रीसा लीला: वेंडी का बाल-परिलक्षण – 3

भारत विखंडन विशिष्ट

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Psychological Profile of the Scholar:

Kripal’s Indian name comes from his father, whose family was of Roma (“gypsy”) extraction and lived inCentral Europe for many generations. Jeff admits to this only when asked point-blank, and identifies himself as a white man.[ xxxi ] It has not been psychoanalyzed as to what extent his Oedipal struggle to distance himself from his father might have compelled him to prove his alienation from Indic traditions by engaging in scholarly Hindu-bashing.

विद्द्वान के रेखा-चित्र की मनोमिति:

कृपाल का भारतीय नाम उनको, उनके पिता से मिला है, जिनका परिवार रोमा (“जिप्सी”) कुल का था एवं मध्य यूरोप मैं कई पीढ़ियों से बसा हुआ था I जेफ्फ, इस बात को स्वीकार करते हैं यदि सीधे-सीधा पूँछा जाये, और स्वयं को गोरा मनुष्य समझते हैंI[३१]. अभी तक मनोविश्लेषण नहीं किया गया है कि, किस सीमा तक उनके मातृरति संकुलता ( एक प्रकार की मानसिक-अव्यवस्था, जिसमें मुख्यतर पुत्र अपनी माँ की और आकर्षित होता है, और अपने पिता को अपने और अपनी माँ के प्रेम के बीच का शत्रु समझने लगता है) के संघर्ष का, जिसमें उनको, स्वयं को, अपने पिता से, संभवतः विवश कर दिया होगा, दूर रहने के लिए, ये सिद्ध करने के लिए अपनी विरक्ति भारतीय परम्पराओं से, जिसके कारण वे व्यस्त रहे विद्द्वत्तापूर्ण हिन्दू-प्रहारों में I

इसके अतिरिक्त, महाध्यापक सिल, समझते हैं कृपाल की “मनो-मैथुनिक मानसशास्त्र “[३२]:

हमें ज्ञांत हुआ कि, शिकागो ग्रेजुएट विद्यालय में, भर्ती लेने से पूर्व, जेफ्री एक मठवासी होने का प्रशिक्षण ले रहे थे या एक मंत्री होने का किसी कैथोलिक शिक्षालय में जहाँ उनको “बाध्य किया गया अन्वेषण करने के लिए कामुकता एवं आध्यात्मिकता के अंतरापृष्ठ के मध्य में और उनको अनुभव “यातना से भी अधिक कष्ट हुआ अपनी [स्वयं] की मनो-मैथुनिक मानशास्त्र से”I “मनो-मैथुनिक मानशास्त्र” से कृपाल का अर्थ है, जैसा की वे बताते हैं, क्षणस्थायी, अरुचि भाववाहक I इसका अर्थ है, सब कुछ ठीक है, एक तर्कहीन अवस्था जिसमें रोगी कोई भी खाद्य-पदार्थ नहीं धारण कर सकता (या मल, यदि हम चयन करें कृपाल की भांति समझने का–जैसे मनो-विश्लेषणात्मक प्रतीकवाद जो वे लागू करते हैं रामकृष्ण पर) शरीर में I वे ये भी लिखते हैं कि उन्होंने अनुभव किया अपने अध्ययन से ईसाई वधु के रहसयवाद का कुछ सीमा तक अपवित्र होना क्यूंकि वह अप्रत्यक्ष रूप से सम-कामोत्तेजक है I तथापि, और आगे चिंता (या संभवतः ध्यान) करने के पश्चात् उस विषय पर, कृपाल “पहुँचते हैं अपेक्षाकृत अचंभित निष्कर्ष पर, [अपने] स्वयं के सन्दर्भ में, अपनी रहसयवादी-कामुक परंपरा पर: विविध-काम वासना विधर्म है” I वे तत्पश्चात पाठक से कहते हैं कि उनका “धार्मिक जीवन सर्वथा वस्तुतः सम्मोहक [उनके लिए] था “–उनके “शरीर का भारीपन सामान्य स्तर से भी नीचे गिर चूका था”I यही वो मोड़ था जब रामकृष्ण के भविष्य जीवनी लेखक का ध्यान उन पर पड़ा एवं हिन्दू दमन का और अवसर मिला बंगाली पंडित से भेंट का दक्षिणेश्वर मंदिर मेंI”

कृपाल की व्यक्तिगत मनोविकृति समावेश करती है न्यूनातिन्यून (१) उनके स्वयं स्वीकृत सम-कामुकता का भय, एवं (२) उनकी गहरी मंशा उनके मिश्रीत रोमा कुल के होने की (अतः वे चाहते हैं अपने उस जड़ को विभाजित करना और ये घोषणा करना चाहते हैं कि वे पूर्णतः गोरे वंशावली के हैं) I

ये मनोविकार उनके कार्य में प्रवेश कर चूका है, और यही प्रभावकारी बन चूका है उनके कार्यविधि के पीछे।

समानरूप उपाख्यान उनकी व्यक्तिगत मनोविकृति की, जो प्रतीत होती है, इस विद्द्वानों के सम्प्रदाय को संक्रमित करती हुई, या न्यूनातिन्यून उसका बृहत अंश, आधार बना मेरे इस रूचि का वेंडिस चाइल्ड सिनड्रोम (वेंडी के बच्चे का सहलक्षण) में I जैसा की अधिकतर उदहारण नीचे समझायेंगे, कि ये, अत्यंत ही सामान्य है, पश्चिमी विद्द्वानों के लिए, अपनी व्यक्तिगत जीवनशैली का अपने क्षात्रवृद्धि के द्वारा, स्वांग रचना, किसी “अन्य” के विषय में, ऐसे मार्गों से जो दोनों ही हों, सकारात्मक एवं नकारात्मक I

निष्कर्ष:

इसके अतिरिक्त, अनगनत त्रुटियाँ हैं उनके अनुवाद में, अन्य और भी प्रणाली समान समस्याएं हैं कालीस चाइल्ड (काली के बच्चे) में जो की विद्द्वत्परिषद विवेचन करने से मना कर रहे हैं। उदाहरण के लिए:

१. पश्चिमी विद्द्वान, मनोविज्ञान विभाग में अब फ्रेयूडियन विधि नहीं प्रयोग करते हैं किसी भी, गंभीर विषय के प्रमाण के सन्दर्भ में I अतएव इस प्रकार के कुप्रयोग किसी धार्मिक विद्द्वान द्वारा, जो कि औपचारिक रूप से मनोविज्ञान में प्रशिक्षित नहीं हैं, विशेषकर तब, जब वे उन विषयों पर लागू होते हों जो कि उनसे परिचित पश्चिमी सभ्यता से कोसों दूर हों, ऐसा है, मानो एक नेत्रहीन, दुसरे नेत्रहीन का मार्गदर्शन कर रहा हो I

२. फ्रीयूड ने अपनी विधि को लागू करने की सम्भावना को त्याग दिया था, या तो मरणोपरान्त मृत लोगों को या, मूलनिवासी सूचकों द्वारा किसी तीसरे संघ को जो की प्रत्यक्षतः जुड़े नहीं हैं मनोवैज्ञानिक से. ये एकमात्र उदाहरण ही कालीस चाइल्ड(काली के बच्चे) के कार्य को बनावटी बनता है I

३. फ्रेयूड कदापि किसी पश्चिमी के अतिरिक्त, भिन्न रोगी, से नहीं मिले थे, अतः उन्होंने अपने सिद्धांतों की पुष्टता किसी अन्य सभ्यता पर नहीं स्थापित किया था. वेंडी के क्षात्रवृद्धि देनेवाले विद्यालय ने, फ्रेयूड की कार्य-प्रणाली एवं विकृति विज्ञानं को सर्व्यापी घोषित किया है और मिश्रित किया है चरमसीमा और अस्पष्ट भारतीय समाग्रियों से, उसको विकृत किया और भारतीय परंपरा को, बुना है अविवेचित सिद्धांतों से I

तिसपर भी इन विषयों पर, रिसा के विद्द्वानों को, वेंडी के कार्य के सन्दर्भ में चुनौती देने का दुःसाहस नहीं करना चाहिए, उनके संघ के राजनैतिक सत्ता को ध्यान में रखते हुए I

प्रशंसाजनक है, कि यह विषय कोई पृथक विषय नहीं है, बल्के अपेक्षाकृत, प्रबल प्रकार की क्षात्रवृद्धि है कुछ महत्वपूर्ण विद्द्वानों द्वारा, चलिए हम अध्ययन करते हैं कि कैसे वेंडी महाभारत (I. १०१) की व्याख्या करती हैं एक समलिंगकामुक्त के प्रतीकात्मक रूप में और भारतियों की मैथुनिक विकृति विज्ञानं का: [३३]

एक माण्डव्य नमक ऋषि को अनुचित अपेक्षित रूप से माना गया कि वे सम्मिलित थे एक डकैती में और उनको शंकु से सूली पर चढ़ाया गया था I हम इसे चुभोने (एक समलिंगकामी विरुद्ध) के लिए समलिंगकामी मुखौटा का चिन्ह मानेंगे और लम्बी शंकू( एक पुंसत्त्व हरण) का कटना, वैसे तो हमें ये भी देखना होगा कि भारतीय परंपरा इसका क्या धारवाहिक बनाती है: एक विपरीत वंध्यकरण में, माण्डव्य अनुभव करते हैं कि उन्हें कुछ प्राप्त हुआ है, उन्हें एक शंकु मिला जो, कदाचित छोटा कर दिया गया, वे तब भी उसे अपना विस्तार मानते हैं, एक उपयोगी महा-गुप्तांग, जैसे वो थे. बचपन के उस अपराध ने प्रेरणा दी गुदा-सम्भोग धारावाहिक की, राह दी एक व्यस्क पुरुष के दीर्घ-गुप्तांग के भ्रम की I

जैसा की एडवर्ड सईद विवरण देते हैं, पश्चिमियों के “अन्य” एवं “स्वयं” दोनों बुद्धितः सह – निर्मित हैं, एक के निर्माण के लिए दुसरे के निर्माण का प्रयोग किया जाता है I अतएव ये वेंडी और उसके बच्चों के लिए दुःखदायी है कि उनके प्रिय परिकल्पनाएं भारत के विषय में खंडित हों, क्यूंकि उनकी व्यक्तिगत प्रतिमा पूरबी – विधान पर स्थित है I

एक काल्पनिक एवं कामुक भारतीय सभ्यता, अपनी रोगात्मक परिकल्पनाओं से, है एक दर्पण, इन विद्द्वानों के लिए, जिसमें ये अपनी व्याख्या करते हैं और अभिनय करते हैं अपनी अत्यंत गहरी तृष्णा का I ये मनोविकृति प्रायः विद्द्वान के कार्य को ले जाती है–उन विषयों द्वारा और प्रश्न चुने जाते हैं, आंकड़ों की कल्पना की जाती है और चयन होता है, और तब उसका रूपांतर होता है I अतः पुस्तक कालीस चाइल्ड, इतना महान परिज्ञान देती है, जिसकी परिभाषा यहाँ वेंडिस चाइल्ड सिंड्रोम(वेंडी के बच्चों का परिलक्षण) की गयी है, अपेक्षाकृत के वे विधि-सांगत हों श्री रामकृष्ण के चित्रण से I

लक्ष्य: हिन्दू देवियाँ

देवियाँ सम्भोग एवं हिंसा की प्रतिमा:

साराह काल्डवेल भी पीड़ित हैं वेंडिस चाइल्ड सिंड्रोम [३४] से, और एक अन्य प्रभवशाली नेता हैं रिसा(आर.आई.एस.ए) कीI वे विजेता हैं एक अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार, रोबर्ट स्टॉलर की अपने क्षात्रवृद्धि पर, हिन्दू देवियों के उपलक्ष्य में, और विशिष्ट वर्गों में से हैं जो निर्णय करते हैं कौन से लेख या विषय को सम्मिलित करें विद्द्वत्परिषद की सभा में हिन्दुओं के सन्दर्भ में I आप स्वयं निर्णय लें कि क्या उनके जैसे विद्द्वान, संतुलित आचरण में, हिन्दुओं के प्रतिनिधि हैं, नीचे कुछ अंश दिए गए हैं उनके नूतन शोध लेख से, शीर्षक है, “द ब्लड थरसटी टंग ऐंड द सेल्फ फेड ब्रैस्ट, होमोसेक्षुअल फ़ैलटिओ फैंटेसी इन साऊथ इंडियन रिचुअल ट्रेडेशन” (एक रक्त-पिपासु जिव्ह्या एवं स्वतः संचित स्तन, समलिंगी मुख-मैथुन तृष्णा, दक्षिण भारतीय धार्मिक संस्कारों की) ) ” जिसके लिए उन्हें पुरस्कृत किया गया ऊपर कथित पुरस्कार से:

ये निबंध दर्शाता है कि, केरल में, प्रखर देवी[काली] की प्रतिमा, नहीं प्रकाशित करती है प्रधानतः दृश्य तृष्णाओं का, एक क्लेइन की भावविरेचनाओं का ” लिंगीय माँ ” की या पिता के गुप्तांग का अन्तःक्षेपण; अपेक्षाकृत हम दिखाएंगे कि वे प्रसंग कामवासना का एवं प्राधिकार पुराणविद्या में पुरुष पारलैंगिक तृष्णाएं हैं, जो प्रतिबिंबित करती हैं प्रचंड पूर्वी-मातृरति स्थिरता,माँ के शरीर पर, एवं स्पष्ट टकराव प्रारंभिक स्त्रीलिंग की सरूपता पर” I[३५]

 “अत्यावश्यक भगवती कुल के सभी संस्कार, निर्देश देते हैं आक्रामक एवं घातक कामुक पान का एक स्त्री द्वारा एक नर का, कुख्यात भोग विलास, पुरुष के “लिंग” का रक्त बलिदान कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर में; वेलीकाप्पाटु पुरुष के मस्तक का कटना, एक प्रतीकात्मक विधि है स्वतः पुंसत्व-हरण की……अत्यावश्यक भगवती कुल के सभी संस्कार, निर्देश देते हैं आक्रामक एवं घातक कामुक पान का, एक स्त्री द्वारा एक नर का, कुख्यात भोग विलास, पुरुष के “लिंग” का रक्त बलिदान , कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर में; वेलीकाप्पाटु पुरुष के मस्तक का कटना, एक प्रतीकात्मक विधि है स्वतः पुंसत्व-हरण की…… [काली] स्वयं ही, सर्व प्रथम, एक लिंगी हैं, माँ एक जनेन्द्रिय के साथ, ….वो एक रक्तपिपासु प्रतिमा है पुंसत्व-हरण की एवं राजस्वाल की (अतः पुंसत्व) स्त्री /…… इस प्रकार का विश्लेषण लिंगीय क्षमताओं का, एक देवी का, जो वेश बदल कर पुंसत्व-हरण उत्कंठा का अंततः संचालित है पिता की ओर, और साथ ही पिता की जननेन्द्रिय के लिए समलिंगकामी इच्छायें भी रखती है। फ्रायड का अनुगमन करते हुए, इस प्रकार का विश्लेषण तनाव उत्त्पन करता है पिता-पुत्र में विपरीतता का , जिसमें मातृरति-टकराव, केंद्र बिंदु हो जाता है मानसिक आघात को अभिव्यक्त करने हेतु।”[३६].

जैसा कि एलटर एवं ओ फ्लाहर्टी, प्रचूर मात्रा में दर्शाते हैं, दूध एवं स्तन-पान भी प्रतीकात्मक रूप से परिवर्तित हो जाते हैं एक पुरुष की कल्पनाओं के वीर्य एवं लिंग में…… पुरुष सन्यासी जो प्रतिधारण करता है वीर्य का, वो एक गर्भवती महिला के समान हो जाता है, स्तनों एवं फूली हुई तोंद के साथ; वीर्य की वृद्धि होने लगती है एक दूधिया लेप की भॉँति उसके शीर्ष तक एवं एक असामान्य अलौकिक शक्तियों का उत्पादन होता है ………ना मात्र, दूध का द्रव एवं वीर्य प्रतीकात्मक समानता के हो जाते हैं, बल्के , दुहने की क्रिया या स्तन-पान भी एक प्रतीकात्मक समान वीर्य के अपवाह का जननेंद्रिय से, सम्भोग के समय होता है.”[३७]

ध्यान दीजिये किस प्रकर काल्डवेल, अंग्रेजी का शब्द “कॉक (लिंग)” प्रयोग करती हैं एक जानवर के लिए, जिससे की वे उसे जोड़ सकें लिंग के संस्कारों से I चूँकि केरल निवासी इस संस्कार में अंग्रेजी का शब्द अपने संस्कार से नहीं मिश्रित करते, ये एक उदाहरण हैं कि किस प्रकार विद्द्वान की अपनी मनोविकृति प्रवेश करती है उनके अपने कथित कार्य उद्देश्य में I ये दर्शाता है कि कितना महत्वपूर्ण है मनोविश्लेषण करना इन विद्द्वानों के कार्य के मूल्यांकन हेतु I

ऐसा सूचित किया गया है कि काल्डवेल सक्षम थीं,भारतीय पुरुषों से घनिष्ट “विश्वासी संबंधों” को स्थापित करने में, जिससे कि वे उपयोगी “पापस्वीकार” उनसे निचोड़ सकें, अनुमानतः कुछ मूल्य देकर क्रियान्वित सेवा के रूप में जो कि वर्गीकृत हो “मूलनिवासी सूचक सेवा” के नाम से I किसी एक २१ वर्षीय, का कथन भी उन्होंने दर्शाया है उदहारण के लिए, कि कैसे समलिंगकामुक मुठभेड़ अनियंत्रित रूप से केरल समाज में व्याप्त है I ऐसे कई अन्य “पापस्वीकार” उनके कार्यों में भरे हुए मिलेंगे, एवं अंधाधुन्ध निष्कर्ष निकले गए हैं I

नूतन काल में, काल्डवेल ने एक और पुस्तक प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है, ” ओह टेर्रीफाइंग मदर: सेक्षुअलिटी, वाइलेंस एंड वर्शिप ऑफ़ द मदर काली (ओ भयानक माँ: कामवासना, हिंसा एवं आराधना की, माँ काली) I “[३८] उनके कार्य की झाँकी के लिए, इनकी नूतन पुसतक किस विषय में है, यहाँ पर एक खंड प्रस्तुत है, सिंथिया ह्यूमस की विवेचनात्मक आलोचना द्वारा उनकी पुस्तक का:[३९]

…”काल्डवेल अनगिनत कामुकता, दुर्व्यवहार एवं प्रतिशोध के प्रसंग से भरपूर, केरल क्षेत्र के निवासियों के धर्म एवं सभ्यता, के संलेख प्रस्तुत करती हैं I वे निष्कर्ष निकलती हैं कि, “मुटियेट्टु के अभिनेता जो विशेषकर प्रतिभावान हैं, काली की भूमिका करने में, संभवतः मानसिक आघात पीड़ित व्यक्ति होंगे जिनकी विशिष्ट प्रवृति एवं इतिहास उन्हें विवश करता है इस प्रकार के कृत्य की ओर I “(२५९). मुझे ये अविश्वासनिय लगता है. जैसा कि वे स्वयं टिपण्णी करती हैं, काल्डवेल ने विस्तारपूर्वक अध्ययन या मुटियेट्टु अभिनेताओं के जीवन के इतिहास का सञ्चालन नहीं किया, जो काली की भूमिका कर रहे थे; तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, किसी एक भी मनुष्य का जो किसी व्यक्ति का वर्गीकरण कर सके (२५९) I जो मंशा वे देखती हैं, यातनाएं एवं सर्वाधिक मरोरंजन के लिए, वे आधारित हैं विस्तृत खनन पर और एकत्र करने में बिखरी हुई शृंखला के संवेदनात्मक एवं सम-कामुक पौराणिक प्रसंग पर, एवं लोकवाद कामुक गतिविधियों से मिश्रित. उनके प्रसंग का अविश्वासनीय होना इस सच्चाई से रेखांकित है कि काली की भूमिका मात्र मुट्ठी भर व्यक्तियों तक ही सीमित है, जिनको ५० वर्ष की आयु तक प्रतीक्षा करना होता है, मात्र इस सर्वोत्तम कृत्य की अभिलाषा के लिए, इसके अतिरिक्त उनको प्रमाण देना होता है “विशेष कौशल” का I

तथापि, तत्पश्चात इस पुनरीक्षण में, सिंथिया हयूमस मानती हैं उन संस्कारों की उस मैथुनिक व्याख्या की कुछ छवियों की, यद्द्यपि वे काल्डवेल की तुलना में एक विभिन्न व्यक्तिगत मनोविकृति थोपती हैं:

प्रमाण के आभाव में ये विचारणीय है, कि तीव्रता से परस्पर तुलना अन्य मर्मभेदी मनो-विश्लेषणात्मक अभिकथन का जो आधारित हो सूक्ष्म, अनवरत एवं उचित-विवेचन जो जड़ से जुड़े उल्लेख का अभिलेख पुरुष एवं महिला ने दिया हो अपने अनुभव का मुटियेट्टु में I उदाहरण, काल्डवेल निश्चित ही मुझे मानवती हैं कि “सह-चयन द्वारा इस शक्ति का समलैंगिक अधिकार प्रदर्शन में , पुरुष, स्त्री से ईर्ष्या भाव से प्रजनक शक्ति का पुनः-अधिकार, अपने शरीर में चाहते हैं , जबकि वास्तव में नारी को सामाजिक, कामुक एवं राजनैतिक सत्ता नकारते हैं “(१८९) I मैं शीघ्र ही नहीं नकारता हूँ सम कामोत्तेजक प्रसंग को मुटियेट्टु में I मैंने पाया सम्भावना और प्रमाणों से, कि दर्शकों में अधिकतर केरल के पुरुष हैं जो सम कामोत्तेजक लोकवाद के और संभवतः अप्रकट सम कामोत्तेजक गतिविधियां से उजागर हैं, तथा वृद्ध स्त्री सम्बन्धी, से कामुक अगुवाई का, स्वागत नहीं करते हैं I मुझे शीघ्र ही समझाया जा सकता है, काल्डवेल के आंकड़ों के आधार पर, कि इस प्रकार के दर्शक संभवतः अनुभव कर सकते हैं आकर्षण के प्रतिनिधि, पुरुष समलैंगिक संस्कारों का, विशेषकर पुनः-अभिनीति अपने स्त्री काम-वासना के भय का, अपेक्षाकृत पुरुषों के साथ से I”

(Will Continue…)

Translator: Vandana Mishra.
Original Article:
 RISA Lila – 1: Wendy’s Child Syndrome
URL: https://rajivmalhotra.com/library/articles/risa-lila-1-wendys-child-syndrome/

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