धर्म-परिवर्तन का लक्ष्य – 2

ईसाई धर्मप्रचार का संकट

Translation Credit: Vandana Mishra.

भाग २: यूएस के अस्था पर आधारित उपक्रम:

नूतनकलीन भारत यात्रा में, मुझे तेहेलका की एक अनुकृति दी गयी जिसकी तिथि ७ फ़रवरी, २००४ की थी जिसके आवरण कथा का शीर्षक था, ‘जॉर्ज बुश का भारत में बृहत धर्म-परिवर्तन का लक्ष्य I’ (१४ फ़रवरी वाले लेख में, एक लघु निरंतरता लेख भी उपलब्ध है I) इस अनुसंधानिक वृत्तांत, जो की तेहेलका के गुप्त-दल के पत्रकारों द्वारा निर्मित किया गया है, निम्नलिखित बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं:

१. यूएस सरकार की आस्था पर आधारित उपक्रमों ने प्रमुख ईसाई समूहों को यूएस में अनुदान दिया गया है, भारत में धर्म-परिवर्तन के अनुकरण के लिए, पैट रॉबर्ट्सन की कूटनीति के अंतर्गत। ये धनराशियां शासकीय ढंग से सामाजिक अकर्यों को करने के लिए ही दी गयी हैं, किन्तु इनका द्वैत-लक्ष्य है, धर्म परिवर्तन के साथ सामजिक सेवा। (ध्यान दीजिए, इस विरोधाभास की ओर कि, जब यूएस सरकार के व्यवसायिक संकुचक सरकारी धनराशि को व्यक्तिगत उपभोगों की ओर पंथातर करते हैं, तब उनके कारागार में डाल दिया जाता है I)

२. इसी कार्यप्रणाली का अंश है,भारत में आंकड़ा आधार का निर्माण करना, जिसमें प्रत्येक पिन कोडों (ज़िप कोड के समान) के विस्तृत विवरण हों, और इस आंकड़े आधार को यूएस की प्रज्ञा संथाओं को दिया जाता है I भारतीय अधिकारीयों से अभी अत्यंत सूक्ष्म विवरण उनके पास होता है, यह आंकड़े आधार अत्यंत ही अपरिमित परिशुद्धि के स्तर के होते हैं, प्रत्येक सूक्ष्म क्षेत्रों के विषय में जो भारत के परिक्षेत्र में हैं I इसमें प्रत्येक जाती से, सूचीबद्ध किया जाता है, भारतीय धार्मिक नेता और अन्य प्रभावशाली नेता के विषय में, उनकी प्रथा एवं अतिसंवेदनशीलता, और वे निपूर्ण होते हैं उपयुक्त कार्य-प्रणाली के चयन द्वारा एक लघु-युद्ध वैयक्तिक स्थान में संचालित करने के लिए I (वाणिज्य के इस विश्व में, इसको ‘डेटाबेस मार्केटिंग (आंकड़े-आधार के क्रय-विक्रय)’ कहा जाता है, और इस प्रकार के ऑंकड़ेआधार किसी भी  संयुक्त क्रय-विक्रय के उपाध्यक्ष के लिए  ईर्ष्या का कारण बन सकते हैं। ) तहलका ने घोषणा की कि, ये आंकड़े आधार आस्था पर आधारित ‘सेवाओं’ को प्रेषित करने के लिए उपयोग किये जाते हैं निर्णय-निर्माताओं द्वारा, जो यूएस में स्थित हैं, अत्यंत ही परिशुद्धि एवं तीव्र गति के संग कार्य करते हैं I 

३. तहलका ने घोषणा की, कि, इन गतिविधियों के संपर्क उन शक्तिओं से भी हैं, जो कि, भारतीय एकता के लिए ध्वंसकारी हैं I

४. ये कई विषयों को उत्पन्न करता है जिनमें इस प्रकार की द्वैत प्रवत्ति की गतिविधियां सम्मिलित हैं, अमरीकी एवं भारतीय दृष्टिकोण, दोनों के सन्दर्भ में I अमरीकी दृष्टिकोण के अनुसार, निम्नलिखित विषयों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:

१. क्या इन किंचित यू.एस अनुदान पानेवाले गतिविधियाँ उल्लंघन करते हैं, गिरिजाघर/राज्य के संविधानिक अलगाव का, और, इसके अतिरिक्त, क्या ये किसी विशेष रिलिजन की पदवी को अन्य धर्मों की तुलना में, उन से पक्षपात करते हैं?

२. क्या इनमें से किंचित गतिविधियाँ उल्लंघन करती हैं यू.एस के आस्था-आधारित अनुदान के लक्ष्य का, जिसका उपयोग अमरीकी पददलितों की स्थिति के सुधार के लिए दिया गया था, जिससे कि, सरकार द्वारा संचालित कार्यक्रम का भार अल्प हो सके, और उस धनराशि की विदेशों में उपयोग करने के लिए आज्ञा नहीं थी?

अन्य शब्दों में, अपतटीय संस्थाओं के गुप्त विषय को अज्ञात रखा जाता है, अवैध धन को वैध सिद्ध करने हेतु किंचित संदेहास्पद स्वामित्त्व के ढाँचे से, प्रयोग करने की अस्पष्टता उत्पन्न करने के लिए, क्या यू.एस की जनता का धन किसी जटिल जाल के माध्यम से अपतटीय समूहों को भेजा जा रहा है उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जिसकी आज्ञा नहीं है सरकारी अनुदान देने की यू.एस के भीतर? मात्र मेरी इच्छा है, इस प्रकार के सामर्थ्य विषयों की, जागरूकता प्रसारित करने की, एवं ये पूछने की, कि: क्यों यू.एस कंग्रेस संबंधी सम्मेलन या संचार माध्यम की छान बीन नहीं हुई है, अभिकथित यू.एस कर देनेवालों के धनराशि के विषय में, जो विदेशों में धर्म परिवर्तन के लिए उपयोग किये जाते हैं बिना यू.एस के कर देनेवाली जनता को बताये हुए?

भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार, किंचित उत्तेजक विषय निम्नलिखित हैं:

१. क्यों इस विषय को उस कोष्टक के संधिक्रम अंश में सम्मिलित नहीं किया गया है जो यूएस-भारत संलापों का अंश है? ये गतिविधियाँ, यदि सत्य सिद्ध हुईं, तो संभवतः ये अक्षोन्‍मुख निष्कर्ष प्रदान करेंगीं भारत की एकता के विषय में I

२. क्या जन आधिकारियों के एवं पूर्व-अधिकारियों के, अभिरुचियों-के-मतभेदों के अधिनियम एवं प्रकटन आवश्यकताएं, भारत में पर्याप्त हैं?

३. कौन सी प्रक्रियाएं अपनायी जा रही हैं, अनुदान के विदेशी-नाभि एवं अन्य प्रकार के कष्टदायी प्रभावों के निरीक्षण के लिए, और क्या इसके पश्चात् भी, ये, लघु करती हैं उन भंग करनेवाली पारदर्शी समूहों के महत्वपूर्ण दानशीलता के कार्य को?

इसके अतिरिक्त, कई अन्य भी महत्वपूर्ण पारस्परिक रूचि के विषय हैं यू.एस-भारत के मध्य, जिनके विषय में मेरे पूर्व रीडिफ़ पत्रभाग में, समझाया गया है कि, कैसे इस प्रकार की परियोजनाएं भय का कारण हैं, क्यूंकि ये विदेशीय विपदा में परिवर्तित हो जाती हैं: वे सशक्त रूप से भारत की स्थिरता को क्षीण करती हैं और ध्वंसकारी शक्तियों के हाँथों फंस जाती हैं, जो की संभवतः क्रमशः प्रतिविस्फोटन के कारण यू.एस के हितों पर ही होता है,  जैसा कि, पकिस्तान  और अन्य कई स्थानों में अनेकों बार हुआ है.

मूल विषय किसी धर्म से सम्बंधित नहीं है, बल्कि उन आशंकाओं से है, जो वे समूह बहुभागी लक्ष्यों में प्रस्तुत करते हैं: ये संभव है कि, कई लोग जो इन वृत्तियों को प्राधिकृत करने में सम्मिलित हैं वे अनभिज्ञ हैं इन द्वैत लक्ष्यों के उपयोगों के सूक्ष्मता से, और/या इनके क्रमशः  परिणामों से जो इस अभिक्रियाओं की माला से उत्पन्न होगी, जिनको वे असावधानी से संभवतः झट प्रतिक्रिया करने के लिए उकसा रहे हैं I ये अभिक्रियाओं की माला, अपरिहार्य करती हैं निम्नलिखित  कार्यसम्पादनों की श्रंखला को, जो कि, अनुरूप हैं कई जटिल अवैध धन को वैध धन में परिवर्तन करने की योजनाओं में:

१. यू.एस सरकार अनुदान प्रदान करती है किंचित यू.एस आस्था-आधारित दानशील संस्थाओं को I

२. ये दानशील संस्थाएं अनुदान प्रदान करती है यू.एस-भिन्न अनुषंगीयों या संबद्धों को I

३. विदेशी दल अनुदान प्रदान करते हैं, धर्म परिवर्तनों के लिए और/या देशीय राजनीती जो कि, उत्पन्न करती हैं या उत्तेजित करती हैं मतभेदों को I 

४. ये गतिविधियाँ पृथकवादियों और राजद्रोहीयों के हाँथों की कठपुतलियाँ हैं I

५. ये भारत को सांस्कृतिक एवं राजनैतिक रूप से अस्थिर करते हैं I

६. ये अस्थिरता एक निश्चित समय पर विस्फोट होने वाला बम है जो कि, तालिबान जैसी शक्तियों को किसी दिन शक्तिशाली बनायेंगी। ये यूएस के भी दीर्घावधि में, भू-राजनैतिक हितों के लिए अनुचित ही होगा।

७. अमरीकी जन समुदाय की सुरक्षा, नीतिपरक एवं सदाचार-पूर्ण हित भी इसके परिणाम स्वरुप कष्ट भोगेंगे, व्यंग्यपूर्वक, अपने ही धनराशि के प्रयोग से, किन्तु बिना उसके विषय में ज्ञात हुए I

इस जटिल कारण-प्रभाव की माला के सन्दर्भ में, और बहु स्तरों और मध्यवर्ती संस्थाओं के परभाव से, सम्पूर्ण योजना को ध्यान में ना लाना और भी सरल हो गया है, चाहे इच्छानुरूप या इच्छा विरुद्ध।

मौन की ध्वनि

भारतीय सक्रियतावादियों के सिंह, छत के ऊपर चढ़ गए थे अपने भोंपू के साथ जब तेहेलका ने पहले उजागर किया था जॉर्ज फर्नांडिस के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपण को: उनकी माँग थी कि, प्रत्येक व्यक्ति चाहे कितना भी दूरस्थ रूप में इस कार्य से यदि जुड़ा है तो उसको अतिशीघ्र ही पदत्याग करके, कारागार चले जाना चाहिए I तथापि, उनकी मृदापनयन चुप्पी इस नूतनकलीन तहलका समाचार पर, अचम्भित करती है कि, क्या ये भारतीय सिंह अब पश्चिमी छोटे पालतू कुत्ते और धारक बन गए हैं सार्वभौमिक इंजीलवाद के I

भारतीय सक्रियत्वादियों ने गुप्त रूप से आयोजित किया था एक बृहत चिल्लपों, जो शंकालु हिंदुत्व गतिविधियों पर एनआरआई के अनुदानों के विषय में थी — इस प्रकार की प्रत्यक्ष छान बीन अनिवार्य रूप से आवश्यक है पारदर्शिता को स्थापित करने के लिए I तथापि, इसका दूतीय-लक्ष्य, पश्चिमी संस्थाओं से अनुदान की सरणी, वामन कर देती है हिंदुत्व धन राशि के अभिकथित आकार को I विदेशी संस्थाएं जो नैतिक दबाव डाल रही हैं एक राजनैतिक दुर्बल, अस्थिर एवं खंडित भारतियों पर, वे प्रतीत होती हैं पर्याप्त पाँच- सितारेवाले  सक्रियतावादियों एवं बुद्धिजीवियों के मध्य एक मिलीभगत स्थापित करते हुए।

किन्तु, कई देशों ने इस योजना के विरोध में स्वर उठाये हैं —- जैसे थाईलैंड को देखिये, उदाहरण के लिए I

भाग ३: यूएस में, भारत-विरोध आंदोलन के लिए कौन उत्तरदायी है?

आतंवादी-सक्रियतावादी अक्षरेखा

नूतनकालीन वर्षों में, भारतीय आरक्षकों एवं छापाखानों ने ध्यान देना आरम्भ किया है, किसी विशेष समूह पर जिसपर ‘शांति,’ ‘नागरिक सुविधा’ एवं ‘मानव अधिकारों’ की व्यष्टित्वों की छाप व्याप्त है I

प्रायः, ये विद्द्वान/’सक्रियत्वादि’ सहाय हैं किसी उग्र दल द्वारा जिनको वैध किया जाता है किसी विज्ञापन के मध्य से, जैसे कि, जब भारत के साम्यवादी दल (कोम्युनिस्ट पार्टी), मार्क्सवादी लेनिनवादी मुक्तिवादियों ने सम्मान किया था लगभग १००० ‘सहचर  हुतात्माओं’ के सगे-संबंधी का, अर्थात आतंकवादियों के सम्बन्धियों का एक समारोह में, जिसमें कई प्रमुख ‘समाज के सक्रियतावादी, पर्यावरणविद लोग, एवं लेखक-जो-सक्रियतावादी बन चुके थे वे सम्मिलित थे I कई विभिन्न  क्रूश-विचारधाराओं के गठबंधन व्याप्त हैं भारत में सक्रियत्वादियों में, जहाँ पर कई विभिन्न प्रकार के पृथकतावादी, इस्लामी कट्टरवादी, ईसाई कट्टरवादी एवं वामपंथी अभिसरित होते हैं सहकार्यता के लिए I वे विशेषकर के भारतीय संस्कृति एवं हिन्दू धर्म को दोषी सिद्ध करते हैं (जो कि, भारत को एकत्रित रखते हैं), उन्हीं को अपनी इच्छानुसार खंडित होते हुए देखना चाहते हैं I

यूएस–आधारित भारतीय बुद्धिजीवियां

जिसका अभी तक उचित ढंग से पर्याप्त मात्रा में निरिक्षण नहीं किया गया है, वह हैं यू.एस–आधारित बुद्धिजीवियां। प्रायः, इस प्रकार उन ‘पददलितों’ के शूरवीर घोषित करनेवाले ‘सक्रियतावादी’, कई बहु-प्रसिद्द दक्षिण एशियाई अध्ययन के विद्द्वानों को एकतत्रित करते हैं शक्तिशाली संस्थाओं, पत्रकारिताओं, एवं व्यक्तिगत संपर्कों द्वारा जो कि, कई विभिन्न वाशिंगटन, डी.सी आधारित समूह हैं I कई असंख्य परिसर विमर्शगोष्ठी एवं समारोह व्याप्त हैं जो इन गठबंधनों के ‘मानव अघिकार’ के रूप को प्रोत्साहन देते हैं I व्यक्तिगत एवं समूह के द्वैत-लक्ष्य के कार्यों के कारण निधीयन प्रक्रियाओं को उधेड़ना अत्यंत ही जटिल एवं दृण कार्य है। 

भारतीय – अमरीकियों के उचित-स्थापित मण्डली निरंतर एक पक्षीय अभियोग, भारत के विरोध में चला रहे हैं। इन यूएस के अधिकारीयों से, भारतियों पर मानव अधिकार के उल्लंघन के आरोपों को, कई विभिन्न प्रमाणिकता के स्तर के माध्यम से थोप रहे हैं I इस प्रकार के सक्रियतवाद ने नूतनकलीन भारत को काली सूचीबद्ध किया है यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम द्वारा। ये कमीशन स्वयं ही विद्द्मान है मुख्यतः ईसाईयों के धर्म परिवर्तन कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धर्म परिवर्तन का कार्य करते हैं I कदाचित ही, यदि, इसने आलोचना की होगी इन ईसाई देशों के रिलिजन की स्वतंत्रता के विषय में या कदाचित ही कभी छान-बीन की होगी उन आरोपों के विषय में जिसका ये धर्म-परिवर्तन करनेवाले कार्यकर्त्ता अभ्यास करते हैं I यू.एस राज्य मंत्रालय ने घोषणा की नूतनकालीन वृत्तांत में, कि, भारत में दोषपूर्ण प्रजातंत्र व्याप्त है I किंचित विशेष भारतीय अमरीकियों ने निर्णायक भूमिका की है पिछले किंचित दशक में, इस प्रकार की आलोचनाओँ को प्रकाशित करने में, और वे इसे मात्र विशाल हिमपर्वत का एक लघु नोक मानते हैं जिसको वे आशा करते हैं की भारत का ‘भण्डाफोड’ करेंगे, और भारत को एक राष्ट्र-राज्य ना करके उसे एक बुद्धितः दुर्बल बनाएंगे I निस्संदेह, किंचित लोगों ने, बलपूर्वक ये कहा कि, भारत कई विभिन्न मतभेदों के किसी अवांछनीय समूह की भाँति है I 

यही विपरीत दिशा में, यूएस आधारित विद्द्वान शैक्षणिक ‘सिद्धांतो’ और ‘कूट-योजनाओं’ की आपूर्ति करते हैं जो भारतीय बुद्धिजीवियों एवं एन.जी.ओ के माध्यम से, भारत में आनदोलनों की नींव का पोषण करते हैं। कई जन उनमें से भारत के राजनैतिक दलों के सदस्य भी हैं भारत में, और अतएव उनके कार्य द्वैत लक्ष्यों के हैं I तदापि, यू.एस नियमों के सशक्त उल्लंघन करता जो, प्रतिबंधित करते हैं विदेशी राजनैतिक दलों को निधि दान देने से, यूएस की जनता द्वारा, उनको प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं गया।

विडम्बना ये है कि, इन में से कई बुद्धिजीवी आक्रामकता से कई मिलियन डॉलर धन राशि संचित कर रहे हैं धनवान भारतियों से जो यूएसए में और भारत दोनों स्थानों पर निवास करते हैं इस प्रकार की दक्षिण एशियाई अध्ययन कार्यक्रमों के माध्यम से I

भू-राजनैतिक परिणाम

महत्वपूर्ण भू-राजनैतिक क्षणों में, इन भारतीय अमरीकियों ने भारत के विरुद्ध होकर यू.एस.ए द्वारा पाकिस्तान पर दबाव डालने के प्रभाव को तुनूकृत किया है, और इसी कारण मध्यवर्ती अमेरिकियों ने भारत एवं पाकिस्तान को ‘समान और सदृश्य’ सिद्ध किया है I नूतनकलीन में आउटलुक एक लेख में सीमा सिरोही एक दृण उदाहरण प्रस्तुत करती हैं इसको दर्शाने के लिए कि, ये सब कैसे हो रहा है I

इस प्रकार के सक्रियतवाद, भारत के प्रजातंत्र एवं नियम प्रक्रियाओं को भी दुर्बल करते हैं, क्यूंकि ये वैध माध्यमों को अनदेखा करते हैं जो कि, भारत में उपलब्ध हैं विस्तृत मात्रा में किसी अन्य भूतपूर्व उपनिवेशों की तुलना में I इसके अतिरिक्त, इस प्रकार के समूह कोई भी दृण सफलता नहीं दर्शा सकते हैं, मानव अधिकार को सहायता देने में, किसी विषय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर या संवेदानात्मक बनाकर। वे भारतीय परम्पराओं से वियोजित एवं  विमुख हैं, जिसको वे निम्न वर्गीय मानते हैं एक लज्जा की भाँती, जिसको वे अपने पश्चिमी व्यष्टित्व के व्यक्तिगत प्रत्यालेख के सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं I

अधिसदस्यता

जो ‘प्रबुद्ध एनजीओ’ में सम्मिलित हैं उनमें व्याप्त अंतर्निरीक्षण के अभाव का कारण है कि, वे स्वयं को आदर्श व्यक्ति, बुद्धिमान एवं शक्तिशाली होने के अधिसदस्यता के कई स्तरों में स्थापित समझते हैं I ये ‘नूतन मानवता से संबंध’ वर्तमान में सदृश्य है उस काल्पनिक आर्थर के गोल कोष्ठक की भाँती, गुप्त समाज (जैसे कि,संगतराश और गुप्त समूह) और  बुद्धिमानों की  विचारसभा से। किन्तु ये कुट्टित सम्बन्ध, आरम्भ में चाहे कितने भी उच्च मंशा के हों, किंचित समय पश्चात झुकते हैं आकर्षित करते हुए पृथक धूर्तों को जो  ‘दृश्य के पीछे से’, अन्य  कृपापात्रों को शक्ति-विक्रेता बनाते हैं I धूर्तता एवं विश्वासघात की आचारनीति बन जाती है सामूहिक प्रतिछाया और ‘संरचनात्मक हिंसा’ का पोषण करते हैं,’ अर्थात अस्थिर करते हैं I

वास्तविक चुनौती जिसका ‘विश्व बचाओ’ आंदोलन सामना कर रहे हैं, वो है उन समस्याओं को पहचानना और उनको सुलझाना एक क्रांतिकारी प्रतिछाया के बंधनों से, इस प्रकार की अधिसदस्यता से I

अंततः, प्रत्येक एकाधिकारप्राप्त अधिसदस्यता विकसित करती है आत्मरक्षा एवं आक्रामक दोनों नीतियों को, और प्रवृत्त होती हैं अति प्रतिक्रिया करने हेतु जब भी उनको भय का अनुभव होगा अप्रत्याशित स्थिती में: अतः, मुखबिरों को और उनकी प्रतिष्ठा को प्रायः तुच्छ माना जाता है, यदि मानव अधिकार की अवैध नीतियों को वैध करनेवाली, चुप्पी की भीत को, पार किया तो उन लोगों पर आक्रमण किया जाता है I

प्रायौगिक विषय:

मैं पाठकों को निम्नलिखित प्रश्नों पर चिंतन करने की छूट देता हूँ:

१. भारत के दुर्बल, अंतरराष्ट्रीय अक्षरेखा के सशक्त अस्तित्व के, विषय में, क्या छान बीन करने की आवश्यकता है? यू.एस, भारतीय एन.जी.ओ और प्रमुख यू.एस की निधिबद्ध संस्थाओं में किंचित दक्षिण एशियाई अध्ययन करनेवाले विद्द्वान-सक्रियत्वादि भी सम्मिलित हैं। क्या इनको संभावित एवं सहअपराधिता या ज्ञान के अभाव का सम्पूर्ण परिणाम ज्ञात नहीं है?

२. क्या यू.एस कंग्रेस संबंधी सुनवाई होनी चाहिए, यू.एस के करदाताओं के धन के विषय में, जिसमें वे, विदेशों में, कई अमरीकी धर्मों के समूह से, मात्र एक ही रिलिजन का विस्तार करने में व्यस्त हैं?

३. क्या कोई मतभेदों -की-अभिरुचियों की निति होनी चाहिए और आचारनीति के विधि-संग्रह होने चाहिए, जो कि, केंद्रित करें ‘द्वैत-प्रायोगों’ पर मानव अधिकारों की गतिविधियों पर और प्रतिबंध भी लगाएं सत्ताओं के दुरूपयोग पर जो देनेवालों के पास है लेनेवालों की तुलना में उपलब्ध है? एक ओर धर्मनिरपेक्ष अराजनैतिक लोकोपकार, और दूसरी ओर या तो रिलिजन या राजनैतिक गतिविधियों के मध्य, क्या पूँजी के मिश्रण, लोगों या अन्य संसाधनों के विरोध पर प्रतिबंध होना चाहिए? जैसा कि विमानतल सुरक्षा और अवैध धन को वैध धन करने के लिए आरक्षी के सन्दर्भ में, जो असुविधायें होती हैं मानव अधिकार के कार्यों की पारदर्शिता के लिए उन युक्तियों को अपनाने में, वह संभवतः समाज के हितलाभों से अधिक भारी होगा। 

४. क्या स्वेच्छापूर्ण भेद प्रकाशन होना चाहिए प्रत्येक व्यक्ति एवं संथाओं द्वारा, जो मानव अधिकार एवं धर्मदान के क्षेत्रों से जुड़े हैं उनकी अंतर्राष्ट्रीय निधिबंधन एवं संपर्कों को ध्यान में रखते हुए, जिससे कि, जनता एवं अन्य संथाओं के पास सभी संसूचना उपलब्ध हों स्वयं अपने अनुसार निरूपण करने हेतु?

५. क्या ये असंख्य उदाहरण जो यू.एस से उत्पन्न हुए हैं, हिन्दू धर्म-विरोधी एवं भारत-विरुद्धी छात्रवृति, निरा निरुद्देश्य घटनाएं हैं, उन विद्द्वानों के व्यक्तिगत पूर्वग्रहों एवं कट्टरता की, या वे आरोपित व्यवस्थित पक्षपात के अंश हैं?

यथा सम्भव आकर्षित पंक्तियाँ:

1. अंग्रेजी सरकार: वर्तमान में व्याप्त दहेज़ प्रथा के जन्म दाता I
2. फ़रवरी २००४ में, जॉर्ज बुश का, भारत में अत्यंत बृहत मात्रा में धर्म परिवर्तन की योजना I
3.भव्य समारोह में कोम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी, समाज के सक्रियतावादी, पर्यावरणविद लोग, पृथकतावादी, इस्लामी कट्टरवादी, ईसाई कट्टरवादी एवं वामपंथी ने किया १००० आतंकवादियों के सम्बन्धियों का सम्मान I

Featured Image Credit: – www.indiafacts.org

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