रीसा लीला-१: वेंडी का बाल-परिलक्षण – 5

भारत विखंडन

रीसा लीला-१: वेंडी का बाल-परिलक्षण: Part – 4, Read Here.

लक्ष्य:गणेश एवं शिव:

पूर्वस्त्रातक पाठ्यपुस्तक, पॉल कोर्टराइट जिसके संलेखक हैं, जो की एक महाध्यापक हैं भारतीय धार्मिक के एमोरी महाविद्यालय में, गणेश जी की कथाएं एवं उनके विधिशास्त्र, विभिन्न दृष्टिकोण से दर्शाये गए हैं, निम्नलिखित मनोविश्लेषणों के साथ[४५]:

“एक मनोविश्लेषक के दृष्टिकोण से, हाथी के सर के चयन में भी अभिप्राय है I उसका सूंड विस्थापित लिंग है, शिव के लिंग का एक हास्य चित्र। वो कोई भय का विषय नहीं है क्यूंकि, वह अत्यंत ही बृहत है, शिथिल है एवं अव्यवस्थित स्थान पर है जिससे सम्भोग में कोई उपयोग नहीं हो सकता —–इसलिए गणेश, अपने पिता के गुण ले लेते हैं किन्तु औंधा होकर एक अतिरंजित लचलचा लिंग ——योगी एवं भद्र —- जबकि शिव “कठोर” हैं, कामुक एवं विद्ध्वंसकारी हैं।” [४६]

वो[गणेश] ब्रह्मचारी हैं, क्यूंकि वे अपने पिता से कामुकता में प्रतिदद्वन्दी नहीं बनना चाहते, एक कुख्यात व्यभिचारी, या तो अगम्यगामी रूप से अपनी माता की इच्छा करनेवाले या फिर किसी अन्य स्त्री की कामुक इच्छा रखने वाले।”[४७]

गणेश, एक हिज़ड़ा हैं जो स्त्रीग्रह में स्त्रियों की चौकीदारी करते हैं I भारतीय लोकसाहित्य एवं प्रथा में, हिज़डों ने विश्वासपात्र रक्षकों की भाँति अंतःपुर, रनिवास की रक्षा की है I उनकी प्रतिष्ठा समलैंगिक की है, जिनकी रूचि मुख मैथुन में होती है, और अत्यंत ही हीन एवं कूड़े की भाँति समाज में देखे जाते हैं I “(हिल्तेबेटेल १९८०, पृष्ट। १६२)….. हिजड़ों की भाँति, गणेश के पास शक्ति है श्राप या आशीर्वाद देने की, अर्थात, अड़चन को हटाने की या स्थापित करने की I यदपि, कोई काल्पनिक कथा या लोक कथा नहीं है जिसमें गणेश सुस्पष्ट रूप से मुख मैथुन कर रहे हैं, किन्तु उनकी अतृप्त मिष्ठान की भूख संभवतः भाषांतरित किया जा सकता है एक प्रयास के रूप में उनकी भूख को मिटने का जो प्रतीत होता है अन्य प्रकार से संन्यासी प्रवृति का, एक भूख जो स्पष्ट रूप से कामुकता में उल्ट जाती है I गणेश का टूटा हुआ गजदंत, उनके संरक्षक कर्मचारी, उनका अव्यवस्थित मस्तक, ये सर्वत्र व्याख्या करते हैं उनके पुंसत्व-हरण के चिन्ह की…………ये मिश्रण शिशु-सन्यासी-हिजड़ा का एक प्रतीक है गणेश का —- हर एक स्पष्ट विराग युवा पुरुष की काम-वासना — अवतीर्ण प्रतीत होती है एक प्रधानतः भारतीय पुरुष की उत्कंठा का: अपनी माँ के निकट रहना और इस प्रकार से कि वह दोनों की रक्षा करे , माँ की रक्षा और तब भी पिता के ग्रहणीय हो I इसका अर्थ है कि पुत्र को निश्चित ही माँ की स्मृति प्रवेश बनाये रखना चाहिए किन्तु उसको कामुकता से धारणा करने के प्रयत्न नहीं करना चाहिए I”[४८]

कई भारतियों ने क्रोधपूर्वक इसके विरोध में इंटरनेट(भूजाल) सूची पर लिखा। एक व्यक्ति, जिसने कहा कि वह जीसस का सम्मान करता है, उसने एक “काल्पनिक विरूपण” लिखा, ईसाई चिन्हों एवं कथाओं का, महाध्यापक कोर्टराइट की हेर्मेनेयुटिक्स की शैली का प्रयोग करके, विद्द्वानों के लिए समान अनुरूप प्रतिपुष्टि की भाँति।

जीसस एक अश्लील एवं अभद्र व्यक्ति थे I उन्होंने कुछ जादुई करामात आगंतुक फ़ारसी व्यापारियों से सीखा था I रोम निवासी प्रायः उन्हें आमंत्रित करते थे अपनी सभाओं में कला प्रदर्शन के लिए, और उसके प्रतिदान में, वे उनको अंगूरी मदिरा देते थे I तो वह नियमतः उन्मत्त रहते थे, और “कुख्यात व्यभिचारी” होने का प्रयत्न करते रहते थे, अतएव अपने पूरे जीवनकाल में एक आवारा व्यक्ति रहे I चूँकि जीसस की माँ एक वैश्या थी, वो उनके पिता की वास्तविक सच्चाई की घोषणा नहीं करना चाहती थीं, और इसी कारण अशिक्षित बंजारों के लिए झूठी कथाएं बनाती थीं I अतः मैरी ने घोषण किया था कि जीसस का जन्म बिना प्राकृतिक सम्भोग के हुआ है I इस कारण जीसस पूरे जीवन अपनी माँ के कुमारित्व होने के भ्रम से घिरे हुए थे और अपने पिता एवं अन्य ग्राहकों की भष्ट गतिविधियों को छिपाये रखते थे जो उनकी माँ से सम्भोग करने के लिए आते थे I रोम के सेनाध्यक्ष ने हास्य परस्तुत किया, आड़ा चिन्ह(क्रॉस) के प्रयोग से जीसस को सूली पर चढ़ाके। आड़ा चिन्ह(क्रॉस) को, अपनी माँ द्वारा उपयोग किये गए लिंग का चिन्ह बताया जो जीसस के गर्भधान के समय निश्चित ही उपयोग किया गया होगा I अतएव, उनके भक्त वर्तमान में उस आड़ा चिन्ह(क्रॉस) को लिए घुमते हैं, उसे एक लिंग प्रतिमा की भाँति मानते हैं जो निष्कलंक गर्भधान में प्रयोग हुआ था I”

साहित्यकार तब पूँछता है: ” उपरोक्त लिखे गए लेख किस प्रकार से समझे जायेंगे यदि वे किसी ऐसे विद्द्वत ज्ञानी द्वारा जो कि ईसाई धर्म का ना हो और एक ऐसे देश में जहाँ ईसाई अलप संख्या में हों वहां का हो —-उसी प्रकार जैसे हिन्दू अलप संख्या में हैं यू.एस में?” यद्दपि ईसाईयों की कई आलोचनाएं एवं नकारात्मक हास्य-चित्र व्याप्त हैं, परिचयात्मक अध्ययन का केंद्र बिंदु ये होता है कि, और मुख्यरूप से यदि दर्शक ईसाई धर्म के ना हों तो, इस प्रकार के हास्य चित्रों का प्रयोग नहीं होता है I

वेंडी ने कोर्टराइट के पुस्तक की भूमिका लिखी है, यद्दपि उन्होंने अपनी विद्यावाचस्पति की उपाधि उनसे नहीं ली है I कोर्टराइट असहमत हैं कृपाल एवं काल्डवेल से, क्यूंकि उनका मनोविश्लेषण का प्रयोग सांकेतिक है, निश्चायक नहीं I वे कहते हैं कि वे मनो-विश्लेषणात्मक सामग्री को अपने परियोजना के केंद्र बिंदु में नहीं रखते हैं, बल्कि अनुवाद का मात्र एक कोण I

उनके वेंडी के प्रति आकर्षण के सन्दर्भ में वे लिखते हैं, [४९]: “आप “शिशु” की परिभाषा मात्र लाक्षणिक रूप से प्रयोग करती हैं, किन्तु मैं भाग्यशाली समझता हूँ उनके [अर्थात वेंडी] अपनापन समूह का अंश बनकर।”

कोर्टराइट भी वेंडी को भारतीय परंपरा के लिए उचित समझते हैं: “वेंडी प्रभावशाली रह चुकी हैं भारतीय सभ्यता की दृश्यता को ऊपर उठाने में एक प्रदर्शन के द्वारा उसके पौराणिक गाथाओं की सजीवता को एवं उसे अरोचक से स्थानान्तरित करके एक धर्मात्मा की ओर I उसको नकारात्मक छवि से बाहर निकालने में जो आयी अत्यंत पूरबी एवं ईसाई धर्म-प्रचारक के क्षात्रवृद्धि से जिस से आप उचित रूप से विवाद कर सकते हैं” I

अपनी प्रतिक्रिया में, मैं अवश्य कहूँगा कि, कोई भी विद्द्वान जिसका कार्य आक्रामक माना गया है हिन्दुओं के द्वारा, वे भारत या हिन्दुइस्म से द्वेष रखता/रखती हों I अँगरेज़ भी भारत से प्रेम करते थे, और इसी प्रकार ईसाई धर्म-परिवर्तन करवानेवाले जो प्रयत्न करते हैं “बचाने का” हिन्दुओं को, और इसी प्रकार बहुराष्ट्रीय भी जो स्थानीय किसानों एवं उत्पादकों का नाश कर रहे हैं, और इसी प्रकार मार्क्सवादी जो प्रयत्न कर रहे हैं स्वदेशी सभ्यता को जड़ से उखाड़ने का जिस से की निर्धनों का तथा कथित “विकास” हो सके I मेरी चिंता निश्चित रूप से ये है कि, “वेंडी ने भारतीय सभ्यता की दृश्यता को ऊपर उठाया” और “उसके पौराणिक गाथाओं को सजीव बनाया”, किन्तु अनैतिक रूप से और अनुचित कारणों से I उन्होंने उसको रूढ़िवादी विचित्र वस्तु एवं कामोत्तेजक में परिवर्तित कर दिया, उसकी उपयुक्तता एवं धार्मिक सत्य दृण कथन को महत्वहीन करके एक पशु-भोजन की भाँति मनोविश्लेषण करने के लिए बना दिया, और वर्तमान में उसके प्रसंग को विश्व से छिपा दिया I

कोरटराइट प्रशंसा भी करते हैं कि “वेंडी ने अत्यंत परिश्रम किया है शिकागो में भारतीय स्रातक विद्यार्थियों के चयन के लिए (जैसा की हमने यहाँ एमोरी में किया है) क्यूंकि हम चिन्ताशील हैं कि “अंतरंगी” एवं “आगंतुक” के बीच में असंतुलन है—-चाहे जो भी उसका अर्थ हो—-क्षेत्र में”I परन्तु मैंने व्यक्तिगत रूप से देखा है दोनों प्रकार के भारतीय विद्यार्थिओं को शिकागो में हिन्दुइस्म अध्ययन करते हुए: एक जो पुनः-योजनाबद्ध नविन उपनिवेशक सिपाही के रूप में परिवर्तित होते हैं और दूसरे जो कि निष्ठावान रहते हैं अपने धरोहर के लिए नैतिक दबाव के प्रतिरोध के बाद भी I [५०]

अन्य एक विद्द्वान, डॉ. पैट्रिक ब्रेस्नन, शिव के विषय में इस आचरण से लिखते हैं कि शिव का अब पश्चिम विद्द्वत्परिषद के घेरों में वही सामान्य चित्रण माना जाने लगा है [५१]:

शिव-भक्ति के संसार में प्रवेश करना भारत के संसार में प्रवेश करने के समान है जिसमें उसकी सर्वाधिक विस्मय से एवं चकित करने योग्य है; न्यूनातिन्यून जो भारतीय नहीं हैं उनके लिए I शिव भक्ति में, भारतीय रचनात्मक कल्पनाएं उत्प्पन होती हैं कदापि ना समाप्त होनेवाले बहुतायत भगवानों से, राक्षसों से, अदृश्य संस्कारों से एवं आश्चर्यजनक कामुक चिन्ह समूह से……लिंग/योनि उपासना ही मात्र पूर्ण नहीं है।….. नवयुतियाँ, जिसको देवदासी कहा जाता है, सामान्य रूप से शिव मंदिर से जुडी हुई थीं, और संस्कारों में सम्मिलित होती थीं, कभी मात्र एक प्रतीकात्मक रीति के अनुसार, और कभी नहीं I निम्नकृत रूप में देवदासी मंदिरों में मात्र एक वैश्या से अधिक कुछ नहीं थीं Iये चरमसीमा अधिकांश पायी जाती थी तंत्र विद्या के व्यवसायियों में, वो रूढ़िवादी हिन्दुइस्म का गूढ़ प्रतिवाद था, जो कि, उत्तर-पूरबी भारत में विकसित हुआ I कुछ तंत्र विद्या के मंदिर कुख्यात बन गए हर प्रकार के पराकोटि व्यवसाय के, जिनमें विधि सम्बन्धी बलात्कार एवं विधि सम्बन्धी हत्या होती थी I कोलकत्ता में, दुर्गा के मंदिर में (शिव-शक्ति का एक रूप) वार्षिक उत्सव होता था जिसमें कई सुवारें, बकरियाँ, भेड़ें, मुर्गे और यहाँ तक कि जल की भैसें भी बलि चढ़ाई जाती थीं और धार्मिक संस्कारों के साथ देवी की मूर्ति के सामने जलाई जाती थीं I”

ये सत्य हो सकता है कि कई ऐसी घटनाएं हुई हों किसी अवस्था में और सन्दर्भ में. किन्तु मेरा केंद्र बिंदु भिन्न है I एक लाक्षणिक अमेरिकी विद्द्यार्थी अपना/अपनी पूर्ववर्ती यूरो- यूरो-केंद्रिक पक्षपात का प्रयोग करता है अपने व्याख्या के सन्दर्भ में I शिव का ये चित्रण छन कर आता है यूरो-केंद्रिक दृष्टि से जागृत होकर या अजागृत होकर, विद्द्यार्थी के आजीवन में विश्वदृष्टि बनकर भारत सभ्यता के विषय में I ये पूर्वाग्रह प्रायः लदे होते हैं अत्यंत अज्ञानता से भारतीय सभ्यता को लेकर और अब्राहमिक धर्मों को ना माननेवालों के विषय में I कोई अनुचित बात नहीं होगी यदि इस प्रकार के चित्रण प्रासंगिक उचित रूप से किये जाएं, प्रामाणिक सूत्रों से प्राप्त हों, और अतिआवश्यक ना सिद्ध किये जाएं प्रारंभिक शिक्षा की भाँति शिव के विषय में —– किन्तु लाक्षणिक अमेरिकी पाठ्यक्रम में इतना समय होता ही कहाँ है कि वे पहले नीव की स्थापना करें I

इसके परिणाम स्वरुप, शैविसम के आध्यात्मिक विचार प्रायः लुप्त हो जाते हैं, क्यूंकि कामुक-मोहक प्रतिमा अहम् स्थान ले लेती है I उत्तम स्थिति में, परंपरा ऐसी लगती है मानो किसी गंभीर एवं विवेकपूर्ण व्यक्ति को देने के लिए उसमें कुछ भी सकारात्मक नहीं है I निकृष्टतम स्थिति में, शिव को कलंकित किया गया है सभी प्रकार के नीच कार्यों के उत्तरदायी बनाकर, जैसे बलात्कार, कामुक लापरवाही, हिंसा इत्यादि और भी कई— दूसरे शब्दों में, उनका चित्रण एक अपराधी कुल के देवता समान किया है, किन्तु बिना कई शब्दों में कहे, राजनैतिक रूप से उचित, रहने के उद्देश्य से I

अरबों डॉलर खर्च किये जा चुके हैं पश्चिमी क्षात्रवृद्धि पर क्षेत्रीय आँकड़ों के संग्रह के लिए भारतीय सभ्यता के विषय में, जिस से कि “वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध किया जा सके” कई सिद्धांतों को I क्यों ये विद्द्वान असफल रहे ऐसे आँकड़ों के संग्रह में जिसमें ये देखा जाये कि क्यों अमेरिकी इतना अज्ञानी हैं भारतीय सभयता के सन्दर्भ में, के कैसे हिन्दू -विरोधी पूर्व-धारणा, हानि पहुँचाती है अमरीकी समाज को, और विशेषकर किस प्रकार अमेरिकी पूर्वधारणा आपस में सहसम्बन्धी हैं जो परिक्षण करें कि क्या इन विद्द्वानों ने लिखा है और पढ़ाया है?

यहाँ पर एक और उदाहरण है कि किस प्रकार विद्द्वत्परिषद क्षात्रवृद्धि काट-छाँट-चिपकना जैसी पद्धिति गिरा देती है हिन्दू विचारों को एक एकांगी अर्थों की गठरी में, विरूपण उत्त्पन करने के लिए: [५२]

” ‘हिन्दू सहिष्णुताऔर भारतीय संयुक्तताके भ्रम, का प्रश्न पहले भी उत्त्पन हुआ है, किन्तु उसका निर्वाह ना हो सका, बढ़ती हुई कठिनाईओं के कारण समकालीन मतभेदों के प्रकाश में I जो भारतीय पौराणिक कथाओं से अंतरंग हैं उनको ज्ञांत है कि सर्वनाश-सृजन-संरक्षण एक पुनरावर्ती प्रकरण है I यदि भगवान् ब्रह्मा माने जाते हैं एक सर्जन करता के रूप में, भगवान् विष्णु माने जाते हैं एक संरक्षण के रूप में, तो ये भी सत्य है कि भगवान् शिव माने जाते हैं एवं देवी काली माननी जाती हैं एक विनाश करता के रूप में I”

ये सामन्य है किन्तु भयानक एवं भारतीय शास्त्रीय-ग्रंथों पर अवास्तविक आरोप, उनका आधुनिक समाज में बहुतायत-विश्लेषण होता हैं I शिव के द्वारा विलयन के कई सन्दर्भ-भावुक अर्थ व्याप्त हैं, जिसमें सम्मिलित है उत्कृष्टता जो मानव कष्टों से उत्त्पन होते हैं, माया के विलयन के लिए—-जिसके कारण वे योग से सम्बंधित हैंI ये लघुकृत प्रतिचित्रण “विलयन = विध्वंस” अनुचित है I उसी प्रकार, काली का अर्थ बहुआयामी है और निर्भर करता है सन्दर्भ एवं भक्त के स्तर पर I [५३]

 विद्वत्परिषद की रूपरेखा:

स्टैनले कर्ट्ज़, एक नृविज्ञानी जो भारत के सन्दर्भ में मनोविश्लेषण का प्रयोग करते हुए ये कहते हैं कि भारतीय माँ को “पश्चिमी पद्धति की भाँति प्यार, भावशील सहकारिता” अपने शिशुओं के प्रति नहीं आता है: [५४]

विशेष सम्बन्ध जो हिन्दू माँ में और उसके पुत्र के बीच में प्रतीत होता है, एक विभिन्न विशिष्ट हिन्दू ढांचे की भाँति है अपेक्षाकृत मात्र एक तीव्रता की सीमा तक घनिष्ट सम्बन्ध के ढंग अनुसार जो पश्चिम में पाया जाता है……..इसी कारण पालन–पोषण , कोई अवसर नहीं है जिसके माध्यम से माँ और शिशु गारा लगाएं अपने भावुक मिलाप पर I शिशु को नियमित सिंचित किया जाता है और उसके पश्चात् भी माँ कदाचित विलम्बित रहती है शिशु के संतुष्टि को प्रतिबिम्बित करने के लिए I अतएव, इसमें कोई संदेह नहीं है कि शिशु अत्यंत घनिष्ट शक्तिशाली भावुक लगाव उत्त्पन कर लेता है माँ से, जिसका कारण शारिरीक संतोष है, जो वो उसको प्रदान करती है, जबकि माँ कोई प्रतिक्रिया नहीं करती है प्रेम एवं भावुक मिलाप का पश्चिमी ढंग सेI”

ये पूर्णतः अवास्तविक है, अर्थात, कि हिन्दू माँ शिशु के पालन-पोषण का अवसर, भावनात्मक मिलाप पर गारा लगाने के समान नहीं देखती, जिस प्रकार गोरी स्त्री कदाचित देखती है I इस प्रकार की जातीय, संस्कृतीय एवं सभ्यता के रूपरेखा एवं निंदा ने पलट दिया है पूर्वकाल में होनेवाले मुखर जातिवाद को I वर्त्तमान में, इस जातिवाद को न्यायोचित किया जा रहा है “वस्तुनिष्ट” अन्वेषण परिणाम के नाम से, और ये विशेषकर भयानक है क्यूंकि कई भारतीय विद्द्वान इस आंदोलन के लिए बिक गए हैं I

इसके अतिरिक्त एक अन्य पुस्तक, “ऑल द मदरस आर वन/ (सभी माएँ एक हैं”)”, [५५] स्टैनले कर्टज़ ने निर्मित किया है एक नूतन ढांचा, हिन्दुइस्म की मनोवृति पर, जो की उनके अध्ययन पर आधारित है भारतीय समाज एवं पारिवारिक ढांचे पर, और उनका साक्षात्कार संतोषी माँ के भक्तों से I वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि दुर्गा, प्रतीकात्मक हैं एक बधिया करनेवाली देवी माँ की, उन्होंने स्थापित किया है दुर्गा जटिलता का अर्थ समझाने के लिए ” मतभेदों के हिन्दू रूपों की विशेषता, विरुद्ध, अचेत अगम्यगामी प्रयास,”[५६] जिसमें “बधिया करना, एक अत्यंत ही परिपक्व स्तर पर, प्रतीक है, प्रतिनिधित्व है परिवर्तनकारी स्वयं-संकल्पित बलिदान का, और जो संकेतन है शिशु-सम्बन्धी अनुरागों के परित्याग का। ….. “[५७]

हिन्दुओं को उनके वैयक्तिकता के बोध से वंचित करना, वे लिखते हैं: “उनकी धारणा ईश्वरीय विषय में ना ही समय, स्थान, वस्तु की सीमा है और ना ही सर्वसमिका की I “[५८] अतः वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि: “व्यक्तिवाद हमारे आत्मिक ढांचे में स्थापि है परन्तु हिन्दुओं में नहीं है I“[५९]

इसके अतिरिक्त पता लगाना कई पारिभाषिक दोष उनके कार्य पद्धति में, हुम्स उनके कार्य की कठोरता से आलोचना करते हुए कहते हैं कि

वो पद्धति जिसका अंतिम छोर जातिवाद है: वाद-विवाद से प्रतिरोध के पश्चात् भी, अतिसंवेदनशीलता के लिए किसी सभ्यता की मनोवृति में विभिन्नता व्याप्त होने से, “वे लोग” तुलना में “उधर” वास्तव में सभी एक समान हैं “किन्तु हम जैसे नहीं”….. कर्टज़ की मनोवृति हिन्दू स्त्रियों को वर्जित करती है……..वे, अंततः, “माएँ” हैं, जिनकी मनोवृति को विभाजित किया जा सकता है कुछ ही शब्दों एवं पत्रियों में I”

महाभारत के प्रमुख १५- ग्रंथों के छिद्रान्वेषी प्रकाशन के नए संपादक जो प्रकाशित कर रहे हैं द यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो छापाखाना में, कहते हैं महाभारत सम्मलेन, मोंट्रियल में, कि “MB (एम.बी — महाभारत बुक)” “गॉड्स जीनोसाइड(ईश्वरीय जातिसंहार)” है, जिसका मुख्य प्रसंग है “कृष्ण जो आदेश देते हैं मानवजाति के विनाश, का” और यही अतिमहत्वपूर्ण प्रसंग होना चाहिए इसके पूर्ण रूपांतर का I तो हमारे लिए क्या है इधर? इस्लामी विद्द्वान व्यस्त हैं इस्लाम की छवी को स्वच्छ बनाने में. दूसरी ओर, हिन्दु विद्द्वान इसके एकदम विपरीत कार्य करने में लगे हुए हैं—-पिशाचवाद करने में लगे हुए हैं, और स्वेच्छा से या बिना स्वेच्छा से प्रचार करते हैं, हिन्दू-लज्जा नवयुकों में I

इतिहास दर्शाता है कि जातिसंहार के पूर्व पीड़ित की पहले निंदा होती है—-उनको अज्ञानी, अधर्मी, उनमें न्यायसंगत धर्म का आभाव होना, दूसरों के प्रति करुणाहीन होना, और अपने बच्चों से प्रेम करना, इत्यादि, अर्थात समान मानव अधिकार ना देना जैसा की किसी गोरे व्यक्ति को दिया जाता है I ध्यान दीजिये कि किस प्रकार ये तथा कथित माँओं की प्रथा को वास्तव में अंकितक किया गया है जैसे “एक विशिष्ट हिन्दू साँचा” I इसी कारण “दहेज़ हत्या” को अत्यधिक आक्रामकता से प्रभावशाली सभ्यता की कार्यसूची पे रखा है, विशेषकर एक “हिन्दू समस्या” का अभियोग चलाकर, यद्दपि वीना ओल्डेनबर्ग और अन्य विद्द्वान स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं कि ये “हिन्दू समस्या” नहीं है I [६०]

समय आ गया है प्रश्न करने का: किस प्रकार वर्तमान में दी गयी क्षात्रवृद्धि की तुलना यूरो-केन्द्रिक क्षात्रवृद्धि से की जाती है जब पूर्वकाल में अमरीकी मूलनिवासी, अफ्रीका के दास, यहूदी, रोमा और कई अन्य जो बाद में पीड़ित बने जनसंहार के कई कारणों से? क्या कुछ विशेष “निष्पक्ष” विद्द्वान, बिना किसी अभिप्राय के चालित हैं यूरोकेन्द्रिक सुगंध द्वारा, और मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं भविष्य में जातिसंहार का इन असंख्य अरबों हिन्दुओं का, जिसका कारण आर्थिक और/या पर्यावरणीय दबाव से है जो अत्यधिक जनसँख्या इस शताब्दी में होगी?

यहाँ तक कि उन स्थितियों में भी जहाँ पर विद्द्वान संभवतः यथार्थ सामाजिक समस्या की आलोचना कर रहे होंगे “हिन्दू समाज में”, डेव फ्रीडहोल्म प्रकाशित करते हैं कि किस प्रकार हिन्दुओं का व्यवहार इसाईओं के समान नहीं हो रहा है:

जब विद्द्वान विश्व के धर्मों का परिक्षण करते हैं तो प्रायः वे प्रयत्न करते हैं अंतर् ढूंढने का अपने “सर्वव्यापी” आध्यात्मविद्या संबंधी/मनोवैज्ञानिक नीव एवं उस विशेष इतिहासिक और सभयता से बंधे हुए समाजिक ढांचे में जो उस धर्म के अनुनायी हों I उदाहरण के लिए यदि हम ईसाई धर्म को लें, बिब्लिकल विद्द्वान, परिष्कृत हेर्मेनेयुटिक्स(बाइबल के अध्ययन की विशेष विधि) का प्रयोग करते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं एक “सर्वव्यापी” पॉलाइन (पॉल के धर्मशास्त्र के अनुसार) सामाजिक सन्दर्भ में पॉल के पत्रों द्वारा जो परिकल्पित करती थी दासत्व को, नारी-दमन विचारों का, इत्यादि I पॉलाइन के कथन ,जो प्रतीत होते हैं इस प्रकार के, सामाजिक व्यवस्था का, उनका पुनः व्याख्यान होता है वाक्यों के प्रकाशन द्वारा, अनुमान लगाते हैं उसको और भी सार्वभौम मूल्य बनाने के लिए I”

Featured Image Credit -> https://www.siliconindia.com/shownews/Books_Banned_in_India-nid-92517-cid-29.html

Part – 6, Read Here.

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