रीसा लीला-१: वेंडी का बाल-परिलक्षण – 1

विशिष्ट स्वदेशी इंडोलॉजी हिन्दू धर्म

कुछ अमरीकीयों के अनुसार भागवत गीता एक अच्छी पुस्तक नहीं हैI महाभारत की पूरी पुस्तक में कृष्ण समस्त मानव जाती को विभिन्न प्रकार के प्राणघात एवं आत्म – नाश व्यवहारों के लिए जैसे, युद्ध, के लिए प्रेरित करते हैंI गीता एक असत्य पुस्तक है”

— वेंडी डोनिगर, इतिहास एवं धर्म की महाध्यापक, शिकागो महाविद्यालय, ने उद्धृत किया पहिलेडेल्फिया इन्क्वॉयरेर में, १९ नवंबर, २०००[१].

मेरी पूर्वी सुलेखा की पंक्ति [२], में मैंने आलोचना की थी कि, किस प्रकार उत्कृष्ट (पश्चिमी प्रभाव ग्रस्त) भारतियों को अपनी भारतीय सभ्यता को नीचा दर्शाना अत्यंत ही आधुनिक लगता है, जब की, पश्चिम में, सर्वोत्कृष्ट विद्यापीठ में ग्रीक एवं अन्य पश्चिमी आदर्शलेखों को पश्चिमी सभ्यता का मूल अत्यंत ही सम्मानपूर्ण माना जाता हैI इसके अतिरिक्त,ये भारतीय अपने आपको पश्चिमी-अभिन्नता (आधुनिकता और पश्चिमीयता को झूठी तुलना करनेवाले) की मान्यता देने में अपनी पश्चिमी साहित्य में हुई शिक्षा से मिश्रित करते हैं, और अपनी भारतीय परंपरा को हीं दर्शाने के लिए किसी भी सीमा को पार कर लेते हैंI

वर्त्तमान रचना एक अन्य महत्वपूर्ण शास्त्र की ओर विक्रय कर रही है, यानि, धार्मिक अध्ययन, जो की बड़ी शीघ्रता से यु,एस में और कई अन्य देशों में बढ़ रही है I दुर्भाग्यवश, ये भारत में नहीं हो रहा है जहाँ पर एक विचित्र “धर्मनिरपेक्षवाद” की छाप ने इसको धार्मिक विद्द्वत्परिषद में निषेध किया है शिक्षण प्रणाली में गंभीर रूप से प्रवेश करने मेंI अतः कई भारतीयों में आवश्यक सामर्थ्य नहीं है इस विद्द्यामूलक क्षेत्र को समझने की, कि ये किस भांति भिन्न है दोनों से I

भारतीय संविधान की धारा २८.१ की व्याख्या अनुसार: “राज्य निधि से पूर्णतः भरण-पोषण करनेवाली कोई भी धार्मिक संस्था में कोई भी धार्मिक निर्देश नहीं प्रदान किया जायेगा I” तथापि, छात्रवृत्ति एवं शिक्षण, किसी धर्म के विषय में,किसी विद्द्वत्परिषद क्षेत्र के धार्मिक अध्यन, इस धारा का उलंघन नहीं करेगी , क्यूंकि धार्मिक अध्द्ययन वाले विद्द्वत्परिषद कोई भी प्रवचन नहीं देते ( अर्थात, कोई निर्देश नहीं देते ) किसी धर्म, और ना ही विग्ज्ञापन या किसी धार्मिक कथन को असत्य मान ने के लिए I

अपेक्षाकृत, ये सत्य – दृण कथन सिखाते हैं [३] उनके धर्मानुसार बनाये गए, उसके इतिहास एवं समाज-शास्त्र और अन्य इत्यादि पर निर्धारित. यह एक महत्वपूर्ण अलगाव है जो की यु.एसके संविधान में भी प्रतिष्ठापित है I तिस पर भी, “भारतीय धर्मनिरपेक्षता” ने जन समुदाय को वंचित कर दिया धर्मों की विभिन्नता, जो की भारतीय जीवन का मूल है, उस विषय में शिक्षित होने से. इस प्रामाणिक ज्ञान की शून्यता भरी गयी, कई दृष्टांतों में, अनैतिक सिद्धांतों द्वारा I

इस निबंध का कटाक्ष पश्चिम में, भारतीय धर्म के चित्रण के चारों ओर भ्रमण करता है I प्रशंसा करने में असमर्थ हैं, कैसे और क्यों धार्मिक अध्ययन के विद्द्युत्परिषद भिन्न हैं अन्य गतिविधियों से जो की समान प्रतीत होती हैं, कई भारतीय अनभिज्ञ हैं उन दुर्व्यवहारों से जो पश्चिम में हो रहे हैं परिणामस्वरूप (क) भारतीय परंपरा की नकारात्मक रूढ़िवाद चित्रण, एवं (ख) भारतीय परंपरा का दुरूपयोग करके उसकी जड़ को मिटा देना I

यहाँ पर एक लाक्षणिक उपाख्यान प्रस्तुत है जो कि मेरी कुंठा की व्याख्या करता है: मैंने भारतीय दैनिकी को एक लेख भेजा की किस प्रकार हिन्दुइस्म का असत्य चित्रण अमेरिकी विद्युतपरिषद में किया जा रहा हैI संपादक अत्यंत ही आकृष्ट हुए I किन्तु आलोचकों की टिप्पणियां अविश्वासनीय रूप से सरलमति थीं, हमारे आधारभूत ढांचे के विषय में और धार्मिक अध्ययन के प्राकृतिक स्वाभाव के क्षेत्र में —एक आलोचक भर्मित था धार्मिक अध्ययन के विद्द्वत्परिषद को किसी अन्यI हिन्दू मंदिर या आश्रम को लेकर जो कि उ.एस.ए में पहले से ही शिक्षित कर रहे हैं,जबकि एक अन्य आलोचक अचंभित था कि क्यों इस क्षेत्र का धर्मनिरपेक्षता के युग में क्या महत्त्व है ! जब मैं ने ये विद्वत्तपरिषद में पश्चिमी मित्रों को दिखाया, तो उनको ये भारतीय विचार मनोरंजक लगे I

किसी भी अन्य बृहत क्षेत्र के सामान, पश्चिम में, धर्मिक अध्ययन को अत्यधिक ही संगठित रखते हैं, प्रतिष्ठापूर्ण पत्रिका, पद एवं विद्द्याभ्यास कार्यक्रम से जोड़े रखते हैंIइस प्रकर कई अध्ययन एवं शोध के लिए एक उचित परिभाषित प्रबंध है, जो प्रगोय करता है कई साधन एवं प्रतिमा जिनको अब “हेर्मेनेयुटिक्स” के नाम से विदित किया गया है Iप्रस्तुतिकरण का ये सिद्धांत है, विशेषकर धार्मिक सूत्रों का, एक नविन विधि से प्राप्त करना एक नूतन व्याख्या किसी ज्ञान के सूत्र के शरीर से, जिस से कि (आशापूर्वक) हमारा परिज्ञान किसी सूत्र के विषय में या प्रसंग में विकसित हो जाये I

इस क्षेत्र के विधिवत नियंत्रण के लिए, भारतीय धर्मों से सम्बंधित, एक संगठन निर्मित किया गया है जिसका नाम है “रिसा”(रिलिजनइन साऊथ एशिया- RISA ). रिसा एक विभाग है “द अमेरिकन अकादेमी ऑफ रिलिजनस (AAR–ए.ए.आर )” की , जो कि विद्द्वत्परिषद के विद्द्वानों के धार्मिक अध्ययन की एक कर्मचारी संस्था है पश्चिमी संसार में I

५० वर्ष पूर्व, विद्द्वानों के संघ का विभाजन हुआ जो धार्मिक अध्ययन करते थे, और दो संस्थाएं उत्त्पन हुईं: ए.ए.आर (AAR) और एस.बी.एलSBL(सोसाइटी ऑफ़ बिब्लिकल लिटरेचर)Iए.ए.आरऔर एस.बी.एल अत्यंत घनिष्ट सम्बन्धी हैं और एक दुसरे को प्रभावित करते हैं, और साथ ही अपना वार्षिक सम्मेलन संयुक्त रूप से आयोजित करते हैं I एक ओर एस.बी.एल के सदस्य जूडियो – क्रिश्चियनिटी के अंतरंग दृश्य का अध्ययन और प्रचार करते हैं, दूसरी ओर ए.ए.आर के सदस्य तथाकथित किसी परंपरा का उद्देश्य दृष्टान्त का बहरी रूप से अनुसरण करते हैं और किसी भी प्रकार का प्रचार नहीं करते हैंI तथापि, जैसा की मैंने कई बार ध्यान दिया है कि, हिन्दुइस्म के आगंतुक , जुडियो – क्रिश्चियनिटी के अंतरंग होते हैं, और/या पश्चिमी नारीवाद, और/या मार्क्सवाद, और/या किसी अन्य विचारधारा के, अतः वे “निष्पक्ष” नहीं होते हैं जैसा कि उनका प्रचार किया जाता है I

१०,००० से भी अधिक विद्द्वान सदस्यों के बाद भी वृद्धि करते रहना ए.ए.आर के पास बृहत जोड़ है भविष्य में धार्मिक अध्ययन की दिशा में, और अप्रतक्ष्य रूप से पूरे मानवजाति पर व्यापकता के साथ I

क्यूंकि भारत का चित्रण, पश्चिम में अभिन्न है भारत के धार्मिक जीवन के चित्रण से ( जिसका कि कई भारतीय धर्मनिरपेक्षों ने असफल कामना का प्रयत्नकिया), री.सा विद्द्वानों द्वारा किया गया कार्य का तात्पर्य नियमबद्धता की सीमाओं से अत्यंत दूर है I

प्रधान रूप से धर्म का चित्रण किया गया है, साऊथ एशियन स्टडीजस, एशियन स्टडीजस, अंतर्राष्ट्रीय स्टडीजस, नारी सम्बन्धी अध्ययन, दर्शन शास्त्र, समाज शास्त्र, नृविज्ञान, इतिहास, साहित्य एवं राजनीती और अप्रत्यक्ष्य रूप से प्रभावित करते हैं पत्रकारिकता, चलचित्र और कई अन्य इत्यादि को I अतः भारतियों की नीरा अनभिज्ञता इस शास्त्र के सम्बन्ध में एक अत्यंत ही बृहत अंतराल है जिसको चौकसी एवं उपचार की आवश्यकता है I

इसी बीच, पश्चिमी नियंत्रण में हिन्दुइस्म का अध्ययन ने भद्दा हास्य चित्र निर्मित किया है जो कि बड़ी सरलता से बॉलीवुड चलचित्र या दूरदर्शन में कोई धारावाहिक बनाया जा सकता है Iये लीला[४], इस निबंध का विषय रिसा के अंतर्गत कार्यों से है I (वे पाठक जो रिसा और एएआर से अनभिज्ञ हैं उनको ये निबंध अवश्य पढ़ना चाइये एक सामान्य पश्चिमी विद्द्वत्परिषद हेतु एवं भारत सम्बन्धी अध्ययन से जुडी नियंतरण नियम से अमुख होने के लिए ।यद्दपि दिए गए उदहारण रिसा – विशेष हैं, उनका सन्देश विस्तीर्णता से लागु होता है I )

वेंडी डोनिगर[५] द्वारा, रिसा की कृति १, हिन्दुइस्म की कामुकता का सञ्चालन, करती है जो कि निःसंदेह अत्यंत ही शक्तिशाली व्यक्ति है हिन्दुइस्म अध्ययन विदववत्परिषद की वर्त्तमान में, और अन्य कई जो उनसे प्रेरित हैं Iवो भूतपूर्व प्रधान सभापति रह चुकी हैं अमेरिकन अकादमी ऑफ़ रिलिजन की, अब वो रिलीजियस स्टडीज ऑफ़ शिकागो, एवं कई विदववत्परिषदों में प्राध्यक पद का नेतृत्व करती हैं, और प्रभावशाली समिति का भी, उनको दो विद्यावाचस्पति (हारवर्ड एवं ऑक्सफ़ोर्ड) की उपाधि से मिली है और वे एक उर्वरा ग्रंथकारा हैं वो भूतकाल में एसोसिएशन ऑफ़ एशियाई स्टडीज की एक अत्यंत प्रभावशाली प्रधान अधिपति रह चुकी हैं I

सर्वाधिक अत्यंत उत्तोलन जो उनको मिला वो ये है की उन्होंने हिन्दुइस्म में इतने अधिक वाचस्पति क्षात्रों को उत्प्पन किया है उतना वर्त्तमान में किसी ने भी पूरे विश्व में नहीं किया है. उन्होंने सफलतापूर्वक उन भूतपूर्व क्षात्रों कोकई उच्य उत्तोलन वाले विदववत्परिषद में कार्य दिलवाया पूरे पश्चिमी संसार में जो उनकी हिन्दुइस्म के शोध की विद्या और सिद्धांतों के झंडे लेहरायें। . ऐसा कोई भी स्थान नहीं है जहाँ इस क्षेत्र के विदववत्परिषद में कोई बिना इनकी प्रतिष्ठा के प्रभाव से अछूता हो, उनके बृहत संप्रदाय वाले क्षात्रोंद्वारा, जो उनकी प्रतिपालक के बदले में उनका गौरवगान करते हैं।

बी.बी.सी से जुडी साइट उनका परिचय इस प्रकार करती हैं: “महाध्यापक वेंडी डोनिगर, प्रतिष्ठित संस्कृत विदववत्परिषद के प्रवेशमार्गों में, उज्जड, अशिष्ट एवं दुराचारी की भांति, जानी जाती हैं. उनके सर्वत्र मुख्य कार्य संस्कृत मूलपाठ के काम-क्रिया के चहुँ ओर घूमते हैं…” (वेंडी डोनिगर के चित्र के लिए, पाद टिप्पणी को देखें। [६])

वर्ष २०००, में ए.ए.आर की वार्षिक सभा में वेंडी (जैसा की उनको स्नेह से पुकारते हैं) के सम्मान में उनके अनुरागियों द्वारा एक विशेष बैठक में उनका अभिनन्दन किया गया था।उन्होंने आनंद उठाया है मताधिकारी निर्माण करने का और उसके द्वारा स्वयं की चिरस्थयित्व को देखती हैं [७]. एक के पश्चात एक वक्ता उनके बृहत महान उपलब्धियों का वर्णन कर रहे थे. दर्शकों में से कई लोग उठकर उनसे जुड़ रहे थे—संभवतः अपनी पदावधि, कार्य, या उन्नति को सुनिश्चित करने हेतु. तत पश्चात् मैं ने अपना हाँथ उठाया, और जब वेंडी ने स्वीकृति दी, तब मैं खड़ा हुआ और मैं ने प्रश्न किया:”चूँकि आपने हिन्दुइस्म का मनोविश्लेषण किया है और पांडित्य की एक नविन शैली निर्मित की है, तो क्या आप के विचार से ये उत्तम ना होगा कि आपका कोई मनोविश्लेषणकरे, क्यूंकि आपके अवचेतन में यदि कोई परिज्ञान करे तो आपका कार्य और भी रोचक और सुबोध होगा?”

वहां बैठे दर्शकों मेंएक विकल चिंता एवं हास्य का वातावरण बन गया, और वेंडी ने कहा कि, ऐसा कुछ भी नूतन नहीं है जो कोई मनोविश्लेषक उनके उपलक्ष्य में पता कर सके, क्यूंकि उन्होंने कुछ भी गुप्त नहीं रखा है Iमैं पुनः खड़ा हुआ और बोला कि कई यजमान भी यही कहते हैं कि अपने मनोविश्लेषकों से कि उनहोंने अपने मानसिक तलघर में उनसे कुछ नहीं छुपाया है, किन्तु उन भांति के यजमान निश्चितरूप से अत्यधिक रोचक व्यक्ति होते हैं जिनका मनोविश्लेषण किया जाता है Iवे पुनः हँसी, धैर्य पूर्वक बोलीं , “आपने मुझे यहाँ पकड़ लिया है” .मैंने एक टिपण्णी से समापन करते हुए ये कहा कि भविष्य में अगले कुछ वर्षों तक उनकी निजी मनोवृति पर शोध होंगे, और तब किसी दिन अन्य कई पश्चिमी विद्द्वानों की भी मनोवृति का मनोविश्लेषण किया जायेगा, क्यूंकि वे अपने शोध पर निजी और सांस्कृतिक अनुबंधन को थोपते हैं जो वे अन्य लोगों पर करते हैं.

रिसा लीला की ये कृति १, आरम्भ करती है इस प्रकार के विश्लेषण की I मैं आशा करता हूँ कि भावि रूप से ये रिसा के सभी सदस्यों पर लागु नहीं होते हैं I ये विशेषकर एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण घटना से सरोकार रखते है, धार्मिक अध्ययन, जिसको मैंने परिभाषित किया है वेंडिस चाइल्ड सिंड्रोम नाम से.इस कृति १ के ढाँचे को पहले आधुनिक रिसा क्षात्रवृद्धि के ४ नए उदाहरणोंको संक्षिप्त रूप से करना है जिसमें ये नयी शैली वेंडीस चिल्ड्रन द्वारा[८]: विजेता मानी जा रही है.

१. श्री रामकृष्ण, १९ वीं शताब्दी के हिन्दू साधू, को इन विद्द्वानों ने यौन-प्रताड़ित समलिंगकामी घोषित किया है, और ये “शैक्षणिक दृष्टि से प्रमाणित ” किया गया है वेंडी डोनिगर के क्षेत्रों द्वारा कि रामकृष्ण एक बाल-कामी उत्पीड़क थे और उन्होंने विवेकानंद पर समलैंगिक गतिविधियों को प्रचंडता से किया था I इसके अतिरिक्त, ये नए”अविष्कार” का अंश बन चुकी है कि रामकृष्ण के गुप्त अनुभवों, और निश्चित ही सार्वजानिक रूप से सर्वत्र हिन्दू जो रहसयवादी हैं, वे रोगात्मक यौन स्थिति के होते हैं जिनका मनोविश्लेषण आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, इन विद्द्वानों ने ये निष्कर्ष निकला है कि सर्वत्र हिन्दू समाज का यौन-पंथातरण के उपलक्ष्य में मनोविश्लेषण, होना चाहिए, इनको आधुनिक भारतीय समाज एवं राजनीती को तटस्थ भाव से समझने के लिए.

२. इन विद्द्वानों के अनुसार हिन्दू देवियाँ, कई रोगात्मक परिस्थितियों के साथ कामुकता की ओर उन्मुक्त रहती हैंI पश्चिमी विद्द्वान इस विषय में चर्चा करने में लगे हैं की कौन सी परिस्थिति में कौन से सर्वोत्तम रोग ग्रहस्त किस देवी की विशेष अवस्था से जोड़ें, और घोर परिश्रम कर रहे हैं प्रग्रहण करने के लिए किसी ठोस पुष्टिकरण तथ्य के लिए, भारतीय समाज के अप्रवाही जल में I

३. अन्य कई निष्कर्ष जो इन उच्च-स्थापित विद्द्वानों के समावेश में है जैसे : गणेश की सूंड “लचीली शिश्न” है; उनका टुटा हुआ गजदंत चिन्ह है हिन्दू पुरुष के जटिल बधियापन का ; उनकी बृहत तोंद प्रमाण है हिन्दू पुरुषों की बृहत मौखिक काम-क्रिय की भोजनेच्छा का I शिव, को उन्होंने भाषांतरित किया है एक अनियंत्रित कामी, जो की उत्तेजित करते हैं शास्त्रविधि – बलात्कार, वेश्यावृति एवं हत्या करने के लिए, और उनकी उपासना हिंसा एवं विनाश से जुड़ी है I

४. ये विद्द्वान, हिन्दुओं को रेखांकित करके, सशक्त रूप से त्याग रहे हैं उसी मानव-अधिकार को जो की “सभ्य पश्चिमी” पा रहे हैं I उदहारण, निर्विज्ञानियों ने ये निष्कर्ष निकला है कि शुश्रूषा माँ अपने शिशु से उस प्रकार से अनुबंधित नहीं होती हैं जिस प्रकार गोरी, स्त्रियां होती हैं, उनहिन्दुओं में विशिष्टता का आभाव होता है, कारण ये है कि वे असक्षम हैं अंतरिक्ष या समय के भेद को समझने-बूझने के लिए, और महाभारत को एक उच्च कोटि के दृश्टान्त से कृष्णा का जातिसंहार समझना होगा I

इस “विद्द्वत्तापूर्ण” साहित्य के संक्षिप्त निरिक्षण के पश्चात, एक प्रमुख आकस्मिकता इस निबंध में प्रतीक्षा कर रही है—–यथोचित संदेह कि क्या ये कर्तलध्वनि विद्द्वानों ने किसी समाये उचित ढंग से भारतीय भाषा का अध्ययन भी किया है, जिस में की ये घोषणा करते हैं कार्य करने की I

इस पृष्टभूमि के पश्चात्, मैं ये निर्धारित एवं विश्लेषण करता हूँ वेंडिस चाइल्ड सिंड्रोम, और अपने क्रोध का अनुसन्धान करता हूँ जो इस शोध की प्रतिक्रिया है I इस निबंध का समापन होता है प्रतिक्रियाओं से जो मुझे कई रिसा सदस्यों की आलोचना से मिली, जिन्होंने इस “अपवादजनक” प्रालेख के विवरण पर टिपण्णी की I

इसके पूर्व कि आप रिसा लीला के महत्त्व को भारतीय समाज पर अस्वीकार करें, कृपया ये ध्यान रखें कि उस विद्यालय के महाप्राध्यापक, उ.एसमें सर्वाधिक पाठशालाओं में इस प्रकार की कई पुस्तकें लिखते हैं I इन विद्द्वानों के लेख उपयोग किये जाते हैं अगली पीढ़ी के पत्रकारों, राजनेता एवं हमारे अपने बच्चे जब वे घर छोड़कर विद्यालय जाते हैं I वेंडी डोनिगर और उनके बच्चों का योगदान हिन्दुइस्म एवं भारत के कई विषयों में है जैसे बहुचर्चित उपयोगी संसाधन जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट की एनकार्टा एवं अन्य इनसाइक्लोपीडिया I इसलिए यदि आप गहरायी तक जाएं पता लगाने के लिए कि कैसे और क्यों अमरीकी मुख्यधारा में भारतियों के विरुद्ध इतनी रोगात्मक बातें कैसे हैं, रिसा निश्चित ही वो स्थान है जहाँ पर आपको निरिक्षण करना चाहिए I

मैं आशा करता हूँ कि ये निबंध आरम्भ करेगा एक प्रतिपुष्टि कुंडली का भारतीय समाज को शिक्षित करने में, जो की रिसा के कार्य का विषय है, किन्तु जिसको अभी तक अँधेरे में रखा है , इस सन्दर्भ में, कि, क्या लिखा और कहा जा रहा है पीठ पीछे।

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Translator: Vandana Mishra.
Original Article:
RISA Lila – 1: Wendy’s Child Syndrome
URL: https://rajivmalhotra.com/library/articles/risa-lila-1-wendys-child-syndrome/
Featured Image Credit – Swarajyamag.com

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