ क्रुद्ध भयंकर काली को भी अंगीकार करता है| ईसाई धर्म अच्छाई और बुराई की द्विविधता पर महत्त्व देता है जिसकी परिणिति बुरी आत्माओं द्वारा कब्ज़ा किये जाने के भय के रूप में होती है| यह धारणा अक्सर मूर्तिपूजक और पेगन धर्मों के प्रति प्रदर्शित होती है, विशेषकर काली पर, जिसके सौन्दर्यबोध से पाश्चात्य लोगो को धक्का पहुचता है| इस तरह की बुरी आत्माओं से छुटकारा पाने के लिए यीशु का नाम लिया जाता है अथवा हाथ में बाइबिल रखी जाती है |

हिन्दू धर्म इस बात को मानता है कि कुण्डलिनी जागरण का कोई भी नकारात्मक प्रभाव, व्यक्ति की स्वयं की पूर्वावस्था और प्रकृति से उत्पन्न होता है| इसे बिजली की उपमा से भलीभांति समझा जा सकता है|  बिजली न तो अच्छी है ना ही बुरी, प्रत्येक विद्युत उपकरण अपने-अपने गुणों के अनुसार प्रतिक्रिया करता है| योगियों ने निडरता से कुंडलिनी साथ प्रयोग किये है जैसा कि वैज्ञानिक बिजली के साथ करते हैं। शक्ति स्पष्टतः स्त्रीस्वरुप है और उसके निरूपण अनगिनत है | होली स्पिरिट की भी समय-समय पर स्त्री रूप में कल्पना की गई, फिर भी, ईसाई धर्म में सबसे महत्त्वपूर्ण नारी छवि, वर्जिन मैरी, होली स्पिरिट के समरूप नहीं है। होली स्पिरिट रहस्यमय तरीके से जीसस को मेरी के गर्भ में स्थापित करती है, किन्तु यह एक विशिष्ट अनुभव है और अन्य मनुष्यों के लिए असंभव है (जबकि शक्ति का अनुभव हर किसी के द्वारा किया जा सकता )| मेरी के अनुभव को प्राप्त करने के लिए ईसाई धर्म में कोई भी अध्यात्मिक प्रक्रिया नहीं है, सिवाय किसी लाक्षणिक मान्यता के| अनेक अंतर-सांस्कृतिक विशेषज्ञ कुंडलिनी जागरण और पेंटेकोस्टल उपासना के मध्य एक समानता स्थापित करते है| शक्तिपात अथवा गुरु के द्वारा कुण्डलिनी जागरण के समान ही, चमत्कारिक गुरु के द्वारा सक्रिय चरम शारीरिक प्रतिक्रियाएं पेंटेकोस्टल के अनुभूतियों में भी सम्मिलित है | हालाँकि, मतान्तर के खतरे को रोकने के लिए इन अनुभवों को सावधानीपूर्वक पाप से मुक्ति (Salvetion) के प्रयास के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में संहिताबद्ध किया गया है, जो केवल जीसस की कृपा से ही संभव है | शक्ति के विपरीत, होली स्पिरिट को योग के माध्यम के प्रदर्शित होने वाले आतंरिक मूलतत्व के रूप में नहीं, बल्कि सामुदायिक प्रार्थना के माध्यम से आहूत एक बाहरी और अतीन्द्रिय शक्ति के रूप में अनुभव किया जाता है| पेंटेकोस्टल को बुरी आत्माओं के खतरे के प्रति विशेष रूप से सतर्क किया जाता है तथा एक गैर-ईसाई व्यक्ति से प्राप्त होने वाले किसी भी आध्यात्मिक अनुभव के खिलाफ सावधान किया जाता है, जिससे एक हिंदू गुरु पर विशेष रूप से संदेह किया जाता है| अनेक पाश्चात्यों ने ईसाई धर्म के आतंरिक मुद्दों, विशेष रूप से उसकी पितृसत्तात्मकता , संस्थाएं , कमजोर पारिस्थितिक आधार और योग के अभाव इत्यादि के समाधान के लिए हिंदू देवी के विविध पक्षों को समायोजित किया है | यद्यपि यह प्रशंसनीय है,  किन्तु इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए की शक्ति जैसे मूलभूत हिन्दू विचार केवल पूरक के रूप में तो नहीं आयात किये जा रहे| परम्पराओं का अलग अलग हिस्सों में विच्छेदन और उनके चुनिन्दा भागों का परिपाचन (digestion) करना, मूलस्रोत के स्वरुप का विकृतीकरण करता है|  शक्ति का अनुकूलन संभव नहीं है | ईसाइयों द्वारा शक्ति और कुंडलिनी की प्रामाणिक स्वीकृति उनके सामने बहुत सी चुनौतियाँ प्रस्तुत करेगी और इसके लिए परमात्मा के बहुलवादी अविर्भाव के विरुद्ध चर्च के सदियों लम्बे इन्क्विजिशन का विरोध भी अपरिहार्य हो जायेगा | देवी के साथ सीधा संपर्क की संभव हो सके इसके लिए ईसाई धर्म को फिर से नए सिरे से रचना होगा | और, यह पेगन धर्म, बहुदेववाद और कोलाहल की स्मृतियों पुनर्जागृत कर देगा|

Source: http://rajivmalhotra.com/library/articles/holy-spirit-shakti-kundalini/

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