भेंटवार्ता: राजीव मल्होत्रा से इस विषय पर कि, उनका कार्य हिन्दू परम्परों के अनुरूप कैसे है – 1

व्याख्यान हिन्दू धर्म

Translation Credit: – Vandana Mishra.

श्री मल्होत्रा, आपके क्या दृष्टिकोण हैं गुरुओं, आचार्यों, स्वामियों और अन्य नेताओं के विषय में जो सांप्रदायिक परम्परों के हैं? आप किस प्रकार से उनकी भूमिका को इस आधुनिक जगत में देखते हैं? जब आप हिन्दू धर्म का प्रतिनिधत्व करते हैं सार्वजनिक गोष्‍ठी में, तो क्या आप ये परिकल्पना करते हैं कि, इन व्यक्तियों एवं संस्थानों को नूतन साँचे के प्रवक्ताओं से बदल देंगे?

आर.एम: क्या इन सबको “बदलने” के विषय में कोई भी कल्पना कर सकता है, कभी भी? मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता कि, कैसे।

सांप्रदायिक  वंशावली एवं मठों के नेतागण, मात्र हिन्दू धर्म के अभंजित लक्षण हैं I वे अपने, आप में ही, हमारी धार्मिक परम्पराओं के मूल क्षमता के प्रमाण हैं I  प्रत्येक प्रबुद्ध पण्डित प्रसारण करते हैं, उस पीढ़ी के आसुत ज्ञान को उस समाविष्‍ट शैली में, एक विषय प्रविधि द्वारा, एक विशेष परंपरा जो कि, तदनुकूल होती है उस समुदाय के जिसको वे शिक्षित कर रहे हैं I इन नेताओं के अस्तित्व का होना ही, धार्मिक आध्यात्मिक चिरस्थायी चेतनत्व पद्धति का साक्षी है। ये इनकी प्रेरणा से, इनके शिक्षण से है कि, अन्य लोग स्वयं ही मार्गदर्शित हो जाते हैं अपने व्यक्तिगत चुने हुए आध्यात्मिक अन्वेषण के पथ पर I 

मेरे अपने व्यक्तिगत जीवन में, और जिस कार्य के लिए मैंने स्वयं को समर्पित कर चुका हूँ, उसके लिए मैं निरंतर इन गुरुओं से प्रेरणा लेता रहता हूँ। १९९० में, मेरे अपने ही गुरु का प्रभाव हुआ मुझ पर, जिसने मुझे प्रेरणा दी अपने सर्वत्र व्यवसाय को त्याग देने की, जबकि मैं उस समय अपने आर्थिक सफलता के शिखर पर था, और अपनी सर्वत्र ऊर्जा को मैंने अपने इस कार्य में विलीन कर दिया जो मैं अब कर रहा हूँ I

मेरी तन्मयता एवं धर्मपरायण साहचर्यता, जो कई अनेक सम्प्रदायों की परम्परों से जुडी है, वह मेरे बचपन काल की ओर ली जाती है…. जब मेरा पाल-पोषण एक प्रख्यात पंजाब के आर्य समाजी परिवार में हुआ था. प्रांरम्भ से ही, मैं दिल्ली के रामकृष्ण संस्था से जुड़ गया था, और गीता अध्ययन स्वामी चिन्मयानन्द के अंतर्गत में किया। १९७०, में मुझे महर्षि महेश योगी के अत्तुत्तम ध्यान आंदोलन में दीक्षित किया गया, जिसमें मैं सक्रिय था. लगभग २० वर्षों पूर्व, मैं श्री श्री रवि शंकर के आर्ट ऑफ़ लिविंग संथा का भी अनुयायी रहा हूँ I

मैं ने योगी अमृत देसाई के साथ भी अध्ययन किया है, जो कि, यूएसए में कृपालु योग संस्था के सस्थापक हैं, और मुझे उनके अंतर्गत योग निद्रा परंपरा के शिक्षक होने की भी उपाधि प्राप्त हुई I मैंने स्वामी नित्यानंद के साथ भी कार्यशालों में कार्य किया है. इन सभी साधनानों के करने के अनुभवों के कारण ये, मेरे लिए अनमोल सिद्ध हुए हैं I इसके अतिरिक्त मुझे आध्यात्मिक जीवंत गुरुओं के साथ संपर्क में रहने का भी गौरव प्राप्त हुआ I मैंने इसे अपना व्यवसाय बना लिया है और  अन्तर्ग्रहण कर लिया है इन महान इतिहासकारों के कार्यों को, जैसे: श्री औरोबिन्दो, रमन महर्षि, अदि शंकराचार्य, और अन्य कई अन्य नूतनकलीन व्याख्याकार एवं  विचारकों के कार्य को जो अपनी परंपरा से हैं I माध्यमिक बौद्ध धर्म के व्यवस्थित अध्ययन ने भी, मेरे धर्म ज्ञप्ति में वृद्धि की है I

मेरा, अपनी परम्परों के इन अर्थदर्शकों को “स्थानांतरित” करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है. बल्कि, बिना सहस्र वर्षों के संचयी ज्ञान के, जो उनमें सम्मिलित हैं, मेरे पास संभवतः धार्मिक परम्परों के समर्थन के लिए, वर्तमान काल में संघर्ष करने का कोई कारण ही नहीं होता I

आपने इस महान क्रय-विक्रय संबंधों से भारी लाभ उठाया है, किन्तु क्या आपने कभी उन आध्यात्मिक गुरुओं को अपनी ओर से किसी भी प्रकार से, कोई सहयोग दिया? क्या आपने उनकी सहयता की?

आर.एम: मैं निरंतर उनमें से कई लोगों के संग जुड़ा हुआ हूँ, जो मेरे कार्य का ही भाग है I इस कार्य-प्रणाली में, मैं एक सेवक की भाँती सेवा करने के लिए तत्पर होने का प्रयत्न करता हूँ, चाहे जिस भी रूप में, मैं उनकी सहयता कर सकूँ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती, जो हिन्दू धर्म आचार्य सभा के शीर्ष प्रतिमा हैं, उनके संग रह कर मैंने अत्यंत घनिष्टता से कार्य किया है I कई अवसरों पर, उन्होंने मुझसे आग्रह किया युक्‍तिपूर्ण योजना एवं चर्चाओं में भाग लेने के लिए, जिसमें हिन्दू धर्म को विश्व रंगमंचक पर कई विषयों का सामना करना पड़ रहा है I २००८ में, मुझे दुतीय हिन्दू-यहूदी नायकत्व सम्मेलन में मुख्या केंद्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो उन्होंने संचालित किया था I सम्मेलन का समापन एक ऐतिहासिक प्रस्ताव से हुआ जिसमें, विशेष प्रकार के पक्षपात पूर्ण विषयों को पृथक किया गया, जो हिन्दू धर्म के दीर्घकालीन भुगतना द्वारा व्याप्त था….. और अत्यधिक भाषा प्रणाली जिसका मैंने सुझाव दिया था, एक नेतृत्व विद्द्वान के रूप में, उसे प्रस्ताव में सम्मिलित किया गया था I

[भेंटवार्ता की टिपण्णी: उस घोषणा के लेखों को यहाँ पर देखें:  http://www.scribd.com/doc/2258129/2nd-Hindu-Jewish-SummitFinal-DeclarationP-1#archive]

उसी की सफलता के पश्चात, मुझे पुनः हिन्दू-बौद्ध सम्मेलन २०१०, कंबोडिया, में भी सम्मिलित किया गया, जिसका लक्ष्य २ धार्मिक परम्पराओं के मध्य एक युक्तिपूर्ण प्रस्ताव स्थापित करके उनका समापन करना था I

मैं धन्य हुआ, क्यूंकि मुझे चिन्मय संस्था की सेवा करने का भी अवसर मिला था I जब उनके मंदिर-परियोजना को न्यू जेर्सी में वैधिक संकटों का सामना करना पड़ा था, तब मैंने तत्परता से लोगों अपने स्वरों को गतिमान करने का आग्रह किया था,  जिसने उनके स्थानीय पक्षपातों की गद्दी को पलट दिया I नूतनकलीन ही मुझे, आमंत्रित किया गया था, ३ बृहत समूह के मध्य एक वक्ता के रूप में, चिन्मय संथा, वाशिगटन, डीसी द्वारा…… अन्य कई केंद्रों ने भी मुझे निमंत्रण दिया था I

मेरा सौभाग्य था कि, कई दिनों तक मुझे रामकृष्ण संस्था मठ का आतिथे, बनने का अवसर प्राप्त हुआ, और सर्वोच्चतम स्तर की चर्चा में भाग लेने का अवसर भी प्राप्त हुआ, जो धर्म के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों से सम्बंधित थे I तदनंदर, मैं श्रद्धेय हुआ उनके आमंत्रण द्वारा, जिसमें उन्होंने मुझसे विशेष ग्रंथ के लिए, अनुच्छेद लिखने का आग्रह किया जो वे स्वामी विवेकानंद के १५० वीं वर्षगाँठ के लिए उत्पन्न करना चाहते हैं I

इसके अतिरिक्त, मैं ने श्री श्री रवि शंकर जैसे नेताओं के साथ कई अवसरों पर मंच भी साझा किया है, और उनके साथ कई व्यक्तिगत बैठक भी जिसमें मैंने उन विषयों के विषय में चर्चा की है जो मैं अपने लेखों में उजागर कर रहा हूँ I मैं हेच.एम.ई.सी (हिन्दू मंदिर एग्जीक्यूटिव समिति) में भी सक्रिय हूँ, जो की अत्यंत महान कार्य कर रहा है उत्तरी अमरीका के सभी मंदिरों को एक साथ लाने का, जो समान चिंताजनक विषयों पर चर्चा करेंगे I मैं तो ये स्मरण भी नहीं कर सकता कि, कितनी बार मुझे सम्पूर्ण यूएसए के अनेकों मंदिरों से आमंत्रण एवं आवेदन पात्र मिला है उनकी सभा को सम्बोधित करने हेतु I

मैं इन उदाहरणों को अपने व्यक्तिगत उपलब्धियों के स्तर को दर्शाने के लिए नहीं कर रहा हूँ, बल्कि अपनी कृतज्ञता को व्यक्त करने हेतु कर रहा हूँ, जो मुझे कई विभिन्न स्तरों पर इतनी सेवा करने का सौभाग्य मिला।

कई लोगों ने आपकी टिपण्णियों को गंभीरता से लिया है, जिसमें आपने उन आचार्यों को उनकी पारम्परिक भूमिकाओं से बाहर निकल कर हेगल एवं कैंट जैसे दर्शनज्ञों के विचारों को भी अध्ययन करने के लिए सुझाव दिया है, जिससे कि, वे पश्चिमियों को उनके दृष्टिकोण के माध्यम से उनका पूर्वपक्ष कर सकें I किस प्रकार से आप इस प्रकार के कथन को तर्कसंगत करेंगे? क्या आपको लगता है कि, हमारे आचार्यों ने अपनी इस भूमिका को करने में असफल रहे, हैं, अतः वे उत्तराधिकारी हैं इस शून्य बौद्धिक मानसिकता के, जो हमारे ही भूरे साहिब वर्गों में वर्तमान काल में व्याप्त है?

आर.एम: आप कहते हैं कि, “पारम्परिक भूमिका से परे देखो।” वास्तव में, पूर्वपक्ष, परंपरा का अनिवार्य रुपी ही अंश है जो हमारे आचार्यों ने सहस्त्रों वर्ष तक किया है! आप कैसे आदि शंकराचार्य के उदात्त बौद्धिक प्रबलता की व्याख्या करेंगे, जिन्होंने विभिन्न एवं विस्तृत आध्यात्मविद्या संबंधी पदवियों का अध्ययन, सम्पूर्ण भारत के कोने कोने में भ्रमण करते हुए और वाद-विवाद करके सभी को अपना अनुयायी बनाते हुए अपने ही जीवन काल में संभव किया?

कणाद के वैशेषिका क्या शिक्षण देते हैं एवं अक्षयपद गौतम के न्याय सूत्र किसका प्रतिनिधित्व करते हैं? वे हिन्दू परम्पाराओं के कम्पमान प्रतिक्रियाएं हैं जो आधुनिक बौद्ध एवं जैन धर्मों के दर्शनशास्त्र से पूर्वपक्ष के पश्चात मिले हैं I इस प्रकार के कार्य जीवन-रक्त धरा की भाँती प्रासंगिक एवं प्राणशक्ति हैं, जो निरंतर हमारी धार्मिक परम्पराओं की नाड़ियों में प्रवाहित हो रही हैं जबसे ये आरम्भ हुई हैं I

मैं अपने पारम्परिक आचार्यों को “दोषी” नहीं मानता भूरे साहिब के उत्पत्ति के लिए….मैं इन सबसे बहुत दुरस्त हूँ I वास्तव में, उनका हार्दिक धन्यवाद है क्यूंकि उनके इतने घोर परिश्रम के कारण ही धार्मिक परम्पराएं वर्तमान काल में भी दृढ़ता से स्वतंत्र होकर टिकी हुई हैं, भूरे साहिबों के इतने उत्तम प्रयत्नों के पश्चात भी, क्यूंकि वे सांस्कृतिक पाचन में पश्चिमियों के सहयोगी बने हुए हैं। 

मैं यहाँ पर किसी असफलता पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ……. अपेक्षाकृत, ये एक त्रासदी है, और ८०० वर्षों के परभक्षी उपनिवेशीकरण के परिणाम से हुआ जो विदेशी क्रूर संस्थाओं ने किया था I अभिघात के परिमाण जो हमारे समाज और संस्थाओं ने भोगा है इन अनुभवों से, वह कल्पना मात्र भी कष्टदायी हैं। लगातार, निर्मम दमन एवं प्रायः विध्वंस हो जाने के भय से कोई भी समाज को क्रमशः भीतर की ओर देखने के लिए और सर्वत्र ओर से बहिष्करण की ओर ले जाएगा…..”अपने शीर्ष को नीचे झुकाये हुए” जिस से कि, वह दमनकारी विदेशी को अल्प भयसूचक प्रतीत हो सके I किन्तु यदि अपने शीर्ष को कोई नीचे झुकाये रखेगा तो, उसका क्षितिज सिमित हो जायेगा, और उसको कठोर पूर्वपक्ष करने का अवसर नहीं दिया जायेगा I

हमारी शिक्षा प्रणाली को मैकॉले की प्रणाली से स्थानांतरित करके भूरे साहिबों की उत्पत्ति की गयी उनके बच्चों के रूप में, किन्तु वह मात्र उसका एक ही चरण था I दूसरा चरण था, व्यवस्थित रूप से, क्रूरतापूर्वक धार्मिक परम्पाराओं के ज्ञान को अवैद्ध सिद्ध करना, हर संभव प्रकार से, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं दैहिक हिंसा से, जो भी उपलब्ध हो उसी से करना I तो ये कदाचित ही, हमारे आचार्यों का “दोष” होगा जो, सामूहिक रूप से भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण अंदरूनी हो गया; अपेक्षकृत के, ये उनका ही आभार है जिसके कारण हमारी परंपरा इतने राक्षसी कठिनाई भरे काल से भी जीवित बच पायी।

इसके पश्चात् भी, सच्चाई यही है कि, दृष्टिकोण अवश्य रूप से अंदरूनी हुए; आदि शंकर के समान बौद्धिक ओजस यदि पूर्वपक्ष का पश्चिमियों पर लागु किया जाता, यदि हम अध्ययन करते और समझते कैंट एवं हेगल के दृष्टिकोणों को, और कठोर एवं तर्कसंगत खंडन करने में व्यस्त होते अपने पारम्परिक व्याख्या और स्पष्टीकरण के विज्ञान से तो, कौन जनता है कि, क्या होता! इसके विपरीत, मैक्कौले की शिक्षा प्रणाली को भूरे साहिबों द्वारा वैद्धता प्राप्त हुई, और उनके माध्यम से, कैंट एवं हेगल के पश्चिमी दृष्टिकोण सार्वभौमिक हो गए I

मैं ये सब अपने ही लोगों पर आरोप लगाने के लिए नहीं कहता हूँ, विशेष करके उन प्रबुद्ध स्वामियों पर जिसने मैं स्वयं ही प्रेरित हूँ और जिनसे मैं प्रायः अपने कार्य के सन्दर्भ में व्यस्त रहता हूँ I मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ जिससे की इसको इतिहास की त्रासदी मानी जाये ……  और वर्तमान में हमारे द्वारा संशोधन किया जाए I

तो किस प्रकार आप वर्तमान काल में हिन्दू समाज को इस त्रासदी को शुद्ध करने में सहायता दे रहे हैं? किस प्रकार आप योगदान दे रहे हैं धार्मिक परम्पराओं के आधुनिक अर्थदर्शकों को, एक “पूर्व-पक्ष” नाम के यंत्र के संग, पश्चिम के विरुद्ध संघर्ष के लिए?

आर.एम: मैं लगातार निर्देशन करता रहता हूँ, और अन्य लोगों को भी निर्देशनों से लैस करता रहता हूँ, जैसे की पूर्वपक्ष। वास्तव में, यह इनफींटी फाउंडेशन के कई मौलिक लक्ष्यों में से एक है जिसकी मैंने स्थापना की है I

उदाहरण के लिए, १० वर्षों में, हमने अनुदान दिया हवाई विश्वविद्यालय के विभाग को जो अन्वेषण करता है और शिक्षण देता है भारतीय दर्शनशास्त्र के विषय को I कई अन्य विषयों के मध्य, हमारे प्रयत्नों ने संस्कृत पुस्तक को प्रकाशित किया जो व्याख्या करती है आधुनिक पश्चिमी विचार को, संस्कृत के विद्द्वानों में I

वो पुस्तक महाध्यापक अरिंदम चक्रबोर्ती द्वारा लिखी गयी है, जो की स्वयं ही धार्मिक एवं पश्चिम विचार के उत्कृष्ट विद्द्वानों में से एक हैं I महाध्यापक चक्रबोर्ती ने उन लेखों को कई विभिन्न संस्कृत विद्द्वानों की कार्यशाला आयोजित करने के लिए तिरुपति विश्वविद्यालय एवं वाराणसी में प्रयोग किया। 

परिणाम अत्यंत ही विस्मयकारी एवं स्पष्ट थे कि, हमारे पारम्परिक विद्द्वानों में कितना गूढ़ सामर्थ्य व्याप्त है पश्चिमियों “अन्य” के अध्ययन के विषय में और उनका अपने व्याख्या और स्पष्टीकरण के विज्ञान से उत्तर देने की क्षमता, जो हमारे पारम्परिक सिद्धांतों पर आधारित है I महाध्यापक चक्रबोर्ती के कार्यशाला की सफलता ने कई और भी समान रुपी कार्यशालाओं के आयोजनों का आग्रह किया।

नूतनकलीन आयोजित, २०१२ में दिल्ली के विश्व संस्कृत समारोह में, मैंने अपनी इसी विषय पर आधारित थीसिस को प्रस्तुत किया जिसका मैं ने “बीइंग डिफरेंट” नमक अपनी पुस्तक में किया है I पुनः, प्रतिक्रियाएं अत्यंत ही प्रोत्साहन पूर्ण मिलीं : मुख्य संस्कृत विश्वविद्यालयों  एवं पारम्परिक मठों से अनेकों आमंत्रण मिले, जो आग्रह कर रहे थे इसके पश्चात भी पूर्वपक्ष पर अन्य कार्यशालाओं के आयोजन करने के लिए I समानांतर, मेरे संगोष्ठी के पश्चात्, जो मेरे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में इसी  आरम्भ में आयोजित किया गया था, कला के प्राध्यापक के संकायाध्यक्ष ने, मुझसे सहयता माँगी नूतन अंतरसांस्कृतिक अध्ययन केंद्र स्थापित करने हेतु, जो मुख्य रूप से पूर्वपक्ष प्रणाली पर केंद्रित हो I

कई लोग इस बात से सहमत होंगे कि, ये सभी मेरी थीसिस को, वर्तमान काल के धार्मिक विद्द्वानों एवं आध्यात्मिक गुरुओं की स्वकृति मिलने की अति विस्तृत प्रसिद्धि दर्शाता है I आधुनिक भारतीय बौद्धिक लोगों में जो धार्मिक परम्पराओं में जड़वत् हैं, एक सामंजस्य सा अपने आप ही बनता जा रहा है जिसकी इच्छा है, जो अनिवार्य रूप से आवश्यक है, पश्चिमी विचार के अधीन के लिए……..और उनके अनुरूप प्रतिक्रिया देने के लिए सिद्धांत के एक परिशुद्ध एवं परिष्कृत प्रणाली द्वारा I

ऐसा कहते हुए, ये अपेक्षाकृत जिज्ञासु है कि, किंचित मुट्ठीभर निंदक …… इन “छिद्रान्वेशीयों” जिनके विषय में आप बात करते है …..वे मेरी थीसिस के विषय में “चिंतित” होते हुए प्रतीत होते हैं I

वास्तव में, “चिंताएं” किस आधार पर आधारित हैं? क्या उन्हें ज्ञात है कि, पूर्व-पक्ष क्या होता है…… क्या उसकी भूमिका एक विद्वत्तापूर्ण प्रविधि के रूप में, हमारे बुद्धिजीवी परंपरा में व्याप्त नहीं है जो कई सहस्त्र वर्षों में विस्तृत है? क्या उन्हें ये आभास भी है कि, भारत में महत्वपूर्ण चिंतन एवं चर्चाएं पश्चिम की तुलना में कई शताब्दियों पूर्व ही आरम्भ हो चुकी थीं, क्या पश्चिमियों ने कदाचित ये विचार भी किया था?

उस सन्दर्भ में, किस मौलिक शोध की गहराई में उन्होंने योगदान दिया है इस विषय में…… या किसी अन्य विषय में….जो उन्हें योग्य बनता है इस प्रकार के निराकरण प्रवाहपूर्ण घोषणा करने के लिए?

इस असन्दर्भ में उनकी अभिवृत्‍,ति पूर्वधारणा के अंधाधुन्द अनुपालन का  विश्‍वासघात करती है……किंचित और भी अभिलक्षण हैं उस रूढ़िवाद पर आधारित मरुस्थल के रिलिजन के, धार्मिक अनुशीलन की तुलना में I

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