गीता का आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध — 2

हिन्दू धर्म

Translation Credit: Vandana Mishra.

To Read First Part, Click Here.

इस्लाम के विरुद्ध इस्लाम

गीता का धर्म अथाह आत्म-परीक्षण पर आधारित है I महाध्यापक अकबर अहमद, ने नियुस-वीकली-रिसेंटली में उद्धरण किया है कि, सभ्यताओं के मध्य का संघर्ष इस्लाम और इस्लाम के मध्य का संघर्ष है—उदारवादियों और कट्टरपंथियों के विरुद्ध का है। इस्लामी विद्द्वानों को अनिवार्य रूप से आत्‍मनिरीक्षण करना चाहिए इस्लाम का, आधुनिकरण करने के लिए, प्रजातंत्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष एवं बहुवादी काल  के लिए, और सामाजिक सुधराव को गंभीरता से लेना चाहिए I इस्लाम के इतिहास में किंचित इस प्रकार के स्वरों की उन्नंती  हुई है, किन्तु ये प्रायः प्रभुत्व उग्रवादी तत्वों द्वारा दबा दिए गए हैं जो कि, इस अनेकता की स्थिति और आधुनिकता के विरोध में रहते हैं I

हमें महाराजा अकबर को नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने भारतीय विविध-आस्थाओं की आपसी चर्चा और संकरण – उर्वरण की परंपरा का प्रयोग करके, हिन्दू और मुसलमान विद्द्वानों के मध्य वार्तालाप स्थापित किया करते थे I इसके परिणामस्वरूप आध्यात्मिक नवप्रवर्तन और समन्वयता हुई, नूतन हिन्दू-मुसलमान वर्ण-संकर धर्मशास्त्र एवं समाज-शास्त्र में I भारत विश्व का सर्वोच्च प्रगितिशील इस्लाम की धरती बना I उनका पोता, दारा शिकोह, मुग़ल राजगद्दी के उत्तराधिकारी, संस्कृत एवं हिन्दू ग्रंथों के विद्द्वान हुए, जिन्होंने स्वयं गीता और उपनिषद का अनुवाद फ़ारसी भाषा में किया I उनका दृग्विषय था हिन्दू-मुसलमान की एक संगीतमय समाज जो आपसी सम्मान से स्थापित हो I तथापि, उनकी हत्या उनके अपने अनुज भ्रातः औरंगज़ेब द्वारा कर दी गयी I

औरंगज़ेब द्वारा दमनकारी शासन काल सभी मुग़ल राजाओं की तुलना में, दीर्घ कालीन हुआ, जिसमें उसने साम्प्रदायिक घृणा के बीज बोये एवं क्रमशः मुग़ल साम्राज्य का विनाश हुआ किंचित अँगरेज़ व्यापारियों के हाँथों। औरंगज़ेब द्वारा, दारा शिकोह की हत्या, एक निर्धारक चरण हुआ भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का, जिसका प्रभाव इतना दूरस्थ तक हुआ कि, वर्तमान में भी व्याप्त है I ये हिन्दू-मुसलमान इतिहास, कई शिक्षा प्रदान करता है धर्म पर, और कर्म की सीमा के पार क्रीड़ा पर, जिसका निर्माण किया गया था I कोई भी धर्म उग्रवादियों से वंचित नहीं है, और ना ही कोई धर्म तत्त्वतः उग्र है I इस्लाम का संतुलित मात्रा से भी अधिक भाग रहा है उग्रवाद में अधिकांश, इतिहास के द्वारा I कई  संयत एवं उदार इस्लामी विद्द्वान हैं, किन्तु वे धार्मिक नेताओं से भयभीत हैं और उनके स्वरों को वशीभूत कर दिया है I इस्लामी राजनैतिक नेताओं के लिए गीता में, संभवतः ये उपदेश होगा कि, वे अपने उदारवादी विद्द्वानों को समर्थ करें, और निम्नलिखित चरणों में इस्लाम की परिस्थितियों पर ध्यान दें:

बहुलवाद का प्रचार, ना कि, अब्राहमिक धारणा का:

इस्लामी सामाजिक संबंध बल देता है कि, इस्लाम ‘उसी ईश्वर की उपासना करते हैं जिसकी ईसाई करते हैं’, और ये कि, इस्लाम ईसाईयों के सभी ईश्वरदूत में आस्था रखते हैं, और इस्लाम भी जीसस को एक ईश्वरदूत मानते हैं I अब्राहमिक रिलीजनों की ये भ्रातृभाव आह्वन, ‘एकेश्वरवाद का पत्ता’ प्रयोग करके, अब्राहमिक-भिन्न धर्मों के विरुद्ध है जैसे, हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन, विक्का, पेगन, अमरीकी मूल निवासियों का शमन रिलिजन, शिंतो रिलिजन एवं कई अन्य के व्यय से है I ये द्विभाजन निरा मात्र ही पुनः-समनुरूप करेगा कि, कौन ‘भित्तर’ है वैध रिलिजन की भाँती, और कौन ‘बाहर’ है जो ‘झूठे ईश्वरों के उपासक’ हैं I ये दुहरा नैतिक सिद्धांत है, क्यूंकि ये इस्लाम को वैध करता है अब्राहमिक रिलिजन को गौरान्वित करके I

गीता बहुलयता का प्रचार करती है ये स्पष्ट करते हुए कि, प्रत्येक व्यक्ति भिन्न गुणों के होते हैं, और इसी कारण विभिन्न धार्मिक मार्ग भी व्याप्त है, वर्णित हैं और वे सर्वत्र वैध भी हैं I वर्तमान कालीन कदाचित ही कोई ऐसी प्रणाली व्याप्त है, जो आध्यात्मिकता की हो, इस विश्व में, और जो गीता के अनुसार वैध ना हो I

इस्लाम के दोनों अग्र भागों में सामंजस्य स्थापित करना:

पैन – इस्लाम एक भूमंडलीय संस्था है जिसका अग्र भाग पश्चिमी शांति एवं सहिष्णुता का है, अपेक्षाकृत अपने ही घर के इस्लाम के अंदरूनी विभिन्न अग्र भागों की तुलना में I इस्लामी समाज के शासक जो पश्चिमियों से व्यवहार रखते हैं, वे एक प्रजातंत्रवादी एवं शांति-प्रिय होने का चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि मुसलमान धर्म-गुरु जो उनके धार्मिक शिक्षाओं और उसके विश्लेषण को नियंत्रित करते हैं, प्रायः उग्र अद्वितीयता एवं विस्तारवादी झुकाव के होते हैं I अतएव, एक ‘पश्चिमी इसलाम’ है जिसका अनुसरण किंचित उच्च श्रेणी के लोग करते हैं और एक भिन्न ‘मूल निवासी इस्लाम’ है जिसका अनुसरण बृहत बहुसंख्यक लोगों द्वारा किया जाता है। इसका परिणाम ये हुआ है कि, भिन्न प्रकार के गुट जैसे उचित लोग/अनुचित लोग बन चुके हैं और वे अपनी भूमिकाओं का अभिनय कर रहे हैं, जिसमें इस्लामी प्रचारक उचित लोग हैं, और वे घोषणा करते हैं पश्चिमियों की रक्षा करने की, उन अनुचित इस्लामी लोगों से I

आतंकवाद से अपयुग्मन:

इस्लामी नेता इस्लाम की छवि को आतंकवाद से पृथक करने का प्रयास कर रहे हैं, ‘इस्लामी आतंकवाद’ परिभाषित शब्द मात्र से ही उसका आक्षेप करना। किन्तु उनको विभिन्न भूराजनैतिक संघर्षों और लक्ष्यों से भी स्वयं को पृथक करना होगा, जहाँ इस्लाम नियमतः आह्वान द्वारा अपने समर्थन के लिए गतिमान रहता है I किसी भी धार्मिक छोर का अननुशीलन अधार्मिक माध्यम से नहीं किया जा सकता है. कट्ट्रवाद मूलतः एक ‘तमस गुण’ (अज्ञानता) है I ये गतिमान होता है अभियान के रूप में, जब इसको ‘रजस गुण’ (उत्कंठा) के साथ मिश्रित करते हैं I इस प्रकार का भयानक तमस का मिश्रण जो रजस द्वारा संचालित हो, उसको किसी एक ही लक्ष्य के लिए नियंत्रित नहीं किया जा सकता है. अन्तः, वह अपने ही जीवन का प्राणघातक बनता है, और अपने ही रचयिता के नियंत्रण से बाहर चला जाता है — ये तालिबान की कथा हैI  

वे/हम की मानसिकता:

इस्लाम विश्व को दो वर्गों में विभाजित करता है: ‘दार-उल-इस्लाम’ (मुसलामानों का संसार) और ‘दार-उल-हर्ब'(मुसलमान-भिन्न संसार, काफिर या मूर्ति-उपासक).   मुसलमान नियमानुसार माँग करते हैं विभिन्न मापदंडों और मानकों की, जो अंतरंगी और अगन्तुक की बात करते हैं I इस प्रकार की अन्तर्निहित अंधराष्ट्रीयता किसी अन्य की ओर एक विरोधाभास है गीता की शिक्षा की तुलना में और अत्यंत घातक भी है I पैन-इस्लामी संथाओं को मुसलामानों के अपने उत्तरदायित्व एवं अन्य के आदर सम्मान करने पर केंद्रित करना चाहिए, ना कि, मात्र अपने अधिकारों के विस्तार की माँग और इस्लाम के लिए विशेषाधिकारों की माँग।

इस्लाम में अल्पसंख्यकों के अधिकार:

मध्यकालीन यूरोप में, मुसलामानों ने यहूदियों को, ईसाईयों की तुलना में, उचित ढंग से सहन किया था. किन्तु २० वीं शताब्दी में, अल्पसंख्यक धर्मों का दमन हुआ है इस्लामी देशों में I इस्लामी नेताओं को बहुलता पर, इस्लामी कार्यभार एवं गोष्ठी की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ पर मुसलमान-भिन्न लोग अपनी याचिकाएं प्रस्तुत कर सकें और जहाँ पर उनकी याचनाओं की निष्पक्ष रूप से सुनवाई हो, उन उदाहरणों में जहाँ मुसलमान घृणा पूर्ण भाषण दे रहे हों विधर्मियों, या अपकारक नियम या उन रीतियों के विषय में जो इस्लामी देशों में मुसलमान-भिन्न के विरुद्ध हैं, और इस्लाम के नाम पर किय्र गए अपराधों पर। इस्लामी विजयोल्ल्हास के आधिपत्य के विरुद्ध उनको फतवे देना चाहिए, क्यूंकि इसके कारण कई ‘धार्मिक अपमार्जक’, अलप संख्यकों के हुए हैं यथार्थता प्रत्येक इस्लामी राज्य में, दूतीय विश्व युद्ध के पश्चात् (जैसा की प्रमाणित रूप से सिद्ध किया गया है अल्पसंख्यकों की जनसँख्या के प्रतिशतता के पतन द्वारा)I

इस्लामी नियमों को पिघलाना:

वैसे तो ईसाई रिलिजन भी विशेष ऐतिहासिक घटनाओं के अधिनियमों एवं अद्वितीयता पर आधारित है, किन्तु उसमें सुधराव भी हुए हैं, और ज्ञानोद्दीप्ति ने  धर्मनिरपेक्षता भी, पश्चिमी सामजिक क्षेत्र में किया चूँकि सुन्नी मुसलमान नियम को अवरुद्ध कर दिया गया १० वीं शताब्दी खलीफा के आदेशानुसार, तो जो एक मात्र क्रियाविधि शेष बचती है, इस्लाम में नियमों को अद्यतनीकरण करने के लिए, वो है फतवा, जो कि, इस्लामी विधिशास्त्र का, एक परिस्थिति नियम माना जा सकता है I कई मुफ़्ती हैं जो फतवे की घोषणा करते हैं, और पावन कुरान और हादित हैं वे प्रायः अनुचित विश्लेषण के अनुसार चरमसीमा तक की पदवी का समर्थन करते हुए दर्शाये जाते हैं इस्लामी नेताओं को अतिशीघ्रह ही एक मंडली स्तःपित करना चाहिए शरीया (इस्लामी नियमावली) के संशोधन के लिए, विशेषकर क्यूंकि ये मुसलमान-भिन्न लोगों से संबद्धित है, जिससे कि, वह विश्वीय युग के सुसंगत रह सके I उनको आमंत्रित करना चाहिए और प्रोत्साहन देना चाहिए इस्लामी इतिहास एवं लेखों के महत्वपूर्ण परीक्षणों का, सभी के द्वारा, बिना विद्द्वानों के भय दर्शन से, जैसा की अन्य विश्व के धर्मों में सामान्य रूप से होता है I

शिक्षा एवं वार्तालाप में निष्पक्षता:

(अ) इस्लाम के नेताओं को निरूपण करना चाहिए कि, क्या आतंकवादी छावनियाँ इस्लामी नाम से प्रायोजक की गयीं थीं, और अब वे इससे पृथक होना चाहती हैं क्यूंकि इसने उनके समबन्धों को खट्टे किये हैं I उनको निरूपण करना चाहिए कि क्या, वे नैतिक रूप से उग्र सुधारवादी के शिशु का परित्याग कर सकते हैं, जिसका इस्लामी इतिहास में कई बार निर्माण किया गया है, एक इष्टानुकूल माध्यम की भाँती। 

(आ) मुसलमानी नेता जो आतंकवाद की निंदा करते हैं, वे प्रायः उसको यूएस की विदेश नीति पर आरोप लगाकर उसको योग्य सिद्ध करते हैं I इसके पश्चात् भी वे असफल रहे हैं, उसी सामान गंभीर रूप से, निंदा करने में, इस्लाम की अपनी नीतियों का और अपनी दीर्घकालीन ऐतिहासिक आघातों का जो उन्होंने मुसलमान-भिन्न लोगों के साथ किये हैं I उनको इस्लामी विस्तार के इतिहास के निष्कपट और पूर्ण विवरण का प्रायोजन करना चाहिए जो, अभिजिति, जिहाद एवं लूट द्वारा, ७ वीं शताब्दी से आरम्भ हुआ था I वैसे तो इस्लामी विस्तार और धर्मयुद्ध, पश्चिम में, उन अधिकांश पश्चिमियों को ज्ञात है, किन्तु दीर्घ कालीन हिंसक आंदोलन पूर्व भारत की ओर, को, शिक्षा सम्बन्धी पाठों से अभी तक दूरस्थ किया गया है, राजनैतिक संशोधन के नाम पर I मात्र सच्चाई और निष्कपटता से यदि इतिहास की शिक्षा दी जाए, तभी इस विश्व का विरोहण हो पाए गए और ये विश्व विकसित हो पायेगा, अपेक्षाकृत एकपक्षीय जनसंपर्क आंदोलन से I

गीता की, मानवता के प्रगति के लिए व्यंजन विधि

कल्पना कीजिये अनुमानतः कि, गीता की शिक्षा अधिकांश मानवता द्वारा अपनाली गयी हो I इस परिदृश्य में, संभवतः किस प्रकार का अग्रसर मार्ग हमें दिखाई देगा? विशेषकर, गीता की आध्यात्मिक प्रणालियाँ, जो आत्म अभ्युत्थान के लिए व्यग्तिगत रूप से इस जीवन में हैं, विपरीत उस जीवन-पश्चात् कई प्रतिज्ञा की धारणा से, संभवतः स्थूल रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

ज्ञान योग (उच्च ज्ञान का मार्ग):

इसमें कई विभिन्न सिद्धांतों को समझना और जीना सम्मिलित है, जैसे (१) सम्पूर्ण एकता एवं सर्व व्यापी जीव-जंतुओं की अवियोज्यता; (२) एक अन्तिम सत्य जिसकी, संकल्पना कई विभिन्न सन्निकटिकरण द्वारा किया गया हो और जिसमें से कोई भी, कदाचित कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता है; (३) कई विभिन्न आध्यात्मिक मार्ग जो एक ही, अंतिम सत्य के स्वरुप की ओर जाते हों; और (४) पनर्जन्म का सिद्धांत और उसकी चुनौती, स्वार्थ एवं अनैतिक जीवन शैली को I

राज योग (मनः- क्रियात्मक शास्त्र):

बहुप्रसिद्ध योग के अतिरिक्त, इन में अंतर्भूत चिन्तन, कुण्डलिनी, तंत्र, मनोवैज्ञानिक स्थिति जो वयक्ति की रहस्यवादी और आध्यात्मिक सीमा के पार हैं, एवं मानववादी मनोविज्ञान भी हैं जो कि, वर्तमान में अमरीका में मुख्य धारा में सम्मिलित किये जा रहे हैं I अनुमानतः २० मिलियन अमरीकी इन में से किसी ना किसी शास्त्रों का अभ्यास करने में लीं हैं I मात्र एक ही पीढ़ी के अभ्यास के पश्चात्, लाभों का लिखित प्रमाण पत्र सम्मिलित है जिसमें: उत्तम स्वास्थ्य, तनाव न्यूनीकरण, अल्प हिंसा, सुधरे हुए नैतिक व्यवहार, सुधरे हुए बौद्धिक, भावनात्मक एवं बलिष्ठ कार्य पाए गए हैं I बढ़ती हुई अमरीकी, जन संख्या तीव्र गति से उच्च स्तर के योग की ओर जा रही है, जहाँ पर व्यक्ति को उत्कृष्ट आध्यात्मिक स्तर और अवतीर्ण कायापालट का अनुभव होता है I

कर्म योग (नैतिकता एवं अनुकम्पा):

गीता उच्च नैतिकता के व्यवहारों की, अपेक्षा सीमा निर्धारित करती है, जीवन के प्रत्येक चरणों में, जिनमें: परिवार और मित्रों की ओर; समाज की ओर, बिना किसी व्यक्ति के धर्म या जाती की चिंता बिना, और प्रकृति एवं परिस्थितिविज्ञान की ओर, अनुकम्पा सम्मिलित है, क्यूंकि पर्यावरण भी पूजनीय है I

भक्ति योग (निष्ठा):

ये सम्मिलित करती है विभिन्न प्रकार की भक्ति, उपासना और शास्रविधियों की प्रविधि को I इनमें दोनों सम्मिलित हैं, व्यक्तिगत अभ्यास प्रणाली जो सम्पूर्ण एकांकी में होती है और आराधना के स्थान पर की गयीं सामूहिक गतिविधियां I

मनुष्य-बहुरूपता को पहचनना, रचना का मूल सिद्धांत है, गीता की आध्यात्मिक रंगपटलता सामंजस्य करती है, अनगिनत मानव मनोदशाओं के अनगिनत मार्गों को: किसी भी रिलिजन के आध्यात्मविद्या संबंधी सिद्धांतों को सम्मिलित किया जा सकता है इस विवृत प्रणाली में I अतः गीता के निकट, वर्तमान में, कई सन्देश हैं, विश्व के कई रिलिजन के नेताओं के लिए:

रिलीजनों को आपस में स्पर्धा समाप्त कर देना चाहिए. मानवता को “मेरा” रिलिजन, जैसी एकरूपता देना, अनिवार्य रूप से समाप्त होना चाहिए I उनको सहयोग देना चाहिए, एक दूसरे से शिक्षा लेनी चाहिए और अपने अनुभवों को साझा करना चाहिए उन प्रहेलिकाओं के लघु अंशों की भांति जो सामूहिक रूप से सुलझाए जाते हैं I मनुष्यता को अवश्य ही, धार्मिक विविधताओं को परिरक्षित करना चाहिए, उसी उत्साह से जैसे वर्तमान में, हम सभी पेड़-पौधों की प्रजातियों और जानवरों की प्रजातियों को लुप्त होने से उनकी रक्षा कर रहे हैं I  

आध्यात्मिक सत्य लगातार विकासशील होते रहते हैं, और उनको अधिनियम द्वारा स्तंभित नहीं किया जा सकता है. ना ही वे किसी एक प्रजाती दल या सभ्यता को विशेषाधिकार देते हैं अन्य की तुलना में I

धार्मिक जीवन, किसी भी प्रकार के आस्तिक दल में सम्मिलित हो कर नहीं प्राप्त किया जा सकता है, या किसी पूर्व घटित ऐतिहासिक सिद्धांत को समर्थन देकर भी नहीं प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु वह मात्र जीवन जीने की शैली के अभ्यास से जो कि, धर्म के समनुरूप हो, उससे प्राप्त किया जा सकता है I ये यात्रा व्यक्तिगत है, ना की कोई दल बनाकर किसी क्रीड़ा स्पर्धा में किसी को पराजित करने की है. गीता किसी अन्य के विजयोल्लास से परिपूर्ण की अभिवृत्‍ति के विरुद्ध है. ये योग है, ना कि, ‘किसी को बलपूर्वक पराजित’ करने की मानसिकता.

याजक-वर्ग की सत्ता और किसी भी प्रकार के उत्‍क्रम को निम्न रखना होगा, क्यूंकि प्रगति के लिए, ये अत्यंत ही संस्थागत, स्वयंसेवी एवं बाधाएं हैं I

‘धर्म’ कोई पूर्वकथित रिलिजन नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक ढाँचा है, और उपकरणों का समूह है व्यक्तिगत साधुता एवं आध्यात्मिक अंवेषण का. गीता सर्वत्र मानवता को, सच्चाई और निडरता से, वर्तमान की संकटावस्था की सीमाओं से, पार जाने का आदेश देती है I कोई भी अप्रत्यक्ष या सकराई से परिभाषित अगुआई धर्म के विरुद्ध है I हिन्दुओं को उदाहरण स्थापित करना चाहिए, किसी को उनके प्रजातीय या धर्म पर आधारित ‘अन्य’ की दृष्टिकोण से ना देखते हुए । कर्म और गुण पूर्णतः व्यक्ति की योग्यता पर आधारित हैं, और ना कि, उनकी प्रजाति या धर्म पर I


यथा सम्भव आकर्षित पंक्तियाँ:

१. पश्चिमियों द्वारा गीता को जिहाद के समरूप सिद्ध करने का प्रयत्न।

२. सऊदी अरब द्वारा, दशकों से निर्धन देशों के मदरसों में, वहाबी इस्लाम (एक इस्लामी कटट्रपंथी विचारधारा) को प्रोत्साहन।

३. गीता में, शांति स्थापित करने के लिए स्वयं श्री कृष्ण ने युद्ध को टालने का यथा संभव प्रयत्न किया था I जिहाद में मात्र मुसलमान ना होना ही, पर्याप्त है मृत्यु दंड के लिए I

४. महाराजा अकबर के शासन काल में, भारत विश्व भर में इस्लाम का सर्वोच्च प्रगतिशील आधार बना.

६) उदारवादी, दारा शिकोह का उपनिषद को फ़ारसी भाषा में अनुवाद करने का परिणाम: औरंगज़ेब द्वारा उनका सिर कटना।

७. मुसलामानों द्वारा आतंकवाद का आरोप यूएस के राजनैतिक नीतियों पर I

८. ‘धर्म’ : ईश्वरदूत सम्बन्धी रिलिजन नहीं बल्कि, व्यक्तिगत सच्चाई एवं आध्यात्मिकता का अंवेषण है I

९. कर्म एवं गुण पूर्णतः व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित हैं, ना कि, किसी के प्रजातीय या धर्म से.

Leave a Reply