धर्म-परिवर्तन का लक्ष्य – 1

ईसाई धर्मप्रचार का संकट विशिष्ट

Translation Credit: Vandana Mishra.

मानवाधिकार एवं अन्य पक्ष

अवैध धन संपत्ति को वैध करने में न्याय विरुद्ध प्रणाली द्वारा, संपत्ति की सरणि का निर्माण करके, एक जटिल लेन-देन के जाल द्वारा किया जाता है, जिससे कि, धन के चरित्र को विस्तार से संदिग्धार्थ बनाया जा सके, और क्रमशः उसको न्याय पूर्ण व्ययसाय गतिविधियों द्वारा ले जाया जा सके जो तत्पश्चात “वैध” संपत्ती में परिवर्तित हो जाये I सौभाग्यवश, इसका विरोध करने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स ने विश्व भर में एक आंदोलन चलाया है I

तथापि, एक अन्य प्रकार की भी ‘अवैध सम्पति को वैध करने की प्रणाली है” जो उसी प्रकार समान छल करती है, जिसमें पारदर्शिता का आभाव है, किन्तु पनपती है बिना किसी चुनौतियों का सामना किये I मैं उस बृहत ‘मानव अधिकार’ के जालक्रम के कार्यक्रम की ओर संकेत कर रहा हूँ जिसमें सम्मिलित हैं सक्रियतावादी जो सार्भौमिक्ता के नाम पे एन.जी.ओ (सरकारी-भिन्न संस्थाएं), सरकारी कार्यक्रम, धार्मिक संस्थाएं, और व्यक्तिगत धन-राशि देने वाले स्रोत जो की मत भेदों को प्रोत्साहन देते हैं और किंचित अवसरों पर तो विभिन्न प्रकार के विप्लव और पृथकतावादी आंदोलनों को भी बढ़ावा देते हैं I एक व्यक्ति का आतंकवादी, अन्य व्यक्ति का स्वतंत्रता सेनानी है, और ये द्विअर्थी वार्ता को उत्पन्न होने का अवसर देता है I 

और भी कई अन्य विभिन्न प्रकार के अभिरुचि-के- मत भेद व्याप्त हैं जिनकी स्पष्ट व्याख्या करना और भी अत्यंत कठिन है, किन्तु जो तथापि अपरिहार्य है उन सत्ता के महान कुप्रयोग से हैं, जो ‘देनेवाले’ और ‘सहयता करनेवाले’ की ओर से आते हैं I उदाहरण के लिए, नेशनल पब्लिक रेडिओ ने प्रसारण किया एक श्रंखला, जो अफ्रीका के अकाल-ग्रस्त क्षेत्रों से वहां की महिलाओं के विस्तृत यौन शोषण के विषय में थी I अपराधी यू.एन के कार्यकर्त्ता, संकुचक एवं स्थानीय स्वेच्छाकर्मी थे जो खाद्य पदार्थ के बदले में काम-क्रिया का व्यापार कर रहे थे उन आशाहीन माताओं और युवतियों से घटिया संत्रास या और अत्यंत संदिग्धार्थ ‘प्रत्यायन’ प्रणालियों द्वारा। ये अपराधी ‘नैतिक अधिकार’ एवं अपनी मिली हुई सत्ता की शक्तियों का प्रयोग करते थे अपने आडम्बर द्वारा, ये कहते हुए कि, वे ‘देनेवाले’ हैं और ‘मानव अधिकार के सक्रियतावादी हैं’ . वे एक दम निष्पक्ष रूप से मुखर होकर उन पददलितों के मानसिक, जीवन मूल्यों एवं शरीर का उल्लंघन करते थे, जिनकी सहयता करने की वे घोषणा करते थे I नोबल शांति पुरस्कार विजेता एवं अल्स्टर यूनियनिस्ट नेता डेविड ट्रिंबले ने नूतनकाल में कहा कि: ‘इस विश्व की सर्वोच्च अभिशापित सत्य है मानव अधिकार संस्थाओं का व्याप्त होना। ये आतंकवादियों के कार्य को न्यायसंगत सिद्ध करते हैं और कई निष्छल पीड़ितों की हत्या को सहअपराधिता में परिणित करते हैं I‘उनके इस कथन ने, एमनेस्टी अंतर्राष्ट्रीय संस्था एवं ह्यूमन राइट्स वाच, दो बृहत विश्व के सर्वोच्च मानव अधिकार समूह को क्रोधित किया, जिसमें की पूरे विश्व में, मिलियन सदस्यों से भी अधिक लोग कार्यनियुक्त हैं I (द गार्जियन, जनवरी २९, २००४)

स्पष्ट रूप से, मेरा मानना है कि, जिस प्रकार से अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य निष्कपट और न्याय-पालन करते हैं, किन्तु स्वांग से अनैतिक गतिविधियों की सहयता से दुरूपयोग किया जाता है, उसी प्रकार अधिकांश मानव अधिकारी एवं एन.जी.ओ सत्यता से उत्तम कार्यों में व्यस्त हैं, किन्तु मानव अधिकार के ‘उद्द्योग’ प्रदान करते हैं उत्पात-निर्माताओं को ऐसे अवसर, जिससे की वे ‘कार्य प्रणाली’ में भ्रष्ट होने की शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं I

सन्देहार्थता पर उन्नतिशीलता

जिस प्रकार कई निष्कपट व्यावसायिक अनिच्छापूर्वक किसी अन्य के अवैध सम्पति को वैध करवाने की योजना में फंस जाते हैं, उसी प्रकार कई कुलीन सक्रियतावादी एवं एनजीओ भी संभवतः धोखे से जघन्य गतिविधियों को सुसाध्य कर सकते हैं I तथापि, प्रथम, अवैध धन संपत्ति को वैध करवाना और दूतीय, वो सन्दर्भ जिसको मैं ‘अवैध मानव अधिकार को वैध सिद्ध करवाना, दोनों ही सन्दर्भों में, कई विभिन्न बिंदुओं पर मध्यस्थता के समूह हैं, इस खाद्य श्रृंखला में, जिन्हें ज्ञात है या उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि, इस प्रकार के कार्य का अंततः कैसा  अंत होगा, किन्तु कौन है जिनको ये सब चिंता होगी और घोषित करें कि, वे निष्छल एवं अज्ञानी हैं I

इसको जो जटिल बनता है वह ये है कि, कई मानव अधिकार संसाधन एवं गतिविधियां द्वैत-अनुप्रयोग प्रकृति की हैं: एक ओर ये सहयता करता है मानव अधिकारों की, किन्तु उसी अनुमुद्रा का अन्य भाग, मूल निवासी सभ्यता को दुर्बल करता है या उस राष्ट्र की एकता को खंडित करता है और संभवतः प्रजाकोप को प्रोत्साहन भी प्रदान करता है I अनुभूत्य सामग्रियों एवं प्रौद्योगिकियों के सन्दर्भ में, वर्तमान में द्वैत-प्रयोग के उचित-परिभषित सिद्धांत व्याप्त हैं जो संकेत करते हैं प्रौद्योगिकियों की ओर, जो सेना एवं असैनिक नागरिकों, दोनों के लिए प्रयोग किये जा सकते हैं। वाणिज्य नियम को प्रतिपादित किया गया इन वस्तुओं से व्यवहार करने के लिए, प्रायः उसी समान प्रतिबंधों का प्रयोग करते हुए, जो लागु होते, मात्र, यदि उनके समीप सेना के अनुप्रयोग होते।

निम्नलिखित द्वैत अनुप्रयोगों के उदाहरणों पर ध्यान दीजिये मानव अधिकार दान के सन्दर्भ में: वह विद्यालय जिसको धन-राशि शिक्षा प्रदान करने के लिए दी गयी थी उसी विद्यालय का प्रयोग अवकाश समय में, राज-द्रोह करने के प्रोत्साहन देने के लिए किया जाता है। जो वाहन निधिबद्ध हैं छात्रों, रोगियों, चिकित्सकों को यातायात-साधनों की सुविधा प्रदान करने के लिए, उन्हीं वाहनों का धर्म परिवर्तन करवाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है I वो व्यक्ति जो वेतन पाता है दान माध्यम से, ‘स्वेच्छापूर्वक’ धर्म परिवर्तन करने के लिए उसी राशि का प्रयोग करता है और/या राजनीती का उपयोग जो कि, संभवतः अनुदान के आच्छादन में नहीं प्राप्त होती, यदि सार्वजनिक कर दिया जाय I एक दानशील चिकित्सालय का प्रयोग उपदेशों द्वारा रोगियों या मरनेवाले व्यक्तियों के धर्म को परिवर्तित करने के लिए उपयोग किये जा रह हैं, उस समय, जब उनकी सुरक्षा  एवं निर्णय लेने की स्थिति निम्न अति निम्न हो चुकी है और उनकी किसी सहायता कर्मी पर विश्वास करने की मंशा उच्चतम पहुँच चुकी है I एक सक्रियवादी को जब अनुदान, पुरस्कार और विदेशी यात्रा के माध्यम से दृश्यता प्राप्त होती है, जो उसको प्रसिद्द बनता है, तब वह प्रसारित करता है इस  प्रतीकात्मक मूलधन को किसी विशेष भौगोलिक लक्ष्य के प्रचार के लिए, जो कि, (चोरी-चोरी) उस अनुदान-पुरस्कार-प्रसिद्धि स्रोत से जुड़े हैं I

अनुदान देनेवाली संस्थाएं और एनजीओ जो इसमें सम्मिलित हैं वे अस्वीकार करते हैं ‘अन्य प्रयोगों’ के विषय में जो इन धन राशियों या कार्यप्रणाली द्वारा किये जा रहे हैं I और प्रायः, ये अत्यंत ही कठिन कार्य होते हैं वास्तव में, सिद्ध करने योग्य। “प्रमाण” के अभाव में, इसके विरोध में कोई स्वर नहीं उठते, ना ही मुझे किसी सार्वजनिक-अभिरुचि अभियोग का ज्ञान है, जो इसके विरुद्ध में चलाया गया हो I

इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक रूप से, इसके संपर्क संदेहास्पद हैं: स्पष्तः, एक स्थूल धन-राशि इस अनुदान में सम्मिलित है जो कि, व्यक्तिगत या संस्थात्मक सत्ता को शक्ति प्रदान करती है इन ‘असंबद्धित कार्यों’ को पूर्णतः करने के लिए उनकी इच्छा के विरुद्ध, किन्तु यदि इस प्रकार के कार्य में पकडे भी जाएं, तो वह व्यक्ति ये घोषणा करता है कि, यह तो असंबंधित ‘व्यक्त्तिगत’ कार्य है जो की स्वेछ्पूर्वक वह कर रहा है और कुछ नहीं I

इन विषयों पर विवृत वाक् युद्ध के अभाव में एवं पारदर्शी नियंत्रण के अभाव में, विदेशी संस्थाओं और अनुदान देनेवाली सत्ताएं अब एक महत्वपूर्ण भूमिका कर रही हैं, ये निर्धारित करने के लिए (१) मानव अधिकार की परिभाषा, (२) राजनैतिक  विगणन द्वारा किसी के अधिकारों के लिए युद्ध करने का चयन , एवं (३) किन अपराधियों को दोषी सिद्ध करना है I मानव अधिकार के उल्लंघन के विषय में, चयनात्मक उपद्रव प्रतीत होते हैं सुविधाजनक ढंग से, उनके अनुरूप होते हुए संस्थात्मक भौगोलिक अभिरुचियों के, जो अनैतिकता के लक्ष्य पर  नैतिकता की परत चढ़ाते हैं I

मानव अधिकार एवं साम्राज्यवाद

१९ वीं शतब्दी में, अंग्रेज़ों भारतीय सभ्यता का विनाश किया सामान्य भारतियों के अधिकारों की सुरक्षा करने के ढोंग के सहारे: पंजाब में, महिलाओं को उनकी सम्पत्ति अधिकार से अंग्रेजी सरकार के शासन काल में, वंचित किया गया, जो उनकी सुरक्षा, उनकी अपनी संस्कृति से करने की घोषणा करते थे और इसके परिणामस्वरूप वर्तमान में ये हुआ कि, अब दहेज के नाम पर हत्या होती है I कर्मचारियों की ‘शोषण से सुरक्षा’ की गयी’ भारतीय इस्पात एवं वस्त्र उत्पादकों द्वारा, इन उद्योगों को भारत से समाप्त करके और उन्हें  ब्रिटेन में स्थानांतरित करके जिसके कारण ब्रिटेन में उद्योग क्रांति आरम्भ हुई I  भूमि के स्वामित्व का  पुनर्वितरण अंग्रेज़ों दूर नियुक्त ज़मींदारों  किया गया, और इसमें भी वही तर्क प्रस्तुत किया गया, वर्तमान स्वामियों द्वारा वर्तमान प्रजा के मानव अधिकारों का हनन I अंग्रेजी भाषा शिक्षण ने मूल निवासी भाषाओँ, संस्कृत एवं फ़ारसी भाषा को हटा दिया, जिससे कि, हम ‘अपने राक्षसी अंधविश्वासों’ से मुक्ति पा सकें और हमें ‘विवेकी एवं सभ्य’ बनाया जा सके I भारतीय जनसेवक एवं बाबू, सभी को प्रशिक्षण दिया गया था इसी ‘सभ्य बनाने के लक्ष्य’ के लिए उस साम्राज्य हेतु I दुसरे शब्दों में, हमने कपटपूर्ण एवं विध्वंसकारक पक्ष देखा है ‘मानव अधिकार’ सक्रियतावादी का अतीत में, या अपेक्षकृत, राजनैतिक शोषण का जिसने ‘मानव अधिकार’ या ‘सभ्य बनाने’ के लक्ष्य की पोशाकें धारण की थीं I

अक्षांश रेखा इससे भी अत्यंत बलशाली है: साम्राज्यवादीयों ने कई भारतियों को लुभाना आरम्भ किया अपने साम्राज्य में उन्हें सिपाई या बाबू बनाकर, अथवा अंग्रेज़ों के लिए इतने बृहत जनसँख्या पर सफलतापूर्वक राज्य करना मात्र अपने लोगों द्वारा, संभवतः असंभव ही होता। उसी प्रकार, वर्तमान में, हमें कई भारतीय आदर्शवादी प्रायः मिलते हैं, जो उत्तम मंशा के संग, आरम्भ से ही अनुभवहीन होते हैं, किन्तु क्रमशः वे भी अधीन हो जाते हैं अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों के उद्योगों के लुभानेवाले प्रणालियों से जैसे, अनुदान, देश-विदेश की यात्रा, प्रसिद्धि, ५-सितारोंवाले लावण्य, प्रतिष्ठात्मक मूल्य एवं गौरवपूर्ण पुरस्कार जो मानव अधिकारी अधिवक्ता होने के कारण दिए जाते हैं I कई युवा भारतीय इसको आभूषण की भांति इसका प्रकल्प करते हैं, जो उनकी सदस्यता का चिन्ह होता है ये दर्शाने के लिए कि, वे सार्वभौमिक संस्कृति के, कितने धीर एवं कामोत्तेजक लोग हैं I किंचित आदर्शवादी और भी अत्यंत कट्टर रूप से ‘परिवर्तित’ हो गए हैं, वे पश्चिमी सैद्धांतिक ढांचे को और भी सहज बोध से इन दृष्टिओं द्वारा धारण कर लेते हैं, अपनी ही परंपरा को मिथ्या समान मानने लगते हैं I अपने ही मूल संस्कृतियों से उन्मूलन के पश्चात्, ये आदर्शवादी भारतीय, सिपाही बन जाते हैं, भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्र के विरुद्ध युद्ध करने के लिए |

Featured Image Credit: – www.indiafacts.org

(To Be Continued…)

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