भेंटवार्ता: राजीव मल्होत्रा से इस विषय पर कि, उनका कार्य हिन्दू परम्परों के अनुरूप कैसे है – 2

व्याख्यान

Translation Credit: – Vandana Mishra

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किंचित तो आपके ही आलोचक घोषणा करते हैं की, आप ही स्वयं “यू -टर्न” कर रहे हैं, कई ईसाईयों और अन्य अन्तर- विश्वासी वार्तालाप की कार्य-प्रणालियों में व्यस्त हो कर I क्या ऐसा करते हुए आप ईसाईयों को एक अन्य ही उपाय का सुझाव नहीं दे रहे हैं हिन्दुओं के धर्म परिवर्त करवाने के लिए, और धार्मिक ज्ञान के पाचन के लिए?

आर.एम: मैं आपसे कुछ पूँछने का इच्छुक हूँ I यदि मैं किसी “अंतर्- विश्वासी वार्तालाप कार्य-प्रणाली” में अपने आपको व्यस्त ना हूँ  …… तो क्या इसका अर्थ ये होगा कि, सभी “अंतर्- विश्वासी वार्तालाप” समाप्त हो जायेंगे?

नहीं I वे चलायमान ही होंगे I और वे पश्चिमियों के अनुसार उनके सार्वभौमिकता वाले सिद्धांतों पर निर्धारित होंगे, जो पहले से ही अब्राहमिक रिलीजनों को दीर्घ काल से विशेषाधिकार दिए हुए हैं!

मैं अंतर्-विश्वासी वार्तालाप के संस्कृतीकरण या संदर्भीकृत शब्दों के मार्ग नहीं बनता हूँ स्वयं को उनमें व्यस्त करते हुए I अब्राहमिक रिलीजोनों के धर्म-प्रचारक, इन कार्यों में निरंतर व्यस्त हैं, कई ऐसे मार्गों के निर्माण कार्य में जो की लोगों का धर्म परिवर्तन करके उनका शोषण कर रहे हैं I वार्तालाप तो मात्र एक ही प्रकार है, कई अन्य प्रकार के भी मार्ग व्याप्त हैं…. जिनमें धार्मिक परम्पराओं को अनुचित रूप से बिना आरोपण के संशोधन करना, अन्य धर्मों को समान रुपी सम्मान ना देना,  इतिहास-केन्द्रिक अद्वितीयता का अनुरक्षण करना, मूल निवासियों की संस्कृति के आध्यात्मिक अभिव्यक्तिों के मुखौटे को पहनकर अपने ईसाई रिलिजन का प्रचार करना इत्यादि कई I इस प्रकार कई विषय व्याप्त हैं, और वे सभी गतिमान हैं I

मैं इन में से किसी भी प्रकार के मार्गों का अनुगमन नहीं कर रहा हूँ अंतर्-विश्वासी वार्तालाप हेतु……..बल्कि, मैं तो यत्न कर रहा हूँ किंचित प्रकार की सच्चाई को सम्मिलित करने का इन वार्तालापों के मध्य, और कार्य क्षेत्र की भूमि को समतल कर रहा हूँ, इन विषयों को उजागर करके!!

यदि इन विषयों को किसी ने अभी तक उजागर नहीं किया है तो हमें निष्क्रिय नहीं होना चाहिए, और “समानता” का स्वप्न नहीं देखना चाहिए …… ये विचार करते हुए कि, पश्चिमी सार्वभौमिकता हानिकारक नहीं थी यहूदी-ईसाई रिलिजन को विशेषाधिकार देने में, क्यूंकि अंत में तो सभी रिलिजन और धर्म “समान” ही हैं।

जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है. बल्कि वास्तव में, धार्मिक विश्वास कई प्रकार से कट्टर विरोधी है अब्राहमिक रिलीजनों के सारभूत सिद्दांतों से I ये मात्र तभी संभव है जब हम विभिन्ताओं से अनिभिज्ञ हों कि, अंतर्-विश्वासी वार्तालाप भय का स्रोत हो सकता है हम सबके लिए I जब हमको विभिन्नता के विषय में सूचित किया जाता है, और ये माँग किया जाता है कि, वार्तालाप को अनिवार्य रूप से पारस्परिक सम्मान के आधार पर आरम्भ होने चाहिए तब, भय किस का है? उन लोगों की मानसिकता को छोड़कर, जो सुधार विरोधी हैं और जो आशाहीन एवं दुराग्रहपूर्वक उपनिवेशी ही रहना कहते हैं, ये कहीं व्याप्त ही नहीं है।

किन्तु क्या अंतर्-विश्वासी वार्तालाप स्वयं ही अवसर नहीं देते हैं इन ईसाई रिलिजन के प्रचारकों को, अग्रणी रूप से, अपने लक्ष्य को कपटपूर्ण संस्कृतीकरण करके प्राप्त करने के लिए?

आरएम: मुझे प्रतीत हो रहा है कि, प्रश्न को अतिसरल कर दिया गया और दो भिन्न विषयों का भ्रम उत्पन्न हो गया है I

संस्कृतीकरण एवं अंतर्विश्वासी मिलन, दोनों ही एक दुसरे से स्वतंत्र रूप से व्याप्त हैं I निश्चय ही, वर्तमान में हम दोनों ही घटनाओं को भारत में साथ साथ बलपूर्वक प्रवेश करते हुए देख रहे हैं I

हिन्दू उत्कृष्ट वर्गों में, जिस “समानता” की मिथ्या का हम सब अपभ्रंश प्रचालन देख रहे हैं …….वो विचार की जिसमें सभी रिलिजन एवं धर्म अन्तोत्गत्वा समान हैं…… इसके प्रभाव ने शिक्षित समूह में, भारतियों का संस्कृतिकरण किया है । ये कोई अंतर्विश्वासी वार्तालाप का परिणाम नहीं है, बल्कि अपने ही सनक द्वारा निर्मित अपने ही लेखकों एवं विचारकों के कारण उत्पन्न किया गया है I

साथ ही, ग्रामीण स्तर पर जो संस्कृतिकरण हो रहा है…..जहाँ पर ईसाई रिलिजन प्रचारक बाहरी जाल बुनते हैं हिन्दू प्रणाली से पूजा पद्धिति का, जैसे आरती करना, और जीसस को इसको अर्पित करना……..सम्पूर्ण रूप से यह अंतर्विश्वासी वार्तालापों से पृथक है I  

इसके विपरीत, अधिकांश अंतर्विश्वासी वार्तालाप इन संस्कृतिकरण विषयों से पृथक होते हैं, और अपने प्रकार के एक भिन्न गतिविद्या के होते हैं I तो ये महत्वपूर्ण है कि, इनको पहचाना जाये, और प्रत्येक विषय का स्वतंत्रतापूर्वक उपचार किया जाए I

सर्व प्रथम, देखते हैं संस्कृतिकरण को, और किस प्रकार मैंने इसका सामना किया है I

आरम्भिक सत्य ये है कि, मेरी “समानता” की मिथ्या की आलोचनाओं ने महत्वपूर्ण रूप से भारतीय बुद्धिजीवियों की संस्कृतिकरण के अंदरूनी भय की प्रशंसा पर अत्यधिक प्रभाव डाला है………उन कपटी “समानता” के कथनों पर जिनको हमरे लोगों को भ्रमित एवं भटकाने के लिए प्रयोग होता है I मेरी सम्पूर्ण थीसिस जो “विभिन्नता” पर केंद्रित है वो जागरूकता को प्रतिधारित करने पर है, कि, हम समान नहीं हैं, जिससे कि, बाहरी परभक्षी हमारी परमपारों को गुप्त रूप से पचा ना सकें I

मेरे कार्य की आलोचनाएं, किसी “समानता” की मिथ्या की पृष्टभूमि के ज्ञप्ति की आवश्यकता के लिए नहीं है ……. विडम्बना ये है कि, ये प्रसारित किया जा रहा है अपने ही कई गुरुओं एवं स्वयं-नियुक्त प्रवक्ताओं द्वारा।

इसके अतिरिक्त, मैंने इतिहास, मनोविज्ञान एवं पश्चिमियों की राजनीति का गहन अध्ययन किया है, जो संशोधन करते हैं और पचा लेते हैं हमारे धर्म के महत्वपूर्ण अंशों को, पश्चिमी व्यष्टिव को शक्तिशाली बनाते हुए और हमारे धर्म को दुर्बल करते हुए I इसको मैं यु-टर्न सिद्धांत के नाम से सम्बोधित कर रह हूँ, और मेरे ज्ञान अनुसार ये विषय अपने आप में अनूठे अध्ययन के वर्ग के अस्तित्व का है I

इसके परे, मैंने एक सम्पूर्ण शब्दावली का परिचय ढूंढा लिया है जो कि, हमारी संस्कृतिकरण की ज्ञप्ति को और भी गूढ़ करेगी। आप पाएंगे कि, कई परिभाषित शब्द इस शब्दावली के, जिनमें “समानता”, “विभिन्न होना”, “पाचन”, एवं “यु -टर्न” है, अब बड़ी तीव्र गति से उपयोग द्वारा प्रसारित हो रहे हैं, और भारतीय विचारकों के मध्य प्रसिद्द शैली के अंश बन रहे हैं ।

क्या किसी ने भी, नूतन काल में, इतने विस्तृत रूप से इस विषय पर शोध किया ……… और साथ ही सत्य-अन्वेषण किया आधार स्तर पर, एक विश्लेषणात्मक ज्ञप्ति द्वारा पश्चिमी एवं भारीतय दोनों व्यष्टित्व के संग में? मुझे तो नहीं ज्ञात है कि, किसी ने भी ऐसा किया है, या किसी ने भी अपने अन्वेषणों को प्रभावशाली रूप में व्यक्त किया हो I

दूसरी बात, देखते हैं मेरे अंतर्विश्वासी वार्तालापों में भाग लेने के विषय को I

किंचित घटनाओं के अतिरिक्त जो कि, मात्र इसी उद्देश्य के लिए संचालित हैं “अंतर्विश्वासी वार्तालाप” के लिए, कई और भी अन्य उदाहरण हैं अंतर्विश्वासी पारस्परिक अंतःक्रिया के, जिनको प्रत्यक्ष रूप में पहचाना भी नहीं जा सकता है I

आपकी चर्चाएं दूरदर्शन एवं रेडिओ पर होती है जिसमें कई विभिन्न रिलीजनों के प्रतिनिधि सम्मिलित होते हैं, दुर्भाग्यवश, हिन्दू भागिदार, जिसको धार्मिक परम्पराओं का गूढ़ ज्ञान होता है, इन वाद विवादों पर विपक्षी प्रतिनिधि को इन विषयों के प्रत्युत्तर देने के लिए अनुचित रूप से उद्यत होकर आता है I

आपको ज्ञात है कि, यूनाइटेड स्टेटस की सरकार कई संस्थाओं में लोगों को नियुक्त करती है, जहाँ पर उसी समान रुपी वाद विवाद होते हैं जैसे “अन्तरविश्वासी” कार्यक्रमों में होते हैं. ……. क्या हमको ऐसा लक्ष्य नहीं स्थापित करना चाहिए जिसमें हमारे लोग भी समर्थ किये जाएं और दृणतापूर्वक वहां पर हमारा प्रतिनिधित्व कर सकें? या हम मात्र इस प्रकार की चर्चा का बहिष्कार करने का सुझाव देंगे, जिससे कि, हमारा स्थान कोई दुर्भावपूर्ण विपक्षी ले सके, जो ये घोषणा करे की वह हमारा ही प्रतिनिधित्व कर रहा है I

जब मैंने प्रारम्भ में इन अन्तरविश्वासी आंदोलनों के पक्षपातों को उजागर करना आरम्भ किया, तब मैंने अनुभव किया कि, इस प्रकार के पक्षपात प्रायः किसी विशेष समूह के व्यक्तियों द्वारा इन चर्चाओं में नियुक्त किये जाते हैं जो हिन्दू धर्म पर बोलते हैं I इनमें सम्मिलित हैं हिन्दू-विरोधी वामपंथी, भारतीय या पश्चिमी ईसाई, और नाममात्र के “हिन्दू” जो ना तो योग्य हैं हिन्दू कहलाने के और ना ही आत्मविश्वास से परीपूर्ण हिन्दू जो की दृणता से विपक्षीयों का सामना कर सके I मैंने प्रतिउत्तर दिया एक जागरूकता की छावनी का निर्माण करते हुए, अपने मंदिरों और समाज के नेताओं से आग्रह करते हुए, अपने युवा पीढ़ियों को आधिकारिक एवं सुविज्ञ स्वर को उच्च स्तर तक ले जाने के लिए और उनके मध्य अपने लिए एक पदवी की माँग करने के लिए I

हमको ये ज्ञात होना चाहिए कि, अंतर्विश्वासी कार्यक्रम मात्र हिन्दू धर्म पर ही केंद्रित नहीं हैं, बल्कि कई अन्य रिलीजनों पर भी हैं…….जैसे इस्लाम, ईसाई, यहूदी इत्यादि और अन्य के कई मंशा हो सकती है जो उनके स्वार्थी मनोभाव से इस प्रकार की चर्चा में भाग लेने से जुड़ी हो सकती है I हिन्दुओं की अनुपस्थिति कदापि पर्याप्त नहीं होगी किसी भी अंतर्विश्वासी कार्यक्रम को समाप्त करने हेतु I ये सभी कार्यक्रम हमारे बिना भी होते रहेंगे, और हम किसी परोक्षी द्वारा पृतनिधित्व किये जायेंगे जो, या तो अयोग्य होंगे या हमारी विचारधारा के शत्रुताकारी होंगे I

किसी भी स्थिति में, पूर्वी समस्या किंचित सीमा तक घट गयी है; ये अब हिन्दुओं के लिए सामान्य हो गया है इस प्रकार के समूहों में आमंत्रित किये जाना I

वर्तमान काल में, इसके विपरीत, एक नूतन समस्या उत्पन्न हो गयी है I एक चिल्ल-पौं हिन्दू प्रवक्ताओं का झुण्ड आ गया है जो अपने स्वयं को धर्म के राजदूत घोषित करते हैं, बल्कि वास्तव में, हमारे विक्रयण करते हैं I इनमें से कई व्यक्तियों की वास्तविक मंशाएं होती हैं। अन्य इसमें स्वयं के अभ्युदय, अहंकार-प्रसार, प्रतिष्ठा या अपने व्यव्यसाय या उद्द्योग के जालक्रम विस्तार के अवसरों के लिए सम्मिलित होते हैं I

प्रायः, हमारे राजदूत प्रशिक्षण के आभाव के कारण संभवतः, वाद-विवाद में अपंग की भाँती प्रतीत होते हैं, उनमें धार्मिक पाण्डित्य में अपर्याप्त निपूर्णता होती है, एवं उन विषयों में अल्प ज्ञान जिसका हमें सामना करना होता है I इन सबसे अधिक मत्वपूर्व विषय ये है कि, उनमें शिक्षित सभ्य रूप से पश्चिमी मानसिकता का पूर्व-पक्ष करना नहीं आता है I इन सभी अपंगताओं ने हमको भारी मूल्य चुकाने के लिए बाध्य किया है I

इन सभी अपंगताओं को पलटने के लिए, हमें कई कार्यशालाएं एवं शिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा I हमें कठोर प्रशिक्षण का आरम्भ करना होगा उन महत्त्वाकांक्षी धार्मिक राजदूतों के लिए, उन्हें उस ज्ञान से सन्नद्ध करना होगा जिसकी उनको आवश्यकता है, और उनको लोकमंच  का सामना आत्मविश्वास से करने के लिए शस्त्र-सज्जित करना होगा जिससे कि, वे भयभीत ना हों चाहे उन्हें आवश्यकता पड़ने पर अपने बचाव के मार्ग पर ही क्यों ना जाना पड़े I चूँकि ये अंतर्-विश्वासी व्यस्तता से विशेषतः सम्बंधित हैं, इसी कारण ये मेरे प्रयत्नों के प्रमुख केंद्र रहे हैं।

आपके व्याख्या अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि, जो चर्चाएं आपके आलोचकों द्वारा उपयोग की गयी हैं…… या मैं कहूँ कि, निन्दकों द्वारा…. अत्यंत ही कृत्रिम हैं I इसके पश्चात् भी, वे निरंतर हठ करते रहते हैं कि, आप उनके धार्मिक नेताओं के विरुद्ध हैं, या उनमें से किंचित आपके के विरुद्ध हैं……. ऐसा क्यों है?

आरएम: हमारे धर्म के अनुसार, किसी को भी अपने अनुभवों के प्रमाणों के अनुसार ही निष्कर्ष निकालना चाहिए। हूहा कदापि ही कोई प्रतिनिधी नहीं हो सकता है I

इस सन्दर्भ में, सर्वोत्तम उपाय जो करने योग्य है वो ये है कि, उन विशेष प्रकार के गुरुओं एवं आचार्यों को ढूंढें, कथित रूप से, जिन्होंने मेरे विरोध में तथाकथित, शत्रुताकारी विचार बनाया उत्पन्न किया है I व्यक्तिगत रूप से, मुझे ज्ञात नहीं है कि, किसी ने भी ऐसा किया हैI

जैसा कि, मैंने पहले भी उल्लेख किया था, मेरी सहकार्यता का आग्रह किया गया है….. और लगातार आग्रह किया जा रहा है……कई समूहों द्वारा जो कि, कई विभिन्न सांप्रदायिक परंपरा से जुड़े हुए हैं, भारत एवं उत्तरी अमरीका दोनों स्थानों पर I मैं तो श्रद्धेय हूँ इन अवसरों का जिनसे मैं उनकी सेवा करने में सक्षम हूँ अपने लेखों से, वादन व्यस्तता से, कार्यनीति पर चर्चाओं से, और इससे भी अधिक कार्य से. मुझे तो कदापि ऐसा अनुमान भी नहीं होता कि, इस प्रकार के सम्बन्ध शत्रुता के भावों से उत्पन्न होंगे…….क्या आपको ऐसा लगता है?

मैं नहीं जनता हूँ कि, क्यों किंचित लोग इस प्रकार से दृण होकर मेरे विषय में ऐसे आरोप लगाते हैं। किन्तु आरोप स्वयं ही बड़ी सरलता से अभिज्ञेय निराधार पाए जाते हैं, और मेरे लिए यही महत्वपूर्ण है I

कोई भी मेरे निन्दकों से मेरे संबंधों का परीक्षण कर सकता है उन व्यक्तियों एवं पारम्परिक संथाओं के संग, जिसको वे मेरे प्रति शत्रुता का भाव दर्शाने का प्रयत्न कर रहे हैं I क्या उनका भी उतनी ही घनिष्ठता से व्यवहार है इन संस्थाओं से, मेरे समान?  क्या उनके भी लगातार ऐसे ही सहभागिता रही है इन संस्थाओं से, जैसे मेरी रही है? यदि नहीं, तो उन्हें किसने योग्य सिद्ध किया है, उन विषयों पर न्यायाधीश की भाँती अपने आदेश देने के लिए जिस वादरहित का अनुभव उन्होंने स्वयं नहीं किया है?  निश्चित ही, व्यक्तिगत पूर्वधारणा से उत्पन्न न्यायाधीश के निर्णय की भाँती दंड देना इस प्रकार से योग्य नहीं सिद्ध होते हैं….. किन्तु कई लोग इस प्रकार के दंडाज्ञा को वैद्य भी नहीं मानते हैं I

क्या आपको ऐसा प्रतीत होता है कि, आप पर आक्रमण आपसे मात्र द्वेष की भावना के कारण ही हो रहे हैं? किंचित लोग ऐसे हैं जो विशेषतः आसक्त हैं आप पर व्यक्तिगत रूप से आक्रमण करने के लिए I इसके पश्चात् भी, उनमें आभाव है व्यक्तिगत रूप से आपकी भाँती योगदान देने का और आपकी भाँती पांडित्य में उपलब्धियों को प्राप्त करने की, जो सम्भवतः उनके आपके ऊपर आक्रमण को, वैधता या अधिकार देने में सहायक हों I आप इन आक्रमणों को किस प्रकार से देखते हैं: क्या वे व्यक्तिगत दुर्भाव के प्रतिबिम्ब हैं, या ये कोई मनोमिति समस्या है?

आरएम: मैं वास्तव में इन धब्बों को धोने में रूचि नहीं रखता हूँ. इस प्रकार इन लोगों को कार्य करने देना चाहिए I मैं तत्पश्चात भी अपना कार्य निरंतर करता ही रहूँगा I

क्या आपको कभी भी ऐसा प्रतीत हुआ कि, इस प्रकार के उपद्रवी आक्रमण आपके कार्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो सकते हैं, या अन्य लोगों के मध्य आपकी प्रतिष्ठा में अंतर् उत्पन्न कर सकते हैं?

आरएम: मेरा स्वधर्म मुझसे ऐसी कोई माँग नहीं करता है कि, मैं किसी के विरुद्ध स्पर्धा करूँ निर्वाचित विजय के लिए, सामाजिक स्वीकृति के लिए, उच्च स्तर के लोगों से भेँट करने की अभिलाषा के लिए या कोई अन्य प्रसिद्धि प्राप्ति के उपाय के लिए मैं पर्याप्त मात्रा में लेखक एवं वक्ता के रूप में अतयंत व्यस्त हूँ……. पूर्वकालीन समय से भी अधिक व्यस्त हूँ वर्तमान काल में, और साथ ही कई विभिन्न निमंत्रणों से जो ऐसे संविद से प्राप्त होते हैं I ये अत्यंत ही कठिन है, मेरे कार्य से सामन्जस्य बनाये रखने के लिए, एक वैध माँग समय एवं उत्साह की ….. जिससे कि, इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण आक्षेप कदाचित ही ध्यान आकर्षित कर सकें!  मैं नहीं समझता कि, उत्साही लोग, जो मेरे संग कार्य करने के लिए इच्छुक होंगे, वे मेरे कार्य से मात्र इसलिए मुँह मोड़ लेंगे और चले जायेंगे क्यूंकि मुझ पर इस प्रकार के आक्रमण हो रहे हैं। बल्कि गंभीर विचारकों, समूहों के आमंत्रण जो इस प्रकार के विषयों पर गोष्टियाँ आयोजित करते हैं, उनकी गिनती निरंतर अत्यंत तीव्रता से बढ़ रही हैI

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