रीसा लीला-१: वेंडी का बाल-परिलक्षण – 6

भारत विखंडन

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कितनी विश्वासनीय है वेंडी डॉनिगर की संस्कृत?

“उचित” अनुवाद के कई मार्ग हैं I मेरा मानदंड है कि वो स्वीकृत होना चाहिए मुख्यधारा समाज की परंपरा से जिस पर प्रश्न किया जा रहा है—और पूर्वपक्ष सिद्धांत के अनुसार I यदि प्रसंगों की मंशा और व्यवसायी के निष्कर्ष के विरुद्ध किया जा रहा है, तब विद्द्वान के ऊपर प्रमाण प्रस्तुत करने का भार अत्यंत ही कठोर होना चाहिए I मैं ये भी मानता हूँ कि “उचित” अनुवाद अभिन्न है सभ्यता एवं सन्दर्भ के संगती से I मैं वेंडी डॉनिगर के पूरे शैक्षिक कार्य की आलोचना नहीं कर रहा हूँ, मात्र उन विषयों का जो कि विशेषकर यहाँ पर वर्णित हैं I तथापि, मुझे एक भी विस्तृत छिद्रान्वेषी निरूपण करने वाला/वाली नहीं मिला वेंडी डॉनिगर के कार्य का, ना ही कोई योजना विकसित करने वाले इस प्रकार की आलोचना का, उनके कार्य को इतना बृहत महत्त्व देना के पश्चात् भी, और सत्य ये है क्या दाँव पर लगा हुआ है औचित्य बनकर एक अन्तरंगी का दृष्टिकोण विश्व के सर्वोच पौराणिक परंपरा के विषय में. मैं ये भी मानता हूँ कि “उचित” अनुवाद अभिन्न है सभ्यता एवं सन्दर्भ के संगती से. मैं वेंडी डॉनिगर के पूरे शैक्षिक कार्य की आलोचना नहीं कर रहा हूँ, मात्र उन विषयों का जो कि विशेषकर यहाँ पर वर्णित हैं. तथापि, मुझे एक भी विस्तृत छिद्रान्वेषी निरूपण करने वाला/वाली नहीं मिला वेंडी डॉनिगर के कार्य का, ना ही कोई योजना विकसित करने वाले इस प्रकार की आलोचना का, उनके कार्य को इतना बृहत महत्त्व देने के पश्चात् भी, और सत्य ये है की क्या दाँव पर लगा हुआ है, औचित्य बनकर, एक अन्तरंगी का दृष्टिकोण विश्व के सर्वोच पौराणिक परंपरा के विषय में I हेर्मेनोटिक्स(बाइबल की विशेष अध्यन पद्धति)के सामर्थ्य का भी वाद विवाद होना चाहिए—-विशेषकर, क्यूंकि सत्ता का नियंत्रण शैक्षिक विद्द्या को लेकर एक स्थान पर एकत्र है I अंततः, कोई भी उनके कार्य “X (एक्स)” की आलोचना का समर्थन नहीं कर सकता किसी अन्य कार्य “Y (वाई)” की महानता बता कर, ना ही आलोचकों के मनोविश्लेषण से, और ना ही आलोचकों को अयोग्य बता कर I

हार्वर्ड के महाद्यापक मिशेल विट्ज़ेल को एक बार सार्वजनिक चुनौती दी गयी थी अपने दृण कथन को प्रमाणित करने के लिए कि वेंडी डॉनिगर का ज्ञान वैदिक संस्कृत में अत्यंत ही दूषित है I विट्ज़ेल के दृण कथन निर्भीक प्रतीत हुए जैसे कि कोई कहे पोप एक अच्छे कैथोलिक नहीं हों I इस कारण, विट्ज़ेल ने वेब(भूजाल) पर कई महत्वपूर्ण उदाहरण संस्कृत के अशुद्ध अनुवाद वेंडी डॉनिगर द्वारा अतिशीघ्र ही प्रकाशित किये I[६२]

ऐसा कहा जाता है कि, विट्ज़ेल को व्यक्तिगत रूप से प्रताड़ित किया गया था इतनी घोर आलोचना “कुईन ऑफ़ हिंदुस्तान (हिंदुस्तान की रानी)” के लिए I विट्ज़ेल को अन्यायपूर्ण दानव घोषित किया और उनका बहिष्कार किया——ये अवश्य ही उनका अधिकार था, आलोचना करने का उस प्रकार की घोर भूल का, विशेषकर जब वेंडी के जोड़ और प्रभाव का ज्ञान था I यदि, देव, देवियाँ और ऋषि उनके द्वारा पुनः निर्मित किये जा सकते हैं, तो क्यों उनके कार्य को आलोचनाओं से वर्जित करें? निम्नलिखित ३ उदाहरण ये संदेह उठाते हैं कि क्या उनको “रानी” बने रहने देना चाहिए I

डॉनिगर द्वारा रिग वेद के अशुद्ध अनुवाद पर विट्ज़ेल के कथन:

उपयुक्त सम्मान के साथ डॉनिगर के क्षात्रवृद्धि एवं परिज्ञान, को ध्यान में रखते हुए, ये उजागर होना चाहिए, क्यूंकि ये सर्वत्र ज्ञांत नहीं है, यहाँ तक कि इंडोलॉजिस्ट में भी, कि महाध्यापिका के संस्कृत ज्ञान की गहरायी पर प्रश्न उठाया गया है महाध्यापक मिशैल विट्ज़ेल द्वारा जो हार्वर्ड महाविद्यालय से हैं I विट्ज़ेल का उद्धरण, डॉनिगर के “प्रथम २ पद के भी भाषांतर [रिग वेद के ] अनुवाद से अधिक, मात्र एक विवरण हैं, “और उनकी शैली “अपेक्षकृत एक स्रोत है खंडित जॉर्ज-बुश-समान अर्धोक्ति।” वे उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं अपने दृष्टिकोण से संबंधित डॉनिगर के अनुवाद का एक छंद, “वो आंसू बहायेगा, रूदन होकर, जब वो सीख लेगा, “और समीक्षा करना कि “कोई रूदन नहीं है यहाँ, “और ये कि वे ऐसे ही बनावटी मात्र एक विशेष अपेक्षित प्रभाव प्रदान करना चाहती थीं I

किन्तु ये मात्र अनुवाद ही नहीं, जिसमें डॉनिगर असफल हैं I उनका निष्कर्ष भी दोषपूर्ण हैI विट्ज़ेल आरोप लगाते हैं कि डॉनिगर “अस्वीकारती हैं संभावनाएं पुरुष/स्त्री में मित्रता की —- संभवतः प्रवाहित सभ्यता का पक्षपात —- किन्तु रिग वेद का कदापि नहीं.” वे ये भी प्रकाशित करते हैं कि वे अपने अनुवाद में, “सख्य को पूर्णतः मिथ्या समझा है, जैसा की ये अति सामान्य इंडोलॉजिस्टस के साथ जो कुशल नहीं है वैदिक अध्ययन में; ये ज्ञात होता है महाकाव्य/पारम्परिक सखी “मित्र” के आधार पर, और इस कारण सम्पूर्ण स्पष्टता से कहना, विस्मृत करने के समान है। एक वैदिक सखी मात्र एक मित्र ही नहीं है ….. “

अचम्भित, विट्ज़ेल इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं: “भजन में (१८ छंद) एकमात्र मैं ने गिने हैं ४३ उदाहरण जो की दोषपूर्ण है या जहाँ अन्य कोई भी बड़ी सरलता से असहमत हो सकता है I”

डॉनिगर द्वारा जैमिनीय ब्रह्माण का अशुद्ध अनुवाद पर विट्ज़ेल की टिप्पणियाँ:

वेंडी द्वारा “जैमिनीय ब्रह्माण” के अनुवाद के सन्दर्भ में महाद्यापक विट्ज़ेल कहते हैं: ” निस्सन्देह, ये अनुवाद पुनः “पुनरनुवाद” है किसी अन्य के “कार्य” का जिसमें उन्होंने “जोड़े हैं कदाचित ही प्रचलित (?) फ्रायड की कलई ….”

विट्ज़ेल कहते हैं: “समस्या पुनः ये है कि [डॉनिगर] ने माध्यमिक साहित्य को सूक्ष्मता से अनुसरण नहीं किया, ना ही उन विद्यार्थियों से सहायता ली जिनका वे वर्णन करती हैं … यदि माध्यमिक साहित्य का उपयोग किया होता—–तो अनुवाद संभवतः इस से उचित होता।”

विट्ज़ेल उजागर करते हैं “उनकी गली भाषा, बोलचाल की शैली के पक्षपात के विषय में” जैसे “गोबर के गोले, मल के गोले” और ” इंद्र के वृषणों के गोले “, जो विट्ज़ेल के अनुसार एक “वैदिक अपभाषा” है और जो कि किसी भी संस्कृत लेख में नहीं पायी जाती है I इसके अतिरिकत, वे अरोप लगाते हैं कि, “कई रिक्त स्थान हैं अनुवाद में जहाँ शब्द या पूर्ण वाक्य ही विस्मृत कर दिया गया है….”

इस से भी अत्यंत गंभीर विषय है चिंता का विट्ज़ेल के अनुसार, वेंडी की त्रुटियों में जिसको वे कहते हैं “गंभीर व्याकरण व्यवसाय,” जिसके लिए वे उन्हें झिड़कते हुए कहते हैं “प्रार्थमिक-वर्ष के संस्कृत का अशुद्धबोध”I “कठिन वाक्यों,” विट्ज़ेल लिखते हैं, “अज्ञनतापूर्वक त्याग दिए गए हैं बिना हमें सूचित किये ही I”

समापन में विट्ज़ेल निष्कर्ष निकाल कर पूँछते हैं एक सरल प्रश्न: यदि वोमात्र एक ही कथा में इतना अधिक अशुद्धि है (और ये मात्र एक छोटा सा ही भाग है!)—तो उनकी पूरी पुस्तक एवं अन्य अनुवादों की क्या स्थिति होगी? ……. संभवतः इससे उचित तो पुराने अनुवाद का प्रयोग होता और उनकी फ्रेयडियन विवेचन को उसमें जोड़ा गया होता…. संक्षिप्त में, ये “अनुवाद” मात्र “अविश्वासनीय” ही है I

डॉनिगर की मनु-नियमावली के अशुद्ध अनुवाद पर विट्ज़ेल की टिप्पणियाँ :

डॉनिगर के इस अनुवाद के पुनरीक्षण के पश्चात्, विट्ज़ेल लिखते हैं: “मैं मात्र एक ही उदाहरण दूँगा जो दर्शायेगा कि दोनों अनुचित हैं(अपेक्षाकृत, अभाव है) भाषाविज्ञान सम्बन्धी प्रणाली एवं सामान्य विवेक के आभाव का I “(अंततः टिप्पणी देखिये अपेक्षाकृत लाक्षणिक उदाहरण के लिए। [६३])

इसके अतिरिक्त, विट्ज़ेल आलोचना करते हैं डॉनिगर के, मात्र सूक्ष्म भाग, के चयन के लिए, उपलब्ध विभिन्नता में से I उन्होंने वास्तव में गंभीर रूप से चयन करने में परिश्रम नहीं किया कि किस विभिन्नता का प्रयोग किधर और क्यों हो। अतः, विट्ज़ेल निष्कर्ष निकालते हैं, कि उनकी क्षात्रवृद्धि हारवर्ड के आवश्यकता स्तर की नहीं है: “इन सब की दृष्टि से, मैं अवश्य ही अचंभित हूँ कि क्या डॉनिगर के अनुवाद हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीस में स्वीकृति पाते या अपेक्षाकृत पेंगुइन में I…..”

विट्ज़ेल के निष्कर्ष:

ये लघु किन्तु विध्वंसकारी पुनरीक्षण रानी के क्षात्रवृद्धि का मात्र एक बिंदु है पूरे पर्वत का जो विट्ज़ेल कर सकते थे, यदि उनको रोका नहीं गया होता आगे और करने से I उनका सम्पूर्ण आख्या उनके उपरोक्त ३ अशुद्ध अनुवाद के हैं:

ध्यान दीजिये की तीनों अनुवाद एक पुनरनुवाद है I उपरोक्त प्रकार की अशुद्धता को सरलता से त्याग किया जा सकता था यदि हमारे १९वीं शताब्दी के पूर्वजों (और समकालीन!) के कार्य को संभवतः विचार विमर्श और सावधानी से किया गया होता….. अंततः कई और विभिन्न अनुवादों को देखते हुए जो प्रकट हुए हैं पिछले कुछ १० वर्षों या और भी इत्यादि में: क्यों प्रायः पुनरनुवाद किया जाता है किसी का “कई बार” जिसका पहले भी हो चूका है—–और क्यों नहीं उन असंख्य उ.एन द्वारा अनुवाद किये गए संस्कृत प्रसंग में से किसी एक का चयन करके उसका अनुवाद किया जाता है?

विट्ज़ेल, वेंडी द्वारा वीरोचित घोषणा के भी आलोचक हैं जिसमें वे अपने आपको, अपनी पुस्तकों का घनिष्ट मित्र मानती हैं: “और एक अल्प प्रचार भी संभवतः उचित है: ‘एक युगांतकारी अनुवाद, प्रथम आधिकारिक अनुवाद इस शताब्दी का'(प्रथम प्रष्ट पर); ‘अत्यधिक सभ्य विद्द्वानों के लिए नविन निष्कर्ष कई कठिन छंदों के ‘(प्रष्ट ६१)—-मुझे संदेह है I”

दृढ़तापूर्वक ये कहना कि छिद्रान्वेषी अन्वेषण एक उदार बुद्धि से संभवतः RISA (रिसा) को इन विषयों को गंभीरता से लेना चाहिए था I न्यूनतम, एक विद्द्वानों का दल होना चाहिए था, जिनका भविष्य उनके प्रभाव के क्षेत्र से बहार होता, वेंडी के कार्य की आलोचना करने के लिए, क्यूंकि उनके निकट बृहत् विभूति है विद्द्वत्परिषद में I

अन्य उदाहरण:

महाध्यापक अंटोनिओ डे निकोलस और भी हास्य पूर्ण परिज्ञान देते हैं [६४]:

वेंडी, जिनको आप सभी जानते हैं, लिखा है रिग वेद मेरे अनुवाद को अपने अनुवाद के निकट रखकर. मुझे “मस्का लगाओ” देते हुए, उनहोंने अभद्र पुनरीक्षण को नाकारा है,….जो सैद्धांतिक शीर्षक वे प्रयोग करती हैं रिग वेद के लिए वे अनियन्त्रित हैं….उनका “अजा एक पड़ा” का अनुवाद एक आभूषण है” I साहित्यिक रूप से उसका अर्थ है “अजा” = अजात, “एक” = एक, “ पदा” = पद, माप। ये अप्रकट एक चरण का मांप है राग का जो “असत” के रेखागणित में व्याप्त है, अर्थात, रिग वैदिक संभावनाओं का संसार जहाँ मात्र रेखागणित ही जीवित है बिना किसी आकृति के I अहा, वेंडी इसका अनुवाद करती हैं ऐसे: “एक पैर की बकरी” क्यूंकि हिब्रू भाषा में “अजा” का अर्थ बकरी होता है I तो एक पैर की बकरी रिग वेद में क्या कर रही है?”I

वेंडी की पुस्तक, “वोमेन, अन्द्रोगाईंस एंड अदर मिथिकल बिस्ट्स”[६५] पर, निकोलस कज़न्स टिपण्णी करते हुए लिखते हैं कि कैसे वे निरंतर मनोग्रहीत रहती हैं मात्र एक अर्थ से, सर्वोच्च कामुक काल्पनिक जो आधारित होता है अत्यधिक मात्रा में चित्र के तनन में, सभी अन्य निष्कर्षों को निष्प्रभाव करते हुए और अर्थ के विभिन्न दृष्टियों को: [६६]

फ्लेहर्टी (उच्चय राजघराने के वंसज या सम्बन्धी), ऐसा प्रतीत होता है कि वे मात्र एक ही प्रकार्य देखती हैं, तृतीय है, उर्वरता एवं कामुकता, सम्भोग, कौमार्यहरण, पुंसत्वहरण और इसी के सामान: यहाँ तक की भक्ति “डिवोशन” का वर्णन किया है नितांत कामोत्तेजक शब्दावली जिसमें अगम्यागमन एवं समलैंगिकता भी मिश्रित है(१९८०:८७-९९:१२५-१२९) I निश्चित ही कामोत्तेजक शब्दावली संभवतः रूपांतर हो सकता है आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी अनुभवों का जैसा की अत्यधिक प्रमाणित किया है साहित्य में?”

उनकी पुस्तक में जिसका शीर्षक है,”ऐसेटिसिस्म एंड एरोटिसिस्म इन द मिथ ऑफ़ शिवा (शिव की पौराणिक कथाओं में वैराग्य एवं कामवासना ),” और भी अन्य कई समस्याजनक अनुवाद हैं, जैसे:

  1. तंत्र = कामुकअभ्यास:

ह्यूग अर्बन AAR(ए.ए.आर) २००१ दल “एम्ब्रेसिंग ओरिएन्टलिज़्म(प्राचीनता का आलिंगन )” पर महत्त्व देते हुए कहते हैं कि “तंत्र” इंडिक विभाग का है ही नहीं जिस मंशा से वर्तमान में उसे उपयोग किया जाता है I ये एक पश्चिमी द्वारा झूठा वस्तुकरण है, जो की निर्मित किया गया १९वीं शताब्दी में अमेरिका में, इसके प्रचलित उपयोग को हड़पने के उद्देश्य से, उस समाज द्वारा जो कमोत्तेजकता की भूखी थीI वो नविन निर्माण बन गया स्वयं में ही वस्तु-निजरूप, और यहाँ तक की पुनःविक्रय होकर भारतीय मंडी में ही बड़ी सफलता से इसने आगमन किया। निश्चित ही यौन विचार तंत्र का सत्य भी है, किन्तु मात्र यही सत्य नहीं है, या यहाँ तक कि, जो मुख्य विचार इस कार्यप्रणाली के सन्दर्भ में बताया गया है, वो भी असत्य हैI

  1. 2. मैथूना = कामुक सम्भोग:

ये और एक अन्य एकपक्षीय परिभाषा डॉनिगर द्वारा उनके शब्दकोष[६७] में दिया गया है I किन्तु तांत्रिक परंपरा के अंतर्गत, इसकी परिभाषा का अर्थ है अपनी पूर्ण चेतना से विश्व से सम्भोग करना, अंतिम विचार है, प्रचण्डता से इस अनुबंध को बनाये रखना जिस से की द्विविधता से ऊंचे उठ सकें। यह एक उपमा है सकारात्मक अनुबंद की, इस विश्व से एक उग्र सुधारवादी यथार्थवाद का, जो अत्यंत ही विपरीत है, हिन्दुइस्म के रूढ़िवादी चित्रण से, जैसा की “विश्व निषेध” धर्म बता कर किया गया है I जबकि वेंडी सबसे नीचेवाले चक्र में ही अटकी हुई हैं अपने पूरे प्रगति में, ये अन्य दृष्टिकोण ऊपर के चक्रों से एक सम्पूर्णतया भिन्न परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है I उनको प्रत्येक स्तरों एवं सन्दर्भों का अर्थ बताना चाहिए, विशेषकर एक आधिकारिक पुस्तक में जहाँ विद्यार्थी से अपेक्षा किया जाता है परिभाषाओं के उचित अर्थ अभ्यस्त करने हेतुI

  1. लिंग = शिश्न(पुरुष गुप्तांग):

वेंडी, लिंग को परिभाषित करती हैं: “शिश्न, विशेषकर शिव का I”[६८] वे कोई भी प्रयत्न नहीं करती हैं सूक्ष्मता से भेद करने का या निष्कर्षों की विभिन्नता को समझने का और अर्थों के कई स्तर और अभ्यास करने के कई चरणों को समझने का। डाइना ऐक, अपेक्षाकृत कुंठित हैं इस विषय के अनुचित चित्रण की आलोचना के लिए: “ईसाई, हिन्दू लिंग उपासकों को देखते हैं और उसको शिश्न की उपासना से जोड़ते हैं, जबकि हिन्दू देखते हैं ईसाई धार्मिक उत्सव को, धार्मिक सम्प्रदाय को एवं उसके प्रतीकात्मक नरभक्षिता को प्रतिरोधपूर्वक। “[६९]

ये एक अद्भुत अचरज है कि उनकी “पुराण पेरेन्निस(पुराण बहुवर्षी)” की आलोचना हुई थी बेकर, हैंस टी.et al (एट.अल )[७०], जिन्होंने अनुभव किया कि डॉनिगर की कामोत्तेजक पुस्तक मानो फ़ास्ट-फूड(जो भोजन अविलंबत से पकाकर परोसा जाये) के सामान प्रकाशन हैं जो रूपांकित किया जाये ध्यान आकर्षण के लिए, पाठकों एवं बिक्री हेतु, किन्तु वंचित हो चेतन्य छात्रवृद्धि या प्रामाणीकता से I

Featured Image Credit – http://www.michaelwitzel.org

(To be Continued…)

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